योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
३५० योगवाशिष्ट ।
है और उस अविद्या को तरना कठिन है। अविचार से अविद्या सिद्ध है, विचार किये से नष्ट होती है। उसी अविद्या ने जगत् विस्तारा है। यह जगत् बरफ की दीवार है। जब ज्ञानरूपी अग्नि का तेज होगा तब निवृत्त हो जावेगी। हे रामजी ! यह जगत् आकाशरूप है, अविद्या भ्रान्ति दृष्टि से आकार हो भासता है और असत्य अविद्या से बड़े विस्तार को प्राप्त होता है। यह दीर्घ स्वप्ना है, विचार किये से निवृत्त हो जाता है। हे रामजी ! यह जगत् भावनामात्र है, वास्तव में कुछ उपजा नहीं। जैसे आकाश में भ्रान्ति से मोर के पुच्छ की नांई तरुवरे भासते हैं तैसे ही भ्रान्ति से जगत् भासता है। जैसे बरफ की शिला तप्त करने से लीन हो जाती है तैसे ही आत्मविचार से जगत् लीन हो जाता है। हे रामजी! यह जगत् अविद्या से बँधा है सो अनर्थ का कारण है। जैसे-जैसे चित्त फुरता है तैसे ही तैसे हो भासता है। जैसे इन्द्रजाली सुवर्ण की वर्षा आदिक माया रचता है तैसे ही चित्त जैसा फुरता है तैसा ही हो भासता है। आत्मा के प्रमाद से जो कुछ चेष्टा मन करता है वह अपने ही नाश के कारण होती है। जैसे घुरान अर्थात् कुसयारी की चेष्टा अपने ही बन्धन का कारण होती है तैसे ही मन की चेष्टा अपने नाश के निमित्त होती है और जैसे नटवा अपनी क्रिया से नाना प्रकार के रूप धारता है तैसे ही मन अपने सङ्कल्प को विकल्प करके नाना प्रकार के भावरूपों को धारता है। जब चित्त अपने सङ्कल्प विकल्प को त्यागकर आत्मा की ओर देखता है तब चित्त नष्ट हो जाता है और जब तक आत्मा की ओर नहीं देखता तब तक जगत् को फैलाता है सो दुःख का कारण होता है। हे रामजी! सङ्कल्प आवरण को दूर करो तब आत्मतत्त्व प्रकाशेगा सङ्कल्प विकल्प ही आत्मा में आवरण है। जब दृश्य को त्यागोगे तब आत्मबोध प्रकाशेगा। हे रामजी ! मन के नाश में बड़ा आनन्द उदय होता है और मन के उदय हुए बड़ा अनर्थ होता है, इससे मन के नाश करने का यत्न करो । मन के बढ़ाने का यत्न मत करो। हे रामजी ! मनरूपी किसान ने जगतरूपी वन रचा है, उसमें सुख-दुःखरूपी वृक्ष हैं और मनरूपी सर्प रहता है। जो विवेक से रहित पुरुष हैं उनको वह भोजन करता है। हे
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रामजी ! यह मन परम दुःख का कारण है; इसमें तुम इस मनरूपी शत्रु को वैराग्य और अभ्यासरूपी खड्ग से मारो तब आत्मपद को प्राप्त होगे । इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले इस प्रकार जब वशिष्ठजी ने कहा तब सायंकाल का समय हुआ और सब श्रोता परस्पर नमस्कार करके अपने-अपने स्थान को गये और फिर सूर्य की किरणों के उदय होने पर अपने-अपने स्थान पर आ बैठे ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे मननिर्वाणोपदेशवर्णन- नामाष्टसप्ततितमसर्गः ॥ ७८ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह चित्र भी परमात्मा से उठे है । जैसे समुद्र में लीला से जलकणिका होती है तैसे ही परमात्मा से मन हुआ है । उस मन ने बड़े विस्तार का जगत् रचा है जो छोटे को बड़ा कर लेता है और बड़े को छोटा करता है, जो अपना आप रूप है उसको अन्य की नाईं दिखाता है और जो अन्य रूप है उसको अपना रूप दिखाता है अर्थात् आत्मा को अनात्मभाव प्राप्त करता है और अनात्मा को आत्मभाव प्राप्त करता है । ऐसा भ्रान्तिरूप मन निकट वस्तु को दूर दिखाता और दूर वस्तु को निकट दिखाता है—जैसे स्वप्ने में निकट वस्तु दूर भासती है और दूर वस्तु निकट भासती है । हे रामजी ! मन एक निमेष में संसार को उत्पन्न करता और एक निमेष में ही लीन कर लेता है । जो कुछ स्थावर-जङ्गमरूप जगत् भासता है वह सब मन ही से उपजा है और देश, काल, क्रिया और द्रव्य अनेक शक्ति विपर्ययरूप मन ही दिखाता है और अपने फुरने से नाना प्रकार के भाव अभाव को प्राप्त होता है । जैसे नट लीला करके नाना प्रकार के स्वांग रचता और सच को झूठ और झूठ को सच दिखाता है वैसे ही मन में जैसा फुरना दृढ़ होता है वैसे ही भासता है । जैसा-जैसा निश्चय चञ्चल मन में होता है उनके अनुसार इन्द्रियाँ भी विचरती हैं । हे रामजी ! जो मन से चेष्टा होती है वही सफल होती है, शरीर की चेष्टा मन बिना सफल नहीं होती । जैसे जैसा बेल का बीज होता है वैसा ही उसका फल होता है और प्रकार नहीं होता वैसे ही जो कुछ
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मन में निश्चय होता है वही सफल होता है। जैसे बालक मृत्तिका की सेना बनाता है और नाना प्रकार के उसके नाम रखता है वैसे ही मन भी संकल्प से जगत् रच लेता है। जैसे मिट्टी की सेना मिट्टी से भिन्न नहीं वैसे ही आत्मा में जो नाना प्रकार का जगत् कल्पता है वह आत्मा से भिन्न नहीं। जैसे संकल्प में मन नाना प्रकार अर्थों को कल्पता है वैसे ही जाग्रत् जगत् भी भ्रम से कल्पता है। हे रामजी! एक गोपद में मन अनेक योजन रच लेता है और कल्प का क्षण और क्षण का कल्प रच लेता है। जैसा कुछ मन में तीव्र संवेग होता है वैसा ही होकर भासता है, उसको रचने में विलम्ब नहीं लगता; जो कुछ देश काल पदार्थ हैं वह मन से उपजे हैं और सबका कारणरूप मन ही है। जैसे पत्र, फूल, फल, और टहनी वृक्ष से उपजे हैं वे वृक्षरूप हैं, जैसे समुद्र में लहरें होती हैं वे जलरूप हैं और जैसे अग्नि उष्णतारूप है, वैसे ही नाना प्रकार के स्वभाव मन से उपजे दृष्टि आते हैं और सब मनरूप हैं। हे रामजी! कर्त्ता-कर्म-क्रिया, द्रष्टा-दर्शन-दृश्य सब मन ही का फैलाव है। जैसे सुवर्ण से नाना प्रकार के भूषण भासते हैं और जब सुवर्ण का ज्ञान हुआ तब सब भूषण एक सुवर्ण ही भासता है, भूषण भाव नहीं भासता वैसे ही जब तक आत्मा का प्रमाद है तब तक द्वैत रूप जगत् भासता है और जब आत्मज्ञान होता है तब सब भ्रम मिट जाता है।
