भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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पृष्ठ 353
३५८योगवाशिष्ठ ।

यहाँ रहके फिर में और स्थानों में रहा। निदान वह चाण्डाली गर्भवती हुई और उससे एक कन्या उत्पन्न हुई जो शीघ्र ही बढ़ गई । तीन वर्ष पीछे एक बालक उत्पन्न हुआ और फिर एक पुत्र और एक कन्या और भी उत्पन्न हुई । इसी प्रकार उससे तीन पुत्र और तीन कन्या उत्पन्न हुई और में एक बड़ा परिवारवान् चाण्डाल हुआ । उस चाण्डाली सहित मैं चिरकाल पर्यन्त चाण्डालों में विचरता रहा और जैसे जाल में पक्षी बँध जाता है तैसे में उनमें बन्धवान् हुआ । हे साधो ! उनमें मैंने बड़े कष्ट पाये, प्रथम जिस शिर में रेशम का वस्त्र भी चुभता था उस पर में भार उठाऊँ; नीचे नंगे चरण जलें और शिर पर सूर्य तपै । रात्रि को में काँटों पर सोऊँ, कोई वस्त्र न मिले और जीव जन्तुओं के लोहू से भरे हुए और गीले पुराने कपड़े शिरहाने रक्खूँ । कुक्कुट, हस्ती आदिक अशुचि पदार्थों को भोजन करूँ और उनके रुधिर का पान करूँ। ऐसी मेरी चेष्टा हो गई कि जाल से पक्षी मारूँ, बंशी से मच्छ कच्छ आदिक पकड़ूँ, अनेक प्रकार के क्रूर नीच कर्म करूँ और जैसी कैसी वस्तु मिले उसे भोजन करूँ, निदान ऐसी व्यवस्था हो गई कि अस्थि मांस के निमित्त हम आपस में और शीतकाल में शीत से उष्णकाल में उष्णता से कष्टवान् हों । इससे मेरा शरीर बहुत कृश हो गया और अवस्था भी वृद्ध हुई, मशान्यों में हमारा बहुत काल व्यतीत हुआ और मांस और रक्त पान करते रहे। जो हस्ती आदिक पशु आवें उनको हम मारें-जैसे चण्डिका ने दैत्यों को मारा था और उनकी आँतड़ें और चमड़े तले बिछाके सोवें और शिरहाने रक्खें। ऐसे ही चिरकाल पर्यन्त हम चेष्टा करते रहे और बन्धुओं में बहुत स्नेह बढ़ गया पर वर्षाकाल की नदी की नाईं हमारी तृष्णा बढ़ती जाती थी। जिन मृत्तिका के पात्रों में चाण्डाल भोजन कर जाते थे उन्हीं बासनों में हम भी भोजन करते थे। कालवशात् वर्षा बन्द हो गई और अकाल पड़ा, सूर्य ऐसे तपने लगे मानों द्वादश सूर्य इकट्ठे तपते हैं और दावाग्नि वन में लगी है। वन के जीव अन्न जल के निमित्त कष्ट पाने लगे और अपना देश छोड़ के देशान्तर जाने लगे। निदान महा उपद्रव हुआ, समय बिना ही मानों प्रलय आया है तब क्षुधा और तृषा से कितने जीव मृतक हो गये,