योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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है और उस अविद्या को तरना कठिन है। अविचार से अविद्या सिद्ध है, विचार किये से नष्ट होती है। उसी अविद्या ने जगत् विस्तारा है। यह जगत् बरफ की दीवार है। जब ज्ञानरूपी अग्नि का तेज होगा तब निवृत्त हो जावेगी। हे रामजी ! यह जगत् आकाशरूप है, अविद्या भ्रान्ति दृष्टि से आकार हो भासता है और असत्य अविद्या से बड़े विस्तार को प्राप्त होता है। यह दीर्घ स्वप्ना है, विचार किये से निवृत्त हो जाता है। हे रामजी ! यह जगत् भावनामात्र है, वास्तव में कुछ उपजा नहीं। जैसे आकाश में भ्रान्ति से मोर के पुच्छ की नांई तरुवरे भासते हैं तैसे ही भ्रान्ति से जगत् भासता है। जैसे बरफ की शिला तप्त करने से लीन हो जाती है तैसे ही आत्मविचार से जगत् लीन हो जाता है। हे रामजी! यह जगत् अविद्या से बँधा है सो अनर्थ का कारण है। जैसे-जैसे चित्त फुरता है तैसे ही तैसे हो भासता है। जैसे इन्द्रजाली सुवर्ण की वर्षा आदिक माया रचता है तैसे ही चित्त जैसा फुरता है तैसा ही हो भासता है। आत्मा के प्रमाद से जो कुछ चेष्टा मन करता है वह अपने ही नाश के कारण होती है। जैसे घुरान अर्थात् कुसयारी की चेष्टा अपने ही बन्धन का कारण होती है तैसे ही मन की चेष्टा अपने नाश के निमित्त होती है और जैसे नटवा अपनी क्रिया से नाना प्रकार के रूप धारता है तैसे ही मन अपने सङ्कल्प को विकल्प करके नाना प्रकार के भावरूपों को धारता है। जब चित्त अपने सङ्कल्प विकल्प को त्यागकर आत्मा की ओर देखता है तब चित्त नष्ट हो जाता है और जब तक आत्मा की ओर नहीं देखता तब तक जगत् को फैलाता है सो दुःख का कारण होता है। हे रामजी! सङ्कल्प आवरण को दूर करो तब आत्मतत्त्व प्रकाशेगा सङ्कल्प विकल्प ही आत्मा में आवरण है। जब दृश्य को त्यागोगे तब आत्मबोध प्रकाशेगा। हे रामजी ! मन के नाश में बड़ा आनन्द उदय होता है और मन के उदय हुए बड़ा अनर्थ होता है, इससे मन के नाश करने का यत्न करो । मन के बढ़ाने का यत्न मत करो। हे रामजी ! मनरूपी किसान ने जगतरूपी वन रचा है, उसमें सुख-दुःखरूपी वृक्ष हैं और मनरूपी सर्प रहता है। जो विवेक से रहित पुरुष हैं उनको वह भोजन करता है। हे