योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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लवण राजा की सभा में आया तब में वहाँ था । मुझसे लवण और उसके मन्त्री ने पूछा कि यह कौन है ? तब मैंने उनसे जो कुछ कहा था वह तुमसे भी कहता हूँ । हे रामजी ! जो पुरुष राजसूय यज्ञ करता है उसको द्वादश वर्ष की आपदा प्राप्त होती है उस द्वादश वर्ष में वह अनेक दुःख देखता है । राजा लवण ने जो मन से यज्ञ किया इसलिये उसकी आपदा ही मन ही से प्राप्त हुई । स्वर्ग मे इन्द्र ने अपना दूत आपदा भुगवाने के निमित्त भेजा। वह साम्बरी का रूप होकर आया और राजा को चाण्डाल की आपदा भुगताकर फिर स्वर्ग में चला गया । हे रामजी ! जो कुछ मैंने प्रत्यक्ष देखा था वह तुमसे कहा । इससे मन ही करता है और मन ही भोगता है । जैसे जैसे दृढ़ संकल्प मन में फुरता है उसके अनुसार उसको सुखदुःख का अनुभव होता है। हे रामजी ! जब तक चित्त फुरता है तब तक आपदा प्राप्त होती है । जैसे ज्यों ज्यों कीकर का वृक्ष बढ़ता है त्यों त्यों कण्टक बढ़ते जाते हैं वैसे ही मन के फुरने से आपदा बढ़ती जाती है । जब मन स्थिर होता है तब आपदा मिट जाती है । इससे हे रामजी ! इस चित्तरूपी बरफ़ को विवेकरूपी तपन से पिघलाओ तब परम सार की प्राप्ति होगी । यह चित्त ही सकल जगत् आडम्बर का कारण है, उसको तुम अविद्या जानो । जैसे वृक्ष, विटप और तरु एक ही वस्तु के नाम हैं वैसे ही अविद्या, जीव, बुद्धि अहंकार सब फुरने के नाम हैं इसको विवेक से लीन करो । हे रामजी ! जैसा संकल्प दृढ़ होता है वैसा ही देखता है । हे रामजी ! वह कौन पदार्थ है जो यत्न करने से सिद्ध न हो ? जो हठ से न फिरे तो सब सिद्ध होता है । जैसे बरफ के बासनों को जल में डालिये तो जल से एकता ही हो जाती है तैसे ही आत्मबोध से सब पदार्थों की एकता हो जाती है । रामजी ने फिर पूछा, हे भगवन् ! आपने कहा कि सुख-दुःख सब मन ही में स्थिर हैं और मन की वृत्ति नष्ट होने से नष्ट ही जाते हैं सो चपल वृत्ति कैसे क्षय हो ! वशिष्ठजी बोले, हे रघुकुल में श्रेष्ठ और आकाश के चन्द्रमा ! मैं तुमसे मन के उप-शम की युक्ति कहता हूँ । जैसे सवार के वश घोड़ा होता है तैसे ही मन तुम्हारे वश रहेगा । हे रामजी ! सब भूत ब्रह्म ही में उपजे हैं ।