भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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पृष्ठ 332

उत्पत्ति प्रकरण । ३३७

तृण और काष्ठ के तुल्य हैं। उनके विचारने से क्या है ? यह सब मन की रचना है और मन अविचार से सिद्ध है, विचार करने से नष्ट हो जाता है। मन के नष्ट हुए परमात्मा ही शेष रहता है जो सबका साक्षी भूत सर्व से अतीत; सर्वव्यापी और सबका आश्रयभूत है। उसके प्रमाद से मन जगत् को रच सकता है इस कारण कहा है कि मन और कर्म एकरूप हैं और शरीरों के कारण हैं। हे रामजी ! जन्म मरण आदि जो कुछ विकार हैं वे मन से ही भासते हैं और मन अविचार से सिद्ध है विचार किये से लीन हो जाता है। जब मन लीन होता है तब कर्म आदि भ्रम भी नष्ट हो जाते हैं। जो इस भ्रम से छूटा है वही मुक्त है और वह पुरुष फिर जन्म और मरण में नहीं आता, उसका सब भ्रम नष्ट हो जाता है। इतना सुन रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! आपने सात्त्विकी, राजसी और तामसी तीन प्रकार के जीव कहे हैं और उनका प्रथम कारण सत्य असत्यरूपी मन कहा था, वह मन अशुद्धरूप शुद्ध चिन्मात्र तत्त्व से उपजकर बड़े विस्ताररूपी विचित्र जगत् को कैसे प्राप्त हुआ ? वशिष्ठजी बोले; हे रामजी ! आकाश तीन हैं एक चिदाकाश; दूसरा चित्ताकाश, और तीसरा भूताकाश । भाव से वे समानरूप हैं और आप अपनी सत्ता है। जो चित्ताकाश से नित्य उपलब्धरूप और चेतनमात्र सबके भीतर बाहर स्थित हैं, अनुमाता, बोधरूप और सर्वभूतों में सम व्याप रहा है वह चिदाकाश है। जो सर्वभूतों का कारणरूप है और आप विकल्परूप है और सब जगत् को जिसने विस्तारा है वह चित्ताकाश कहाता है। दश दिशाओं को विस्तारकर जिसका वपु प्रच्छेद को नहीं प्राप्त होता शून्य-स्वरूप है और पवन आदिक भूतों में आश्रयभूत है वह भूताकाश कहाता है। हे रामजी ! चित्ताकाश और भूताकाश दोनों चिदाकाश से उपजे हैं और सबके कारण हैं। जैसे दिन से सब कार्य होते हैं तैसे ही चित्त से सब पदार्थ प्रकट होते हैं। वह चित्त जड़ भी नहीं, और चैतन्य भी नहीं आकाश भी उसी से उपजता है। हे रामजी ! ये तीनों आकाश भी अप्र-बोधक के विषय हैं ज्ञानी के विषय नहीं। ज्ञानवान् तीन आकाश अज्ञानी के उपदेश के निमित्त कहते हैं। ज्ञानवान् को एक परब्रह्म पूर्ण सर्व-