भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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उत्पत्ति प्रकरण ।

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में जा पड़े। वहाँ से निकल फिर कदली के वन में जावे और उससे निकल- कर फिर आपको मारे। जब कदली वन में जावे तब कुछ शान्तिमान् और प्रसन्न हो दौड़े और आपको मारे और कष्टमान् होके दूर से दूर जा पड़े। इसी प्रकार वह अपना किया आपही कष्ट भोगे और भटकता फिरे। तब मैंने उसको पकड़ के पूछा कि अरे, तू कौन है; यह क्या करता है और किस निमित्त करता है तेरा नाम क्या है और यहाँ क्यों मिथ्या जगत् में मोह को प्राप्त हुआ है? तब उसने मुझसे कहा कि न में कुछ हूँ, न यह कुछ है और न में कुछ करता हूँ। तू तो मेरा शत्रु है; तेरे देखने से में नाश होता हूँ। इस प्रकार कहकर वह अपने अङ्गों को देखने और रुदन करने लगा एक क्षण में उसका वपु नाश होने लगा और प्रथम उसके शीश, फिर भुजा, फिर वक्षःस्थल और फिर उदर क्रम से गिर पड़े। जैसे स्वप्न से जागे स्वप्न का शरीर नष्ट होता है। तब मैं नीति शक्ति को विचार के आगे गया तो और एक पुरुष इसी भाँति का देखा। वह भी इसी प्रकार आपको आपही प्रहार करे; कष्टमान हो और पूर्वोक्त क्रिया करे। जब उसने मुझको देखा तब प्रसन्न होकर हँसा और मैंने उसको रोक के उसी प्रकार पूछा तो उसने भी मेरे देखते-देखते अपने अङ्गों को त्याग दिया और कष्टवान् और हर्षवान् भी हुआ। फिर मैं आगे गया, तो एक और पुरुष देखा वह भी इसी प्रकार करे कि अपने हाथों से आपको मार के बड़े अन्धे कुएँ में जा पड़े। चिरकालपर्यन्त मैं उसको देखता रहा और जब वह कूप से निकला तब मैंने उस पर प्रसन्न होकर जैसे दूसरे से पूछा था पूछा, पर वह मूर्ख मुझको न जान के दूर से त्याग गया, और जो कुछ अपना व्यवहार था उसमें जा लगा। इसके अनन्तर चिरकाल पर्यन्त में उस वन में विचरता रहा तो उसी प्रकार मैंने फिर एक पुरुष देखा कि वह आपही आपको नाश करता था। निदान जिसको मैं पूछूँ और जो मेरे पास आवे उसको में कष्ट से छुड़ा दूँ और आनन्द को प्राप्त करूँ और जो मेरे निकट ही न आवे मुझको त्याग जावे तो उस वन में उसका वही हाल हो और वही व्यवहार करे। हे रामजी! वह वन तुमने भी देखा है। परन्तु तुमने वह व्यवहार नहीं किया और

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