योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 380, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति प्रकरण । ३८५
उनकी उत्पत्ति तीन प्रकार की है-एक सात्त्विकी दूसरी राजसी और तीसरी तामसी । प्रथम शुद्ध चिन्मात्र ब्रह्म में जो कल्पना उठी है उसी बाह्यमुखी फुरने का नाम मन हुआ है वही ब्रह्मारूप है, उस ब्रह्मा ने जैसा संकल्प किया तैसे ही आगे देखा, उसने यह भुवन आडम्बर और उसमें जन्म, मरण और सुख, मोह आदिक संसरना कल्पा । इसी प्रकार अपने आरम्भ संयुक्त, जैसे बर्फ का कणुका समुद्र मे उपजकर सूर्य के तेज से लीन हो जावे तैसे ही आरम्भ से निर्वाण हो गया, संकल्प के वश से फिर उपजा और फिर लीन हो गया । इसी प्रकार कई अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड ब्रह्मा से उपज उपजकर लीन हो गये हैं और कितने होंगे और कितने वर्त्तमान हैं । अब जैसे मुक्त होते हैं सो सुनो । हे रामजी ! शुद्ध ब्रह्मतत्त्व से प्रथम मनसत्ता उपजी, उसने जब आकाश को चेता तब आकाश हुआ, उसके उपरान्त पवन हुआ, फिर अग्नि और जल हुआ और उसकी दृढ़ता से पृथ्वी हुई । तब चित्तशक्ति दृढ़ संकल्प से पाँच भूतों को प्राप्त हुई और अन्तःकरण जो सूक्ष्म प्रकृति है सो पृथ्वी, तेज और वायु से मिलकर धान्य में प्राप्त हुआ । उसको जब पुरुष भोजन करते हैं तब वह परिणाम होकर वीर्य और रुधिररूप होके गर्भ में निवास करता है, जिससे मनुष्य उपजता है । पुरुष जन्ममात्र से वेद पढ़ने लगता है, फिर गुरु के निकट जाता और क्रम से उसकी बुद्धि विवेक द्वारा चमत्कारवान् हो जाती है तब उसको ग्रहण और त्याग और शुभ अशुभ में विचार उपजता है । और निर्मल अन्तःकरण सहित स्थित होता है और क्रम से सप्तभूमिका चन्द्रमा की नाईं उसके चित्त में प्रकाशती हैं ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे उत्पत्तिप्रकरणे सात्त्विकजन्मावतारोनाम एकनवतितमस्सर्गः ॥ ६१ ॥
रामजी बोले, हे सर्वशास्त्रों के वेत्ता, भगवन् ! ज्ञान की वे सप्तभूमिका कैसे निवास करनेवाली हैं संक्षेप में मुझसे कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! अज्ञान की सप्तभूमिका हैं और ज्ञान की सप्तभूमिका हैं और उनके अन्तर्गत और बहुत अवस्था हैं कि उनकी कुछ संख्या नहीं परन्तु