भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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उत्पत्ति प्रकरण । ३६६

आत्मसत्ता प्रकाशती है । वह चेतनमात्र सत्ता एक, अज, आदि-मध्य, अन्त से रहित है, उससे जो स्पन्द फुरा है वह संकल्परूप ब्रह्मा होकर स्थित हुआ है और उसने नाना प्रकार का जगत् रचा है वह शून्यरूप है, मूर्ख बालक को सत्यरूप भासता है । जैसे बालक को परछाहिं में बैताल भासता है और जीवों को अज्ञान से देहाभिमान होता है तैसे ही असत्यरूप ही सत्य-रूप होकर भासता है । जब सम्यक्ज्ञान होता है तब लीन हो जाता है । जैसे समुद्र से तरङ्ग उपजकर समुद्र में लीन होते हैं तैसे ही आत्मा में जगत् उपजकर आत्मा में लीन होता है ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे आर्षे महारामायणे सप्तनवतितमस्सर्गः ॥ ६७ ॥
समाप्तमिदं उत्पत्तिप्रकरणं तृतीयम् ॥ ३ ॥