भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 348, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 348

उत्पत्ति प्रकरण ।

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स्वर्णवत महाकल्पवृक्ष लगे थे । उस देश का लवण नाम राजा अति तेजवान् और धर्मात्मा राजा हरिश्चन्द्र के कुल में उपजा । उसका ऐसा तेज हुआ कि शत्रु उसका नाम स्मरण करे तो उसको ताप चढ़ जावे और वह श्रेष्ठ पुरुषों की पालना करे । उस राजा के यश से सम्पूर्ण पृथ्वी पूर्ण हो गई और स्वर्ग में देवता और विद्याधर यश गाते थे । उस राजा में लोभ और कुटिलता न थी और वह बड़ा बुद्धिमान् और उदार था । एक दिन सभा में बड़े ऊँचे सिंहासन पर वह बैठा था और सुन्दर स्त्रियों का नृत्य होता था, अतिसुन्दर बाजे बजते थे और मधुरध्वनि होती थी । राजा के शीश पर चमर झुलता था और मन्त्री और मण्डलेश्वरों की सेना आगे खड़ी राजा को देशमण्डल की वार्त्ता सुनाती थी । इतिहास आदि की पुस्तकें ढाँप के उठा रक्खी थीं और भाट स्तुति करते थे । केवल दो मुहूर्त्त दिन रह गया था उस काल में एक इन्द्रजाली बाजीगर आडम्बर संयुक्त सभा में आया और राजा से कहने लगा, हे राजन् ! आप मेरा एक कौतुक देखिये । इतना कहकर उसने अपना पिटारा खोला और उसमें से एक मोर की पूँछ निकालकर घुमाने लगा । उससे राजा को नाना प्रकार की रचना भासने लगी-मानो परमात्मा की माया है और नाना प्रकार के रङ्ग राजा ने देखे । उसी क्षण में किसी मण्डलेश्वर का दूत एक घोड़ा लेकर राजा के निकट आया और बोला, हे राजन् ! यह महाबलवान् घोड़ा राजा ने आपको दिया है । जैसे उच्चैःश्रवा इन्द्र का घोड़ा समुद्र मथने से निकला है तैसा ही यह है और इसका पवन के सदृश वेग है । मेरे स्वामी ने कहा है कि जो उत्तम पदार्थ है वह बड़ों को देना चाहिये और यह आपके योग्य है इससे आप इसे ग्रहण कीजिये । तब इन्द्रजाली बोला, हे राजन् ! आप इस घोड़े पर आरूढ़ हों, इस पर चढ़कर आप शोभा पावेंगे । इतना सुन राजा घोड़े की ओर देख मूर्च्छित हो गया और भय से मन्त्री भी उसे न जगावें और उसके हाथ पाँव भी कुछ न हिलें । जैसे कीचड़ में कमल अचल होता है तैसे ही राजा अचल हो गया और दो मुहूर्त्त पर्यन्त मूर्च्छित रहा । भाट और कवि जो स्तुति करते थे वे सब चुप हो रहे और मन्त्री और नौकर भय

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