इति श्रीयोगवाशिष्टे उत्पत्तिप्रकरणे चित्तमाहात्म्यवर्णनन्नामै- कोनाशीतितमस्सर्गः ॥ ७६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! अब एक वृत्तान्त जो पूर्वकाल में हुआ है तुमको सुनाता हूँ। यह जगत् इन्द्रजालवत् है। जैसे मनरूपी इन्द्रजाल में यह जगत् स्थित है तैसे तुम सुनो। इस पृथ्वी में एक उत्तरपाद नाम देश था, उसमें एक बड़ा वन था और वहाँ नाना प्रकार के वृक्ष, फूल, फल और ताल थे जिन पर मोर आदिक अनेक प्रकार के पक्षी शब्द करते थे। फूलों से सुगन्धें निकलती थीं और विद्याधर, सिद्धगण और देवता आनकर विश्राम करते थे, किन्नर गान करते थे और मन्द-मन्द पवन चलता था। निदान उस स्थान में महासुन्दर रचना बनी थी और
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स्वर्णवत महाकल्पवृक्ष लगे थे । उस देश का लवण नाम राजा अति तेजवान् और धर्मात्मा राजा हरिश्चन्द्र के कुल में उपजा । उसका ऐसा तेज हुआ कि शत्रु उसका नाम स्मरण करे तो उसको ताप चढ़ जावे और वह श्रेष्ठ पुरुषों की पालना करे । उस राजा के यश से सम्पूर्ण पृथ्वी पूर्ण हो गई और स्वर्ग में देवता और विद्याधर यश गाते थे । उस राजा में लोभ और कुटिलता न थी और वह बड़ा बुद्धिमान् और उदार था । एक दिन सभा में बड़े ऊँचे सिंहासन पर वह बैठा था और सुन्दर स्त्रियों का नृत्य होता था, अतिसुन्दर बाजे बजते थे और मधुरध्वनि होती थी । राजा के शीश पर चमर झुलता था और मन्त्री और मण्डलेश्वरों की सेना आगे खड़ी राजा को देशमण्डल की वार्त्ता सुनाती थी । इतिहास आदि की पुस्तकें ढाँप के उठा रक्खी थीं और भाट स्तुति करते थे । केवल दो मुहूर्त्त दिन रह गया था उस काल में एक इन्द्रजाली बाजीगर आडम्बर संयुक्त सभा में आया और राजा से कहने लगा, हे राजन् ! आप मेरा एक कौतुक देखिये । इतना कहकर उसने अपना पिटारा खोला और उसमें से एक मोर की पूँछ निकालकर घुमाने लगा । उससे राजा को नाना प्रकार की रचना भासने लगी-मानो परमात्मा की माया है और नाना प्रकार के रङ्ग राजा ने देखे । उसी क्षण में किसी मण्डलेश्वर का दूत एक घोड़ा लेकर राजा के निकट आया और बोला, हे राजन् ! यह महाबलवान् घोड़ा राजा ने आपको दिया है । जैसे उच्चैःश्रवा इन्द्र का घोड़ा समुद्र मथने से निकला है तैसा ही यह है और इसका पवन के सदृश वेग है । मेरे स्वामी ने कहा है कि जो उत्तम पदार्थ है वह बड़ों को देना चाहिये और यह आपके योग्य है इससे आप इसे ग्रहण कीजिये । तब इन्द्रजाली बोला, हे राजन् ! आप इस घोड़े पर आरूढ़ हों, इस पर चढ़कर आप शोभा पावेंगे । इतना सुन राजा घोड़े की ओर देख मूर्च्छित हो गया और भय से मन्त्री भी उसे न जगावें और उसके हाथ पाँव भी कुछ न हिलें । जैसे कीचड़ में कमल अचल होता है तैसे ही राजा अचल हो गया और दो मुहूर्त्त पर्यन्त मूर्च्छित रहा । भाट और कवि जो स्तुति करते थे वे सब चुप हो रहे और मन्त्री और नौकर भय
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और संशय के समुद्र में डूब गये और उन्होंने जाना कि राजा के मन में कोई बड़ी चिन्ता उपजी है और सबके सब अति आश्चर्यवान् थे।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे इन्द्रजालोपाख्याने नृपमोहो नामाशीतितमस्सर्गः ॥८०॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! दो मुहूर्त के उपरान्त राजा चैतन्य हुआ और उसका अङ्ग हिलकर सिंहासन से गिरने लगा, तब राजा के मन्त्री और अन्य नौकरों ने उसकी भुजा पकड़ के थॉंभा परन्तु राजा की बुद्धि व्याकुल हो गई और बोले कि यह नगर किसका है यह सभा किसकी है और इसका कौन राजा है? जब इस प्रकार का वचन मन्त्रियों ने सुना तो शान्त हुए और प्रसन्न होकर कहने लगे, हे राजन्! आप क्यों व्याकुल हुए हैं? आपका मन तो निर्मल है और आप उदारात्मा हैं। जिन पुरुषों की प्रीति पदार्थों में होती है और आपात रमणीय भोगों में चित्त है उनका मन मोह से भर जाता और जो सन्त जन उदार हैं उनका चित्त निर्मल होता है। उनका मन मोह में कैसे पड़े? हे देव! जिनका चित्त भोगों की तृष्णा में बँधा है उनका मन मोह जाता और जो महापुरुष सन्त जन हैं उनका मन मोह में नहीं डूबता। जिसका चित्त पूर्ण आत्म-तत्त्व में स्थित हुआ है और बड़े गुणों से सम्पन्न हैं उनको शरीर के रहने और नष्ट होने में कुछ मोह नहीं उपजता, और जिनको आत्मतत्त्व का अभ्यास नहीं प्राप्त हुआ है और जो अविवेकी हैं उनका चित्त देश, काल, मन्त्र और औषध के वश से मोह को प्राप्त होता है। आपका चित्त तो विवेक भाव को ग्रहण करता है, क्योंकि आप नित्य ही नूतन कथा और शब्द सुनते हो। अब आप कैसे मोह से चलायमान हुए हो? जैसे वायु से पर्वत चलायमान हो वैसे ही आप चलायमान हुए हैं-यह आश्चर्य है! आप अपनी उदारता स्मरण कीजिये। इतना सुनकर राजा सावधान हुआ और उसके मुख की कान्ति उज्ज्वल हुई-जैसे शरत्काल की सूखी हुई मञ्जरी वसन्त ऋतु में प्रफुल्लित होती है तैसे ही राजा नेत्रों को खोल-कर देखने लगा और जैसे सूर्य राहु की ओर और सर्प नेवले की ओर देखता है तैसे ही इन्द्रजाली की ओर देखकर बोला, हे दुष्ट, इन्द्रजाली!
