योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 354, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति प्रकरण । ३५६
कितने गिर पड़े और हमको भी बहुत कष्ट हुआ । तब हम तीनों पुत्रों, तीनों कन्याओं और स्त्री सहित वहाँ से निकले और जहाँ अन्नजल सुनें वहाँ जावें । फिर यह भी हाथ न आवे तब हम बहुत शोकवान् हुए और शरीर नीरस सा हो गया । निदान सब ऐसे कष्टवान् हुए कि पुत्र पिता को न सँभाले और पिता पुत्र को न सँभाले, बान्धवों का स्नेह आपस में छूट गया सब अपने अपने वास्ते दौड़े ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे इन्द्रजालोपाख्याने उपद्रववर्णनन्नाम त्र्यशीतितमसर्गः ॥ ८३ ॥
राजा बोले, हे सभा ! इस प्रकार हम चिरकाल तक विचरते फिरे, शरीर बहुत वृद्ध हो गया और बाल वरफ की नाईं श्वेत हो गये । जैसे सूखा पात वायु में विचरता है तैसे ही हम भी कर्मों के वश में भ्रमते रहे । जो कुछ राजा का अभिमान था वह मुझे विस्मरण हो गया और चाण्डालभाव दृढ़ हो गया । सब जीव कष्टवान् होके कलत्र को छोड़ गये और कितने पहाड़ पर चढ़कर दुःख के मारे गिर पड़े । और जैसे चिड़िया को बाज भोजन करता है तैसे ही जनों को भेड़िये भोजन करते थे । एक वृक्ष के नीचे मैंने विश्राम किया तब एक बालक जो सबसे छोटा था मेरे पास आया और बोला, हे पिता ! मुझको मांस दे कि मैं भोजन करूँ, नहीं तो मेरे प्राण निकलते हैं । तब मैंने कहा मांस तो नहीं है, उसने कहा कहीं से ला दे । छोटा पुत्र सबसे प्यारा होता है इससे मैंने कहा, हे पुत्र ! मेरा मांस है यह खा ले । तब उस दुर्बुद्धि ने कहा दे, मैंने बन से लकड़ियाँ इकट्ठी करके अग्नि जलाई और कहा, हे पुत्र ! मैं अग्नि में प्रवेश करता हूँ जब परिपक्व हो जाऊँ तब तू भोजन करना । हे सभा ! इस प्रकार मैंने स्नेह के वश कहा कि किसी प्रकार यह जीते रहें । ऐसे कहकर मैं चिता में घुस गया और जब मुझको उष्णता लगी तब में काँपा और तुमको दृष्टि आया । फिर कुछ सावधान हुआ और तुरियाँ बजने लगीं । हे साधो ! इस प्रकार मैंने चरित्र देखा सो तुम्हारे आगे कहा । जैसे मार्कण्डेय ने प्रलय में क्षोभ देखे और देवताओं से कहे तैसे ही मैंने तुमसे अपना वृत्तान्त कहा