भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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पृष्ठ 355, कुल 1734 में से

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३६० योगवाशिष्ठ ।

है। जब इन्द्रजाली ने पूँछ घुमाई थी तब उसके सामने में घोड़े पर आरूढ़ हुआ था और इतने काल प्रत्यक्ष भ्रम देखता रहा। बड़ा आश्चर्य्य है कि मेरे से विवेकवान् राजा को इसने मोहित किया तो और प्राकृत जीवों की क्या वार्त्ता है। वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब इस प्रकार तेजवान् राजा ने कहा तब वह साम्बरीक अन्तर्द्धान हो गया और सभा में जो मन्त्री आदि बैठे थे सब आश्चर्य्यवान् हुए और परस्पर देखके कहने लगे बड़ा आश्चर्य्य है! बड़ा आश्चर्य्य है!! भगवान् की माया विचित्ररूप है। यह साम्बरी माया नहीं है, क्योंकि साम्बरी अपने लोभ के निमित्त तमाशा दिखाता है पीछे यत्न से धन आदिक पदार्थ माँगता है, पर यह लिये बिना ही अन्तर्द्धान हो गया। यह ईश्वर की माया है जिससे ऐसा विवेकवान् राजा मोह गया। जो ऐसा बड़ा तेजवान् और शूरमा राजा मोहित हुआ तो सामान्य जीवों की क्या वार्त्ता है ? हे रामजी ! ऐसे संदेहवान् होकर सब स्थित हुए और मैं भी उस सभा में बैठा था। यह वृत्तान्त मैंने प्रत्यक्ष देखा है किसी के मुख से सुनके नहीं कहा। हे रामजी ! यह जो अनुरूप मन है सो महामोह और अविद्या है। इसके फुरने से अनेक प्रकार का मोह दीखता है। जब यह मन उपशम हो तभी कल्याण है। इससे इस मन में जो बहुत कल्पना उठती हैं उनको त्यागकर आत्मपद में स्थित करो।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे साम्बरोपाख्यानसमाप्ति- वर्णनन्नाम चतुरशीतितमसर्गः ॥ ८४ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! आदि जो शुद्ध परमात्मा से चित्तसंवेदन फुरा है वह कलनारूप होके स्थित हुआ है, उसी से दृश्य सत्य हो भासता है। आत्मा के प्रमाद से मोह में प्राप्त हुआ है और चित्त के फुरने से चिर पर्यन्त जगत् में मग्न हो रहा है। वह मन असत्यरूप है और उस मन में ही सम्पूर्ण जगत् विस्तारा है जिससे अनेक दुःखों को प्राप्त हुआ है। जैसे बालक अपनी परछाहीं में वैताल कल्पकर आपही भयवान् होता है। वही मन जब संसार की वासना को त्यागकर आत्मपद में स्थित होता है तब जैसे सूर्य की किरणों से अन्धकार नष्ट हो जाता है वैसे ही एक क्षण में सब

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