उत्पत्ति प्रकरण । ३५५
तूने यह क्या कर्म किया ? राजा से भी कोई ऐसा कर्म करता है ? जैसे जल बिना मछली कष्ट पाके फिर जल में प्रसन्न हो तैसे ही मैं हुआ हूँ । बड़ा आश्चर्य हे परमात्मा की अनन्त शक्ति है और अनेक प्रकार के पदार्थ फुरते हैं । मैंने दो मुहूर्त में क्या ही भ्रम देखा । मेरा मन सदा ज्ञान के अभ्यास में था सो तो मोह गया तो प्राकृत जीवों का क्या कहना है ? मैंने बड़ा आश्चर्य भ्रम देखा है । यह इन्द्रजाली मानों शम्बर दैत्य है कि उसने दो मुहूर्त में मुझको अनेक देश, काल और पदार्थ दिखाये । जैसे ब्रह्मा एक मुहूर्त में नाना प्रकार के पदार्थ रच लेवें वैसे ही एक मुहूर्त में इसने मुझको अनेक भ्रम दिखाये हैं । मैं सब तुम्हारे आगे कहता हूँ—मानो सारी सृष्टि इसके पिटारे में है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे राजाप्रबोधोनाम एकाशीतितमस्सर्गः ॥ ८१ ॥
राजा बोला, हे साधो ! मैं इस पृथ्वी का राजा हूँ और सब पृथ्वी में मेरी आज्ञा चलती है और मैं इन्द्र की नाईं सिंहासन पर बैठता हूँ जैसे स्वर्ग में इन्द्र के आगे देवता होते हैं तैसे ही मेरे आगे भृत्य और मन्त्री हैं । उदारता से मैं सम्पन्न हूँ पर मैंने बड़ा भ्रम देखा । हे साधो ! जब इस इन्द्रजाली ने पिटारे से मोर की पूँछ निकाल कर घुमाई तो वह मुझको सूर्य की किरणों की नाईं भासी और जैसे बड़ा मेघ गरज के शान्त हो जाता है और पीछे इन्द्रधनुष दीखता है तैसे ही वह विचित्र रूप पूँछ मुझको दीखी । फिर एक दूत घोड़ा लेकर आया उस पर मैं आरूढ़ हुआ और वह चित्त ही से मुझको दूर से दूर ले गया । जैसे भोगों की वासना से मूर्ख घर ही बैठे दूर से दूर भटकते फिरते हैं तैसे ही मुझको वह घोड़ा दूर से दूर ले गया । फिर वह मुझे एक महाभयानक निर्जन देश में ले गया जो प्रलयकाल के जले हुए स्थानों के समान था । वहाँ मानों दूसरा आकाश था और सात समुद्र थे और उनके समान एक आठवाँ समुद्र था । चारों दिशा के जो चार समुद्र वर्णन किये हैं उनके समान वह मानों पाँचवाँ समुद्र था निदान वह मुझे महाभयानक स्थानों और देशों को लाँघकर एक महावन में ले आया । जैसे ज्ञानी
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का चित्त आकाशवत् होता है और जैसे अज्ञानी का चित्त कठोर और शून्य होता है वैसे ही स्थान में मुझको ले गया, जहाँ घास, वृक्ष, जीव मनुष्य कोई भी दृष्टि न आता था वहाँ में महाकष्ट और दीनता को प्राप्त हुआ । जैसे धन और बान्धवों से और देश और बल से रहित पुरुष कष्ट पाता है वैसे ही में कष्टवान् हुआ । तब दिन का अन्त हो गया और वहाँ उजाड़ में कष्ट से मैंने रात बिताई और पृथ्वी पर सोया परन्तु निद्रा न आई और दुःख से कल्प समान रात्रि हो गई । जब सूर्य उदय हुआ तब में वहाँ से चला और आगे गया तो पक्षियों का शब्द सुना और वृक्ष देखे परन्तु खाने पीने को कुछ न पाया । इन वृक्षों को देखके में प्रसन्न हुआ—जैसे मृत्यु से छुटा पुरुष रोग से भी प्रसन्न हो—और एक जामुन के वृक्ष के नीचे बैठ गया—जैसे मार्कण्डेय ऋषि ने प्रलय के समुद्र में श्रमकर वट का आश्रय लिया था । तब वह घोड़ा मुझको छोड़ के चला गया और सूर्य अस्त हुआ तो मैंने वहाँ रात्रि बिताई परन्तु न कुछ भोजन किया और न जलपान किया और न स्नान ही किया । इससे मैं महादीन हुआ । जैसे कोई बिका मनुष्य दीन हो जाता है और जैसे अन्धकूप में गिरा मनुष्य कष्टवान् होता है तैसे ही में कष्टवान् हुआ और कल्प के समान रात्रि बीती । जब वहाँ अन्न पानी कुछ दृष्टि न आया तब मैं आगे गया जहाँ पक्षी शब्द करते थे । उस समय आधा पहर दिन रह गया था तब एक कन्या मुझे दिखाई दी जो अपने हाथ में मृत्तिका की एक मटका में पके हुए चावल और जांबू के रस का भरा हुआ पात्र लिए जाती थी । मैं उसके सम्मुख आया—जैसे रात्रि के सम्मुख चन्द्रमा आता है और कहा कि हे बाले ! मुझको भोजन दे, मैं क्षुधा से आतुर हूँ । जो कोई दीन आर्त्त को अन्न देता है वह बड़ी सम्पदा पाता है । हे साधो ! जब मैंने बारम्बार कहा तब उसने कहा तुम तो कोई राजा भासते हो कि नाना प्रकार के भूषण वस्त्र पहिने हुए हो, में तुम को भोजन न दूँगी । ऐसे कह के वह आगे चली और में भी उसके पीछे जैसे छाया जावे तैसे चला । मैं कहता जाता था कि हे बाले ! मुझे भोजन दे कि मेरी क्षुधा शान्त हो और वह कहती, हे राजन् ! हम नीच
उत्पत्ति प्रकरण । ३५७
लोग हैं अपने प्रयोजन बिना किसी को भोजन नहीं देते, जो तुम मेरे भर्त्ता होवो तो मैं तुमको यह अन्न अपने पिता के निमित्त ले चली हूँ दूँ । मेरा पिता मशान में वेताल की नाईं अवधूत हो बैठा है और घूर से अङ्ग भरे हैं, जो तुम मेरे भर्त्ता बनो तो मैं देती हूँ, क्योंकि भर्त्ता प्राणों से भी प्यारा होता है पिता से क्षमा करा लूँगी । मैंने कहा अच्छा मैं तुझसे विवाह करूँगा पर मुझे भोजन दे। हे साधो ! ऐसा कौन है जो ऐसी आपदा में अपने वर्णाश्रम के धर्म को दृढ रक्खे । उसने मुझको आधा भोजन और आधा जांबू का रस दिया, उसे भोजन कर मैं कुछ शान्तिमान् हुआ परन्तु मेरा मोह निवृत्त न हुआ । तब उसने मेरे दोनों हाथ पकड़ के मुझको आगे कर लिया और अपने पिता के निकट ले गई-जैसे पापी को यमदूत ले जाते हैं-और कहा, हे पिता ! यह मैंने भर्त्ता किया है । उसके पिता ने कहा अच्छा किया और ऐसा कहकर चावल और जांबू के रस का भोजन किया । फिर उसके पिता ने कहा, हे पुत्री ! इसको अपने घर ले जा । तब वह मुझको