योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 349, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३५४ | योगवाशिष्ट। |
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और संशय के समुद्र में डूब गये और उन्होंने जाना कि राजा के मन में कोई बड़ी चिन्ता उपजी है और सबके सब अति आश्चर्यवान् थे।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे इन्द्रजालोपाख्याने नृपमोहो नामाशीतितमस्सर्गः ॥८०॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! दो मुहूर्त के उपरान्त राजा चैतन्य हुआ और उसका अङ्ग हिलकर सिंहासन से गिरने लगा, तब राजा के मन्त्री और अन्य नौकरों ने उसकी भुजा पकड़ के थॉंभा परन्तु राजा की बुद्धि व्याकुल हो गई और बोले कि यह नगर किसका है यह सभा किसकी है और इसका कौन राजा है? जब इस प्रकार का वचन मन्त्रियों ने सुना तो शान्त हुए और प्रसन्न होकर कहने लगे, हे राजन्! आप क्यों व्याकुल हुए हैं? आपका मन तो निर्मल है और आप उदारात्मा हैं। जिन पुरुषों की प्रीति पदार्थों में होती है और आपात रमणीय भोगों में चित्त है उनका मन मोह से भर जाता और जो सन्त जन उदार हैं उनका चित्त निर्मल होता है। उनका मन मोह में कैसे पड़े? हे देव! जिनका चित्त भोगों की तृष्णा में बँधा है उनका मन मोह जाता और जो महापुरुष सन्त जन हैं उनका मन मोह में नहीं डूबता। जिसका चित्त पूर्ण आत्म-तत्त्व में स्थित हुआ है और बड़े गुणों से सम्पन्न हैं उनको शरीर के रहने और नष्ट होने में कुछ मोह नहीं उपजता, और जिनको आत्मतत्त्व का अभ्यास नहीं प्राप्त हुआ है और जो अविवेकी हैं उनका चित्त देश, काल, मन्त्र और औषध के वश से मोह को प्राप्त होता है। आपका चित्त तो विवेक भाव को ग्रहण करता है, क्योंकि आप नित्य ही नूतन कथा और शब्द सुनते हो। अब आप कैसे मोह से चलायमान हुए हो? जैसे वायु से पर्वत चलायमान हो वैसे ही आप चलायमान हुए हैं-यह आश्चर्य है! आप अपनी उदारता स्मरण कीजिये। इतना सुनकर राजा सावधान हुआ और उसके मुख की कान्ति उज्ज्वल हुई-जैसे शरत्काल की सूखी हुई मञ्जरी वसन्त ऋतु में प्रफुल्लित होती है तैसे ही राजा नेत्रों को खोल-कर देखने लगा और जैसे सूर्य राहु की ओर और सर्प नेवले की ओर देखता है तैसे ही इन्द्रजाली की ओर देखकर बोला, हे दुष्ट, इन्द्रजाली!