योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 350, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति प्रकरण । ३५५
तूने यह क्या कर्म किया ? राजा से भी कोई ऐसा कर्म करता है ? जैसे जल बिना मछली कष्ट पाके फिर जल में प्रसन्न हो तैसे ही मैं हुआ हूँ । बड़ा आश्चर्य हे परमात्मा की अनन्त शक्ति है और अनेक प्रकार के पदार्थ फुरते हैं । मैंने दो मुहूर्त में क्या ही भ्रम देखा । मेरा मन सदा ज्ञान के अभ्यास में था सो तो मोह गया तो प्राकृत जीवों का क्या कहना है ? मैंने बड़ा आश्चर्य भ्रम देखा है । यह इन्द्रजाली मानों शम्बर दैत्य है कि उसने दो मुहूर्त में मुझको अनेक देश, काल और पदार्थ दिखाये । जैसे ब्रह्मा एक मुहूर्त में नाना प्रकार के पदार्थ रच लेवें वैसे ही एक मुहूर्त में इसने मुझको अनेक भ्रम दिखाये हैं । मैं सब तुम्हारे आगे कहता हूँ—मानो सारी सृष्टि इसके पिटारे में है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे राजाप्रबोधोनाम एकाशीतितमस्सर्गः ॥ ८१ ॥
राजा बोला, हे साधो ! मैं इस पृथ्वी का राजा हूँ और सब पृथ्वी में मेरी आज्ञा चलती है और मैं इन्द्र की नाईं सिंहासन पर बैठता हूँ जैसे स्वर्ग में इन्द्र के आगे देवता होते हैं तैसे ही मेरे आगे भृत्य और मन्त्री हैं । उदारता से मैं सम्पन्न हूँ पर मैंने बड़ा भ्रम देखा । हे साधो ! जब इस इन्द्रजाली ने पिटारे से मोर की पूँछ निकाल कर घुमाई तो वह मुझको सूर्य की किरणों की नाईं भासी और जैसे बड़ा मेघ गरज के शान्त हो जाता है और पीछे इन्द्रधनुष दीखता है तैसे ही वह विचित्र रूप पूँछ मुझको दीखी । फिर एक दूत घोड़ा लेकर आया उस पर मैं आरूढ़ हुआ और वह चित्त ही से मुझको दूर से दूर ले गया । जैसे भोगों की वासना से मूर्ख घर ही बैठे दूर से दूर भटकते फिरते हैं तैसे ही मुझको वह घोड़ा दूर से दूर ले गया । फिर वह मुझे एक महाभयानक निर्जन देश में ले गया जो प्रलयकाल के जले हुए स्थानों के समान था । वहाँ मानों दूसरा आकाश था और सात समुद्र थे और उनके समान एक आठवाँ समुद्र था । चारों दिशा के जो चार समुद्र वर्णन किये हैं उनके समान वह मानों पाँचवाँ समुद्र था निदान वह मुझे महाभयानक स्थानों और देशों को लाँघकर एक महावन में ले आया । जैसे ज्ञानी