अपने घर ले गई और जब अपने घर के निकट गई तब मैंने देखा कि वहाँ अस्थि मांस और रुधिर है और कुत्ते, गर्दभ, हस्ति आदिक जीवों की खालें पड़ी हैं । उनको लाँघकर वह मुझे अपने घर में ले गई-जैसे पापी को नरक में यमदूत ले जाते हैं । वहाँ से एक बगीचा था उसमें जाकर वह अपनी माता के पास मुझे ले गई और कहा, हे माता ! यह तेरा जामातृ हुआ है । माता ने कहा अच्छी बात है । निदान उनके घर हमने विश्राम किया और उस चाण्डाली ने मुझको जो भोजन दिया उसको मैंने भोजन किया-मानों अनेक जन्मों के पाप भोगे । फिर विवाह का दिन नियत किया गया और उस दिन मैंने विवाह किया । चाण्डाल हँसते थे और नृत्य करते थे मानों मेरे पाप नृत्य करते थे ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे चाण्डालीविवाहवर्णनन्नाम द्व्यशीतितमसर्गः ॥ ८२ ॥
राजा बोले, हे साधो ! बहुत क्या कहूँ सात दिन तक विवाह का उत्साह रहा और फिर वहाँ मैं एक बड़ा चाण्डाल हुआ । आठ महीने
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यहाँ रहके फिर में और स्थानों में रहा। निदान वह चाण्डाली गर्भवती हुई और उससे एक कन्या उत्पन्न हुई जो शीघ्र ही बढ़ गई । तीन वर्ष पीछे एक बालक उत्पन्न हुआ और फिर एक पुत्र और एक कन्या और भी उत्पन्न हुई । इसी प्रकार उससे तीन पुत्र और तीन कन्या उत्पन्न हुई और में एक बड़ा परिवारवान् चाण्डाल हुआ । उस चाण्डाली सहित मैं चिरकाल पर्यन्त चाण्डालों में विचरता रहा और जैसे जाल में पक्षी बँध जाता है तैसे में उनमें बन्धवान् हुआ । हे साधो ! उनमें मैंने बड़े कष्ट पाये, प्रथम जिस शिर में रेशम का वस्त्र भी चुभता था उस पर में भार उठाऊँ; नीचे नंगे चरण जलें और शिर पर सूर्य तपै । रात्रि को में काँटों पर सोऊँ, कोई वस्त्र न मिले और जीव जन्तुओं के लोहू से भरे हुए और गीले पुराने कपड़े शिरहाने रक्खूँ । कुक्कुट, हस्ती आदिक अशुचि पदार्थों को भोजन करूँ और उनके रुधिर का पान करूँ। ऐसी मेरी चेष्टा हो गई कि जाल से पक्षी मारूँ, बंशी से मच्छ कच्छ आदिक पकड़ूँ, अनेक प्रकार के क्रूर नीच कर्म करूँ और जैसी कैसी वस्तु मिले उसे भोजन करूँ, निदान ऐसी व्यवस्था हो गई कि अस्थि मांस के निमित्त हम आपस में और शीतकाल में शीत से उष्णकाल में उष्णता से कष्टवान् हों । इससे मेरा शरीर बहुत कृश हो गया और अवस्था भी वृद्ध हुई, मशान्यों में हमारा बहुत काल व्यतीत हुआ और मांस और रक्त पान करते रहे। जो हस्ती आदिक पशु आवें उनको हम मारें-जैसे चण्डिका ने दैत्यों को मारा था और उनकी आँतड़ें और चमड़े तले बिछाके सोवें और शिरहाने रक्खें। ऐसे ही चिरकाल पर्यन्त हम चेष्टा करते रहे और बन्धुओं में बहुत स्नेह बढ़ गया पर वर्षाकाल की नदी की नाईं हमारी तृष्णा बढ़ती जाती थी। जिन मृत्तिका के पात्रों में चाण्डाल भोजन कर जाते थे उन्हीं बासनों में हम भी भोजन करते थे। कालवशात् वर्षा बन्द हो गई और अकाल पड़ा, सूर्य ऐसे तपने लगे मानों द्वादश सूर्य इकट्ठे तपते हैं और दावाग्नि वन में लगी है। वन के जीव अन्न जल के निमित्त कष्ट पाने लगे और अपना देश छोड़ के देशान्तर जाने लगे। निदान महा उपद्रव हुआ, समय बिना ही मानों प्रलय आया है तब क्षुधा और तृषा से कितने जीव मृतक हो गये,
उत्पत्ति प्रकरण । ३५६
कितने गिर पड़े और हमको भी बहुत कष्ट हुआ । तब हम तीनों पुत्रों, तीनों कन्याओं और स्त्री सहित वहाँ से निकले और जहाँ अन्नजल सुनें वहाँ जावें । फिर यह भी हाथ न आवे तब हम बहुत शोकवान् हुए और शरीर नीरस सा हो गया । निदान सब ऐसे कष्टवान् हुए कि पुत्र पिता को न सँभाले और पिता पुत्र को न सँभाले, बान्धवों का स्नेह आपस में छूट गया सब अपने अपने वास्ते दौड़े ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे इन्द्रजालोपाख्याने उपद्रववर्णनन्नाम त्र्यशीतितमसर्गः ॥ ८३ ॥
राजा बोले, हे सभा ! इस प्रकार हम चिरकाल तक विचरते फिरे, शरीर बहुत वृद्ध हो गया और बाल वरफ की नाईं श्वेत हो गये । जैसे सूखा पात वायु में विचरता है तैसे ही हम भी कर्मों के वश में भ्रमते रहे । जो कुछ राजा का अभिमान था वह मुझे विस्मरण हो गया और चाण्डालभाव दृढ़ हो गया । सब जीव कष्टवान् होके कलत्र को छोड़ गये और कितने पहाड़ पर चढ़कर दुःख के मारे गिर पड़े । और जैसे चिड़िया को बाज भोजन करता है तैसे ही जनों को भेड़िये भोजन करते थे । एक वृक्ष के नीचे मैंने विश्राम किया तब एक बालक जो सबसे छोटा था मेरे पास आया और बोला, हे पिता ! मुझको मांस दे कि मैं भोजन करूँ, नहीं तो मेरे प्राण निकलते हैं । तब मैंने कहा मांस तो नहीं है, उसने कहा कहीं से ला दे । छोटा पुत्र सबसे प्यारा होता है इससे मैंने कहा, हे पुत्र ! मेरा मांस है यह खा ले । तब उस दुर्बुद्धि ने कहा दे, मैंने बन से लकड़ियाँ इकट्ठी करके अग्नि जलाई और कहा, हे पुत्र ! मैं अग्नि में प्रवेश करता हूँ जब परिपक्व हो जाऊँ तब तू भोजन करना । हे सभा ! इस प्रकार मैंने स्नेह के वश कहा कि किसी प्रकार यह जीते रहें । ऐसे कहकर मैं चिता में घुस गया और जब मुझको उष्णता लगी तब में काँपा और तुमको दृष्टि आया । फिर कुछ सावधान हुआ और तुरियाँ बजने लगीं । हे साधो ! इस प्रकार मैंने चरित्र देखा सो तुम्हारे आगे कहा । जैसे मार्कण्डेय ने प्रलय में क्षोभ देखे और देवताओं से कहे तैसे ही मैंने तुमसे अपना वृत्तान्त कहा
३६० योगवाशिष्ठ ।
