योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 351, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३५६ | योगवाशिष्ठ । |
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का चित्त आकाशवत् होता है और जैसे अज्ञानी का चित्त कठोर और शून्य होता है वैसे ही स्थान में मुझको ले गया, जहाँ घास, वृक्ष, जीव मनुष्य कोई भी दृष्टि न आता था वहाँ में महाकष्ट और दीनता को प्राप्त हुआ । जैसे धन और बान्धवों से और देश और बल से रहित पुरुष कष्ट पाता है वैसे ही में कष्टवान् हुआ । तब दिन का अन्त हो गया और वहाँ उजाड़ में कष्ट से मैंने रात बिताई और पृथ्वी पर सोया परन्तु निद्रा न आई और दुःख से कल्प समान रात्रि हो गई । जब सूर्य उदय हुआ तब में वहाँ से चला और आगे गया तो पक्षियों का शब्द सुना और वृक्ष देखे परन्तु खाने पीने को कुछ न पाया । इन वृक्षों को देखके में प्रसन्न हुआ—जैसे मृत्यु से छुटा पुरुष रोग से भी प्रसन्न हो—और एक जामुन के वृक्ष के नीचे बैठ गया—जैसे मार्कण्डेय ऋषि ने प्रलय के समुद्र में श्रमकर वट का आश्रय लिया था । तब वह घोड़ा मुझको छोड़ के चला गया और सूर्य अस्त हुआ तो मैंने वहाँ रात्रि बिताई परन्तु न कुछ भोजन किया और न जलपान किया और न स्नान ही किया । इससे मैं महादीन हुआ । जैसे कोई बिका मनुष्य दीन हो जाता है और जैसे अन्धकूप में गिरा मनुष्य कष्टवान् होता है तैसे ही में कष्टवान् हुआ और कल्प के समान रात्रि बीती । जब वहाँ अन्न पानी कुछ दृष्टि न आया तब मैं आगे गया जहाँ पक्षी शब्द करते थे । उस समय आधा पहर दिन रह गया था तब एक कन्या मुझे दिखाई दी जो अपने हाथ में मृत्तिका की एक मटका में पके हुए चावल और जांबू के रस का भरा हुआ पात्र लिए जाती थी । मैं उसके सम्मुख आया—जैसे रात्रि के सम्मुख चन्द्रमा आता है और कहा कि हे बाले ! मुझको भोजन दे, मैं क्षुधा से आतुर हूँ । जो कोई दीन आर्त्त को अन्न देता है वह बड़ी सम्पदा पाता है । हे साधो ! जब मैंने बारम्बार कहा तब उसने कहा तुम तो कोई राजा भासते हो कि नाना प्रकार के भूषण वस्त्र पहिने हुए हो, में तुम को भोजन न दूँगी । ऐसे कह के वह आगे चली और में भी उसके पीछे जैसे छाया जावे तैसे चला । मैं कहता जाता था कि हे बाले ! मुझे भोजन दे कि मेरी क्षुधा शान्त हो और वह कहती, हे राजन् ! हम नीच