भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 395, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 395

श्रीपरमात्मने नमः ॥

श्रीयोगवाशिष्ठ

चतुर्थ स्थिति प्रकरण प्रारम्भ ।


वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! अब स्थितिप्रकरण सुनिये जिसके सुनने से जगत् निर्वाणता को प्राप्त हो । कैसा जगत् है कि जिसके आदि अहन्ता है । ऐसा जो दृश्यरूप जगत् है सो भ्रान्तिमात्र है । जैसे आकाश में नाना प्रकार के रङ्गों सहित इन्द्रधनुष असतरूप है तैसे ही यह जगत् है। जैसे द्रष्टा बिना अनुभव होता है और निद्रा बिना स्वप्न और भविष्यत् नगर भासता है तैसे ही भ्रम से चित्त में जगत् स्थित हुआ है । जैसे वानर रेत इकट्ठी करके अग्नि की कल्पना करते हैं पर उससे शीत निवृत्त नहीं होती, भावनामात्र अग्नि होती है, तैसे ही यह जगत् भावनामात्र है। जैसे आकाश में रत्न मणि का प्रकाश और गन्धर्वनगर भासता है और जैसे म्रगतृष्णा की नदी भासती है तैसे ही यह असतरूप जगत् भ्रम से सतरूप हो भासता है । जैसे दृढ़ अनुभव से संकल्प भासता है पर वह असतरूप है और जैसे कथा के अर्थ चित्त में भासते हैं तैसे ही निःसार-रूप जगत् चित्त में साररूप हो भासता है । जैसे स्वप्न में पहाड़ और नदियाँ भास आती हैं, तैसे ही सब भूत बड़े भी भासते हैं पर आकाशवत् शून्यरूप । स्वप्न में अङ्गना से प्रेम करना अर्थ से रहित और असत् रूप है सिद्ध नहीं होता तैसे ही यह भी प्रत्यक्ष भासता है परन्तु वास्तव में कुछ नहीं, अर्थ से रहित है जैसे चित्र की लिखी कमलिनी सुगन्ध से रहित होती है तैसे ही यह जगत् शून्यरूप है । जैसे आकाश में इन्द्रधनुष और केले का थम्भ सुन्दर भासता है परन्तु उसमें कुछ सार नहीं निकलता तैसे ही यह जगत् देखने में रमणीय भासता है परन्तु अत्यन्त असतरूप है, इसमें सार कुछ नहीं निकलता । देखने में प्रत्यक्ष