है। जब इन्द्रजाली ने पूँछ घुमाई थी तब उसके सामने में घोड़े पर आरूढ़ हुआ था और इतने काल प्रत्यक्ष भ्रम देखता रहा। बड़ा आश्चर्य्य है कि मेरे से विवेकवान् राजा को इसने मोहित किया तो और प्राकृत जीवों की क्या वार्त्ता है। वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब इस प्रकार तेजवान् राजा ने कहा तब वह साम्बरीक अन्तर्द्धान हो गया और सभा में जो मन्त्री आदि बैठे थे सब आश्चर्य्यवान् हुए और परस्पर देखके कहने लगे बड़ा आश्चर्य्य है! बड़ा आश्चर्य्य है!! भगवान् की माया विचित्ररूप है। यह साम्बरी माया नहीं है, क्योंकि साम्बरी अपने लोभ के निमित्त तमाशा दिखाता है पीछे यत्न से धन आदिक पदार्थ माँगता है, पर यह लिये बिना ही अन्तर्द्धान हो गया। यह ईश्वर की माया है जिससे ऐसा विवेकवान् राजा मोह गया। जो ऐसा बड़ा तेजवान् और शूरमा राजा मोहित हुआ तो सामान्य जीवों की क्या वार्त्ता है ? हे रामजी ! ऐसे संदेहवान् होकर सब स्थित हुए और मैं भी उस सभा में बैठा था। यह वृत्तान्त मैंने प्रत्यक्ष देखा है किसी के मुख से सुनके नहीं कहा। हे रामजी ! यह जो अनुरूप मन है सो महामोह और अविद्या है। इसके फुरने से अनेक प्रकार का मोह दीखता है। जब यह मन उपशम हो तभी कल्याण है। इससे इस मन में जो बहुत कल्पना उठती हैं उनको त्यागकर आत्मपद में स्थित करो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे साम्बरोपाख्यानसमाप्ति- वर्णनन्नाम चतुरशीतितमसर्गः ॥ ८४ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! आदि जो शुद्ध परमात्मा से चित्तसंवेदन फुरा है वह कलनारूप होके स्थित हुआ है, उसी से दृश्य सत्य हो भासता है। आत्मा के प्रमाद से मोह में प्राप्त हुआ है और चित्त के फुरने से चिर पर्यन्त जगत् में मग्न हो रहा है। वह मन असत्यरूप है और उस मन में ही सम्पूर्ण जगत् विस्तारा है जिससे अनेक दुःखों को प्राप्त हुआ है। जैसे बालक अपनी परछाहीं में वैताल कल्पकर आपही भयवान् होता है। वही मन जब संसार की वासना को त्यागकर आत्मपद में स्थित होता है तब जैसे सूर्य की किरणों से अन्धकार नष्ट हो जाता है वैसे ही एक क्षण में सब
उत्पत्ति प्रकरण । ३६१
दुःख नष्ट हो जाते हैं । हे रामजी ! ऐसा पदार्थ कोई नहीं जो अभ्यास किये से प्राप्त न हो । इसमें जब आत्मपद का अभ्यास कीजियेगा तब वह प्राप्त होगा । आत्मपद के अभ्यास किये से आत्मा निकट भासता है और संसार दूर भासता है । जब जगत् का अभ्यास दृढ होता है तब जगत् निकट भासता है और आत्मा दूर भासता है । हे रामजी ! जो मूर्ख मनुष्य है उसको अभयपद में भय होता है । जैसे पथिक को दूर से वृक्ष में वैताल कल्पना होती है और भय पाता है वैसे ही चित्त की वासना से जीव भय पाता है । हे रामजी ! वासना सहित मलीन मन में नाना प्रकार संसार भ्रम उठता है और जब आत्मपद में स्थित होता है तब भ्रम मिट जाता है । जैसा मन में निश्चय होता है तैसा ही हो भासता है, यदि मित्र में शत्रु बुद्धि होती है तो निश्चय करके वह शत्रु हो जाता है और मद से उन्मत्त हो सम्पूर्ण पृथ्वी भ्रमती दीखती है और व्याकुल होता है तो चन्द्रमा भी श्याम सा भासता है जो अमृत में विष की भावना होती है तो अमृत भी विष की नाईं भासता है । यह जाग्रत् पदार्थ देश, काल और क्रिया मन से भासते हैं । हे रामजी ! संसार का कारण मोह है, उससे जीव भटकता है । इसलिये ज्ञानरूपी कुल्हाड़े से वासनारूपी मलीनता को काटो, आत्मपद पाने में वासना ही आवरण है । हे रामजी ! वासनारूपी जाल में मनुष्यरूपी हरिण फंसकर संसाररूपी वन में भटकता है । जिस पुरुष ने विचार करके वासना नष्ट की है उसको परमात्मा का प्रकाश भासता है । जैसे बादल से रहित सूर्य प्रकाशित होता है तैसे ही वासना रहित चित्त में आत्मा प्रकाशता है । हे रामजी ! मन ही को तुम मनुष्य जानो, देह को मनुष्य न जानना क्योंकि देह जड़ है और मन जड़ और चेतन से विलक्षण है मन से किया हुआ कार्य सफल होता है । जो मन से दिया और जो मन से लिया है वही दिया और लिया है और जो देह से किया है वह भी मन ने ही किया है । हे रामजी ! यह सम्पूर्ण जगत् मनरूप है । मन ही पर्वत, आकाश, वायु, जल, अग्नि और पृथ्वी है सूर्यादिकों का प्रकाश मन ही से होता है । शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध सब मन ही से ग्रहण होते हैं और नाना
३६२ योगवाशिष्ट ।
प्रकार की वासनाओं से नाना प्रकार के रूप मन ही धरता है जैसे नटवा नाना प्रकार के स्वांग धारता है तैसे ही नाना प्रकार के रूप मन ही धरता है। लघु पदार्थ को मन ही दीर्घ करता है। सत्य को असत्य की नाईं और असत्य जगत् के पदार्थ को सत्य की नाईं मन ही करता है, और मन ही मित्र को शत्रु और शत्रु को मित्र करता है। हे रामजी ! जैसी वृत्ति मन की दृढ़ होती है वही सत्य हो भासती है। हरिश्चन्द्र को एक रात्रि में बारह वर्ष का अनुभव हुआ था और इन्द्र को एक मुहूर्त्त में युगों का अनुभव हुआ था और मन ही के दृढ़ निश्चय से इन्द्र ब्राह्मण के दशों पुत्र ब्रह्मापद को प्राप्त हुए थे। हे रामजी ! जो सुख से बैठे हुए को मन में कोई चिन्ता आन लगी तो सुख ही में उसको रौरव नरक हो जाता है और जो दुःख में बैठा है और मन में शान्त है तो दुःख भी सुख होता है। इससे जैसा निश्चय मन में होता है वैसा ही हो भासता है और जिस ओर मन का निश्चय होता है उसी ओर इन्द्रियों का समूह विचरता है। इन्द्रियों का आधारभूत मन है, जो मन टूट पड़ता है तो इन्द्रियाँ भिन्न भिन्न