भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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३३८ योगवाशिष्ठ ।

कल्पना से रहित भासता है । द्वैत, अद्वैत और शब्द भी उपदेश के निमित्त हैं प्रबोध का विषय कोई नहीं । हे रामजी ! जब तक तुम प्रबोध आत्मा नहीं हुए तब तक में तीन आकाश कहता हूँ-वास्तव में कोई कल्पना नहीं । जैसे दावाग्नि लगे से वन जलकर शून्य भासता है तैसे ही ज्ञानाग्नि से जले हुए चित्ताकाश और भूताकाश चिदाकाश में शून्य कल्पना भासते हैं । मलीन चैतन्य जो चैत्यता को प्राप्त होता है इससे यह जगत् भासता है । जैसे इन्द्रजाल की बाजी होती है तैसे ही यह जगत् है बोधहीन को यह जगत् भासता है । जैसे असम्यकदर्शी को सीपी में रूपा भासता है तैसे अज्ञानी को जगत् भासता है-आत्मतत्त्व नहीं भासता । जब दृश्यभ्रम नष्ट हो जावे तब मुक्तरूप हो ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे चिदाकाशमाहात्म्यवर्णनंनाम त्रिसप्ततितमसर्गः ॥ ७३ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह जो कुछ उपजा है इसे तुम चित्त से उपजा जानो । यह जैसे उपजा है तैसे उपजा है अब तुम इसकी निवृत्ति के लिये यत्न करके आत्मपद में चित्त लगाओ तब यह जगद्भ्रम नष्ट हो जावेगा । हे रामजी ! इस चित्त पर एक चित्ताख्यान जो पूर्व हुआ है उसे सुनो, जैसे मैंने देखा है तैसे ही तुमसे कहता हूँ । एक महाशून्य वन था और उसके किसी कोने में यह आकाश स्थित था उस उजाड़ में मैंने एक ऐसा पुरुष देखा जिसके सहस्र हाथ और सहस्र लोचन थे और चञ्चल और व्याकुल रूप था । उसका बड़ा आकार था और सहस्र भुजाओं से अपने शरीर के मारे आपही कष्टमान हो अनेक योजनों तक भागता चला जाता था । जब दौड़ता दौड़ता थक जाय और अङ्ग चूर्ण हो जायँ तो एक कृष्ण रात्रि की नाईं भयानकरूप कूप में जा पड़े और जब कुछ काल बीते तब वहाँ से भी निकलकर करञ्ज के वन में जा पड़े और जब वहाँ कण्टक चुभें तो कष्ट पावे । जैसे पतङ्ग दीपक को सुखरूप जान के उसमें प्रवेश करे और नाश हो तैसे ही जहाँ सुखरूप जानके प्रवेश करे वहीं ही कष्ट पावे और फिर उर्मा वन में जा पड़े फिर वहाँ से निकलकर आपको अपने ही हाथों से मारे और कष्टमान हो और फिर दौड़ता दौड़ता कूप