भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 335, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 335

३४० योगवाशिष्ठ ।

उस अटवी में जाने योग्य भी तुम नहीं । तुम बालक हो और वह अटवी महाभयानक है उसमें प्राप्त हुए कष्ट से कष्ट पाता है ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे चित्तोपाख्यानवर्णनन्नाम चतुःसप्ततितमसर्गः ॥ ७४ ॥

रामजी बोले, हे ब्राह्मण ! वह कौन अटवी है; मैंने कब देखी है और कहाँ है और वे पुरुष अपने नाश के निमित्त क्या उद्यम करते थे सो कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! वह अटवी दूर नहीं और वह पुरुष भी दूर नहीं । यह जो गम्भीर बड़ा आकाररूप संसार है वही शून्य अटवी है और विकारों से पूर्ण है । यह अटवी भी आत्मा से सिद्ध होती है । उसमें जो पुरुष रहते हैं वे सब मन हैं और दुःखरूपी चेष्टा करते हैं विवेक ज्ञानरूपी मैं उनको पकड़ता था । जो मेरे निकट आते थे वे तो जैसे सूर्य के प्रकाश से सूर्यमुखी कमल खिल आते हैं तैसे मेरे प्रबोध से प्रफुल्लित होकर महामति होते थे और चित्त से उपशम होकर परमपद को प्राप्त होते थे और जो मेरे निकट न आये और अविवेक से मोहे हुए मेरा निरादर करते थे वे मोह और कष्ट ही में रहे अब उसके अंग, प्रहार, कूप, कञ्ज और केले के वन का उपमान सुनो । हे रामजी ! जो कुछ विषय अभिलाषाएँ हैं वे उस मन के अंग हैं । हाथों से प्रहार करना यह है कि सकाम कर्म करते हैं और उनसे फटे हुए दूर से दूर दौड़ते और मृतक होते हैं । अन्धकूप में गिरना यही विवेक का त्याग करना है । इस प्रकार वह पुरुष आपको आपही प्रहार करते भटकते फिरते हैं और अभिलाषारूपी सहस्र अंगों से घिरे हुए मृतक होकर नरकरूपी कूप में पड़ते हैं जब उस कूप से बाहर निकलते हैं तब पुण्य कर्मों से स्वर्ग में जाते हैं । वही कदली के वन समान है वहाँ कुछ सुख पाते हैं। स्त्री, पुरुष, कलत्र आदिक कुटुम्ब कञ्ज के वन हैं और कञ्ज में कण्टक होते हैं सो पुत्र, धन और लोकों की कामना है उनसे कष्ट पाते हैं । जब महापाप कर्म करते हैं तब नरकरूपी अन्धकूप में पड़ते हैं और जब पुण्यकर्म करते हैं तब कदली वन की नाईं स्वर्ग को प्राप्त होते हैं तो कुछ उल्लास को भी प्राप्त होते हैं । हे रामजी ! गृहस्थाश्रम महादुःखरूप कञ्ज वन की नाईं है । ये