हो जाती हैं। जैसे तागे के टूटे से माला के दाने भिन्न भिन्न हो जाते हैं तैसे ही मन से रहित इन्द्रियाँ अर्थों से रहित भिन्न होती हैं, वास्तव में आत्मतत्त्व सबमें अधिष्ठान स्थित है और स्वच्छ, निर्विकार, सूक्ष्म, समभाव नित्य और सबका साक्षी-भूत और सब पदार्थों का ज्ञाता है। वह देह से भी अधिक सूक्ष्मरूप है अर्थात् अहंभाव के उत्थान से रहित चिन्मात्र है, उसमें मन के फुरने से संसार भासता है, वास्तव में द्वैतभ्रम से रहित है। सब जगत् आत्मा का किञ्चिन्मय रचा है और सबमें चेतनशक्ति व्यापी है। वायु में स्पन्द, पृथ्वी में कठोरता, सूर्य और अग्नि आदिक में प्रकाश, जल में द्रवता, और आकाश में शून्यता वही है और सब पदार्थों में वही चेतनशक्ति व्याप रही है। वास्तव में उसमें अनेकता नहीं है, मन से भासती है, शुक्ल पदार्थ को कृष्ण और देश, काल पदार्थ, क्रिया और द्रव्य को मन ही विपर्यय करता है। हे रामजी ! जैसे निश्चय मन में दृढ़ होता है वही सिद्ध होता है और मन बिना किसी पदार्थ का ज्ञान नहीं होता। हे रामजी ! जिह्वा से नाना प्रकार के भोजन करता है परन्तु मन और ठौर होता है तो उसका
उत्पत्ति प्रकरण । ३६३
कुछ स्वाद नहीं आता और नेत्रों से चित्त सहित देखता है तो रूप का ज्ञान होता है, इस कारण मन बिना किसी इन्द्रिय का उपाय सिद्ध नहीं होता और अन्धकार और प्रकाश भी मन बिना नहीं भासते । हे रामजी! सब पदार्थ मन से भासते हैं। जैसे नेत्रों में प्रकाश नहीं होता तो कुछ नहीं भासता तैसे ही विद्यमान पदार्थ भी मन बिना नहीं भासते । हे रामजी! इन्द्रियों से मन नहीं उपजा परन्तु मन से इन्द्रियाँ उपजी हैं और जो कुछ इन्द्रियों का विषय दृश्य जाल है वह सब मन से उपजा है। जिन पुरुषों ने मन वश किया है वही महात्मा पुरुष पण्डित हैं और उनको नमस्कार है । हे रामजी! यदि नाना प्रकार के भूषण और फूल पहिरे हुए स्त्री प्रीति से कण्ठ लगे पर जो चित्त आत्मपद में स्थित है तो वह मृतक के समान है अर्थात् उसको इष्ट अनिष्ट का राग-द्वेष कुछ नहीं उपजा । इष्ट अनिष्ट में राग-द्वेष मन ही उपजाता है, मन के स्थित हुए राग-द्वेष कुछ नहीं उपजता । हे रामजी ! एक वीतराग ब्राह्मण ध्यान स्थित वन में बैठा था और उसके हाथ को कोई वनचर जीव तोड़ ले गया परन्तु उसको कुछ कष्ट न हुआ क्योंकि मन उसका स्थिर था । यही मन फुरने से सुख को भी दुःख करता है और अपने में स्थित हुए दुःख को भी सुख करता है। हे रामजी ! कथा के सुनने में जो मन किसी और चिन्तवन में जाता है तो कथा के अर्थ समझ में नहीं आते और अपने गृह में बैठा है और मन के संकल्प से पहाड़ पर दौड़ता-दौड़ता गिर पड़ता है तो उसको अत्यन्त अनुभव होता है, सो मन का ही भ्रम है । जैसी फुरना मन में फुरती है वही भासती है। जैसे स्वप्न में एक क्षण में नदी, पहाड़ आकाशादिक पदार्थ भासने लगते हैं तैसे ही यह पदार्थ भी भासते हैं। हे रामजी ! अपने अन्तःकरण में सृष्टि भी मन के भ्रम से भासती है। जैसे जल के भीतर अनेक तरङ्ग होते हैं और वृक्ष में पत्र, फूल, फल टास होते हैं तैसे ही एक मन के भीतर जाग्रत्, स्वप्न आदिक भ्रम होते हैं जैसे सुवर्ण से भूषण अन्य नहीं होते तैसे ही जाग्रत् और स्वप्नावस्था भिन्न नहीं । जैसे तरङ्ग और बुद्बुदे जल से भिन्न नहीं और जैसे नटवा नाना प्रकार के स्वाँगों को लेकर
३६४ योगवाशिष्ठ ।
अनेकरूप धरता है तैसे ही मन वासना से अनेक रूप धरता है । हे रामजी ! जैसा स्पन्द में दृढ़ होता है तैसा ही अनुभव होता है । जैसे लवण राजा को भ्रम से चाण्डाली का अनुभव हुआ था तैसे ही यह जगत् का अनुभव मनोमात्र है, चित्त के भ्रम से भासता है । हे रामजी ! जैसी-जैसी प्रतिभा मन में होती है तैसा ही तैसा अनुभव होता है और यह सम्पूर्ण जगत् मनोमात्र है । अब जैसे तुम्हारी इच्छा हो वैसे करो । जैसा-जैसा फुरना मन में होता है तैसा-तैसा ही भासता है । मन के फुरने से देवता दैत्य और दैत्य देवता हो जाते हैं और मनुष्य नाग और वृक्ष हो जाते हैं जैसे लवण राजा ने आपदा का अनुभव किया था । हे रामजी ! मन के फुरने से ही मरना और जन्म होता है और संकल्प से ही पुरुष से स्त्री और स्त्री से पुरुष हो जाता है । पिता पुत्र हो जाता है और पुत्र पिता हो जाता है । जैसे नटवा शीघ्र ही अपने स्वाँग से अनेक रूप धरता है तैसे ही अपने संकल्प से मन भी अनेक रूप धरता है । हे रामजी ! जीव निराकार है, पर मन से आकार की नाईं भासता है । उस मन में जो मनन है वही मूढ़ता है, उस मूढ़ता से जो वासना हुई है उस वासणारूपी पवन से यह जीवरूपी पत्र भटकता है और संकल्प के वश हुआ सुख-दुःख और भय को प्राप्त होता है । जैसे तेल तिलों में रहता है तैसे ही सुख-दुःख मन में रहते हैं । जैसे तिलों को कोल्हू में पेरने से तेल निकलता है तैसे ही मन को पदार्थों के संयोग से सुख दुःख प्रकट भासते हैं । संकल्प से काल-क्रिया में दृढ़ता होती है और देश काल आदिक भी मन में स्थित होते हैं । जिनका मन फुरता है उनको नाना प्रकार का क्षोभवान् जगत् भासता है । हे रामजी ! जिनका मन आत्मपद में स्थित है उनको क्षोभ भी दृष्ट आता परन्तु मन आत्मपद से चलायमान नहीं होता । जैसे घोड़े का सवार रण में जा पड़ता है तो भी घोड़ा उसके वश रहता है तैसे ही उसका मन जो विस्तार की ओर जाता है तो भी अपने वश ही रहता है । हे रामजी ! जब मन की चपलता वैराग से दूर होती है तब मन वश हो जाता है । जैसे बन्धनों से हस्ती वश होता है तैसे ही जिस पुरुष का मन वश होता है
उत्पत्ति प्रकरण । ३६५
और संसार की ओर से निवृत्त होकर आत्मपद में स्थिर होता है वह श्रेष्ठ महापुरुष कहाता है। जिसका मन संसार की ओर धावता है वह दलदल का कीट है और जिसका मन अचल है और शास्त्र के अर्थरूपी संग और संसार की ओर से निवृत्त होकर एकाग्रभाव में स्थित हुआ है और आत्मपद के ध्यान में लगा हुआ है वह संसार के बन्धन से मुक्त होता है। हे रामजी ! जब मन से मनन दूर होता है तब शान्ति प्राप्त होती है—जैसे क्षीरसमुद्र से मन्दराचल निकला तो शान्त हुआ था। जिस पुरुष का मन भोगों की ओर प्रवृत्त होता है वह पुरुष संसाररूपी विष के वृक्ष का बीज होता है। हे रामजी ! जिसका चित्त स्वरूप से मूढ़ हुआ है और संसार के भोगों में लगा है वह बड़े कष्ट पाता है। जैसे जल के चक्र में आया तृण क्षोभवान् होता है तैसे ही यह जीव मनभाव को प्राप्त हुआ श्रम पाता है। इससे तुम इस मन को स्थित करो कि शान्तात्मा हो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे चित्तवर्णनन्नाम पञ्चाशीतितमस्सर्गः ॥ ८५ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह चित्तरूपी महाव्याधि है, उसकी निवृत्ति के अर्थ में तुमको एक श्रेष्ठ औषध कहता हूँ वह तुम सुनो कि जिसमें यत्न भी अपना हो, साध्य भी आप ही हो और औषध भी आप हो और सब पुरुषार्थ आप ही से सिद्ध होता है। इस यत्न से चित्तरूपी वैताल को नष्ट करो। हे रामजी ! जो कुछ पदार्थ तुमको रस संयुक्त दृष्टि आवें उनको त्याग करो। जब वाञ्छित पदार्थों का त्याग करोगे तब मन को जीत लोगे और अचलपद को प्राप्त होगे। जैसे लोहे से लोहा कटता है तैसे ही मन से मन को काटो और यत्न करके शुभगुणों से चित्तरूपी वैताल को दूर करो। देहादिक अवस्तु में जो वस्तु की भावना है और वस्तु आत्मतत्त्व में जो देहादिक की भावना है उनको त्यागकर आत्म-तत्त्व में भावना लगाओ। हे रामजी ! जैसे चित्त में पदार्थों की चिन्तना होती है तैसे ही आत्मपद पाने की चिन्तना से सत्यकर्म की शुद्धता लेकर चित्त को यत्न करके चैतन्यसंवित् की ओर लगाओ और सब वासना को त्याग के एकाग्रता करो तब परमपद की प्राप्ति होगी। हे
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रामजी ! जिन पुरुषों को अपनी इच्छा त्यागनी कठिन है वे विषयों के कीट हैं, क्योंकि अशुभ पदार्थ मूढ़ता से रमणीय भासते हैं उस अशुभ को अशुभ और शुभ को शुभ जानना यही पुरुषार्थ है। हे रामजी ! शुभ अशुभ दोनों पहलवान हैं, उन दोनों में जो बली होता है उसकी जय होती है। इससे शीघ्र ही पुरुष प्रयत्न करके अपने चित्त को जीतो। जब तुम अचित्त होगे तब यत्न बिना आत्मपद को प्राप्त होगे। जैसे बादलों के अभाव हुए यत्न बिना सूर्य भासता है तैसे ही आत्मपद के आगे चित्त का फुरना जो बादलवत् आवरण है उसका जब अभाव होगा तब अक्षयसिद्ध आत्मपद भासेगा जो चित्त के स्थित करने का मन्त्र भी आप से होता है। जिसको अपने चित्त वश करने की भी शक्ति नहीं उसको धिक्कार है वह मनुष्यों में गर्दभ है। अपने पुरुषार्थ से मन का वश करना अपने साथ परम मित्रता करनी है और अपने मन के वश किये बिना अपना आप ही शत्रु है अर्थात् मन के उपशम किये बिना घटीयन्त्र की नाईं संसारचक्र में भटकता है जिन मनुष्यों ने मन को उपशम किया है उनको परम लाभ हुआ है। हे रामजी ! मन के मारने का मन्त्र यही है कि दृश्य की ओर से चित्त को निवृत्त करे और आत्मचेतन संवित् में लगावे, आत्मचिन्तना करके चित्त को मारना सुखरूप है। हे रामजी ! इच्छा से मन पुष्ट रहता है। जब भीतर से इच्छा निवृत्त होती है तब मन उपशम होता है और जब मन उपशम होता है तब गुरु और शास्त्रों के उपदेश और मन्त्र आदिकों की अपेक्षा नहीं रहती । हे रामजी ! जब पुरुष असंकल्परूपी औषध करके चित्त-रूपी रोग काटे तब उस पद को प्राप्त हो जो सर्व और सर्वगत शान्त-रूप है। इस देह को निश्चय करके मूढ़ मन ने कल्पा है। इससे पुरु-षार्थ करके चित्त को अचित्त करो तब इस बन्धन से छुटोगे। हे रामजी ! शुद्ध चित्त आकाश में यत्न करके चित्त को लगाओ। जब चिरकाल पर्यन्त मन का तीव्र संवेग आत्मा की ओर होगा तब चेतन चित्त का भक्षण कर लेगा और जब चित्त का चिन्तत्व निवृत्त हो जावेगा तब केवल चेतनमात्र ही शेष रहेगा। हे रामजी ! जब जगत् की भावना से
उत्पत्ति प्रकरण । ३६७
तुम मुक्त होगे तब तुम्हारी बुद्धि परमार्थतत्त्व में लगेगी अर्थात् बोधरूप हो जावेगी । इससे इस चित्त को चित्त से ग्रास कर लो, जब तुम परम पुरुषार्थ करके चित्त को अचित्त करोगे तब महा अद्वैतपद को प्राप्त होगे । हे रामजी ! मन के जीतने में तुमको और कुछ यत्न नहीं, केवल एक संवेदन का प्रवाह उलटना है कि दृश्य की ओर से निवृत्त करके आत्मा की ओर लगाओ, इसी से चित्त अचित्त हो जावेगा । चित्त के क्षोभ से रहित होना परम कल्याण है, इससे क्षोभ से रहित हो जाओ । जिसने मन को जीता है उसको त्रिलोकी का जीतना तृण समान है। हे रामजी ! ऐसे शूरमा हैं जो कि शस्त्रों के प्रहार सहते हैं, अग्नि में जलना भी सहते हैं और शत्रु को मारते हैं तब स्वाभाविक फुरने के सहने में क्या कृपणता है ? हे रामजी ! जिनको अपने चित्त के उलटाने की सामर्थ्य नहीं वे नरों में अधम हैं । जिनको यह अनुभव होता है कि मैं जन्मा हूँ, मैं मरूँगा और मैं जीव हूँ, उनको वह असत्यरूप प्रमाद चपलता से भासता है । जैसे कोई किसी स्थान में बैठा हो और मन के फुरने से और देश में कार्य करने लगे तो वह भ्रमरूप है तैसे ही आपको जन्म-मरण भ्रम से मानता है । हे रामजी ! मनुष्य मनरूपी शरीर से इस लोक और परलोक में मोक्ष होने पर्यन्त चित्त में भटकता है । यदि चित्त स्थिर है तो तुमको मृत्यु का भय कैसे होता है । तुम्हारा स्वरूप नित्य शुद्धबुद्ध और सर्वविकार से रहित है । यह लोक आदिक भ्रम मन के फुरने से उपजा है, मन से भिन्न जगत् का कुछ रूप नहीं । पुत्र, भाई, नोकर आदिक जो स्नेह के स्थान हैं और उनके क्लेश से आपको क्लेशित मानते हैं वह भी चित्त से मानते हैं । जब चित्त अचित्त हो जावे तब सर्व बन्धनों से मुक्त हो । हे रामजी ! मैंने अधःऊर्ध्व सर्वस्थान देखे हैं, सब शास्त्र भी देखे हैं और उनको एकान्त में बैठकर बारम्बार विचारा भी है, शान्त होने का और कोई उपाय नहीं, चित्त का उपशम करना ही उपाय है । जब तक चित्त दृश्य को देखता है तब तक शान्ति प्राप्त नहीं होती और जब चित्त उपशम होता है तब उस पद में विश्राम होता है जो नित्य, शुद्ध, सर्वात्मा और सबके हृदय में चेतन आकाश परम
३६८ | योगवाशिष्ठ ।
शान्तरूप है । हे रामजी ! हृदयकाश में जो चेतन चक्र है अर्थात् जो ब्रह्माकार वृत्ति है उसकी ओर जब मन का तीव्र संवेग हो तब सब ही दुःखों का अभाव ही जावे । मन का मनन भाव उसी ब्रह्माकार वृत्तिरूपी चक्र से नष्ट होता है । हे रामजी ! संसार के भोग जो मन से रमणीय भासते हैं वे जब रमणीय न भासें तब जानिये कि मन के अङ्ग कटे । जो कुछ अहं और त्वं आदि शब्दार्थ भासते हैं वे सब मनोमात्र हैं । जब दृढ़ विचार करके इनकी अभावना हो तब मन की वासना नष्ट हो । जैसे हँसिये से खेती कट जाती है तैसे ही वासना नष्ट होने से परमतत्त्व शुद्ध भासता है । जैसे घटा के अभाव हुए शरदकाल का आकाश निर्मल भासता है तैसे ही वासना से रहित मन शुद्ध भासेगा । हे रामजी ! मन ही जीव का परम शत्रु है और इच्छा संकल्प करके पुष्ट हो जाता है । जब इच्छा कोई न उपजे तब आप ही निवृत्त हो जावेगा । जैसे अग्नि में काष्ठ डालिये तो बढ़ जाती है और यदि न डालिये तो आप ही नष्ट हो जाती है । हे रामजी ! इस मन में जो संकल्प कल्पना उठती है उसका त्याग करो तब तुम्हारा मन स्वतः नष्ट होगा । जहाँ शस्त्र चलते हैं और अग्नि लगती है, वहाँ शूरमा निर्भय होके जा पड़ते हैं और शत्रु को मारते हैं, प्राण जाने का भय नहीं रखते तो तुमको संकल्प त्यागने में क्या भय होता है ? हे रामजी ! चित्त के फैलाने से अनर्थ होता है और चित्त के अस्फुरण होने से कल्याण होता है—यह वार्ता बालक भी जानता है। जैसे पिता बालक को अनुग्रह करके कहता है तैसे ही मैं भी तुमको समझाता हूँ कि मनरूपी शत्रु ने भय दिया है और संकल्प कल्पना से जितनी आपदायें हैं वे मन से उपजती हैं। जैसे सूर्य की किरणों से मृगतृष्णा का जल दीखता है तैसे ही सब आपदा मन से दीखती हैं जिसका मन स्थिर हुआ है उसको कोई क्षोभ नहीं होता । हे रामजी ! प्रलयकाल का पवन चले, सप्त समुद्र मर्यादा त्यागकर इकट्ठे हो जावें और द्वादश सूर्य इकट्ठे होके तपें तो भी मन से रहित पुरुष को कोई विघ्न नहीं होता—वह सदा शान्तरूप है । हे रामजी ! मनरूपी बीज है, उससे संसारवृक्ष उपजा है, सात लोक उसके पत्र हैं और शुभ-अशुभ सुख-दुःख उसके फल हैं ।
उत्पत्ति प्रकरण । ३६६
वह मन संकल्प से रहित नष्ट हो जाता है और संकल्प के बढ़ने से अनर्थ का कारण होता है । इससे संकल्प से रहित उस चक्रवर्ती राजा-पद में आरूढ़ हुआ परमपद को प्राप्त होगा जिस पद में स्थित होने से चक्रवर्ती राज तृणवत् भासता है । हे रामजी ! मन के क्षीण होने से जीव उत्तम परमानन्द पद को प्राप्त होता है । हे रामजी ! सन्तोष से जब मन वश होता है तब नित्य, उदयरूप, निरीह, परमपावन, निर्मल, सम, अनन्त और सर्वविकार विकल्प से रहित जो आत्मपद शेष रहता है वह तुमको प्राप्त होगा ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे उत्पत्तिप्रकरणे मनशक्तिरूपप्रतिपादननाम षडशीतितमसर्गः ॥ ८६ ॥
वशिष्टजी बोले, हे रामजी ! जिसके मन में तीव्रसंवेग होता है उसका मन देखता है । अज्ञान से जो दृश्य का तीव्र संवेग हुआ है उससे चित्त जन्म-मरणादिक विकार देखता है और जैसा निश्चय मन में दृढ़ होता है उसी का अनुभव करता है, जैसा मन का फुरना फुरता है तैसा ही रूप हो जाता है । जैसे बरफ का शीतल और शुक्ल रूप है और काजल का कृष्ण रूप है, तैसे ही मन का चञ्चल रूप है । इतना सुन रामजी ने पूछा, हे ब्रह्मन् ! यह मन जो वेग अवेग का कारण चञ्चल रूप है उस मन की चपलता कैसे निवृत्त हो ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! तुम सत्य कहते हो, चञ्चलता से रहित मन नहीं दीखता; क्योंकि मन का चञ्चल स्वभाव ही है । हे रामजी ! मन में जो चञ्चलता फुरना मानसी शक्ति है वही जगत्आडम्बर का कारणरूप है । जैसे वायु का स्पन्द रूप है तैसे ही मन का चञ्चल रूप है जिसका मन चञ्चलता से रहित है उसको मृतक कहते हैं । हे रामजी ! तप और शास्त्र का जो सिद्धान्त है वह यही है कि मन के मृतकरूप को मोक्ष कहते हैं, उसके क्षीण हुए सब दुःख नष्ट हो जाते हैं । जब चित्तरूपी राक्षस उठता है तब बड़े दुःख को प्राप्त होता है और चित्त के लय होने से अनन्त सुखभोग प्राप्त होते हैं अर्थात् परमानन्दस्वरूप आत्मपद प्राप्त होता है । हे रामजी ! मन में चञ्चलता अविचार से सिद्ध है और विचार से नष्ट हो जाती है । चित्त की चञ्चलतारूप