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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

श्रीपरमात्मने नमः ॥

श्रीयोगवाशिष्ठ

चतुर्थ स्थिति प्रकरण प्रारम्भ ।


वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! अब स्थितिप्रकरण सुनिये जिसके सुनने से जगत् निर्वाणता को प्राप्त हो । कैसा जगत् है कि जिसके आदि अहन्ता है । ऐसा जो दृश्यरूप जगत् है सो भ्रान्तिमात्र है । जैसे आकाश में नाना प्रकार के रङ्गों सहित इन्द्रधनुष असतरूप है तैसे ही यह जगत् है। जैसे द्रष्टा बिना अनुभव होता है और निद्रा बिना स्वप्न और भविष्यत् नगर भासता है तैसे ही भ्रम से चित्त में जगत् स्थित हुआ है । जैसे वानर रेत इकट्ठी करके अग्नि की कल्पना करते हैं पर उससे शीत निवृत्त नहीं होती, भावनामात्र अग्नि होती है, तैसे ही यह जगत् भावनामात्र है। जैसे आकाश में रत्न मणि का प्रकाश और गन्धर्वनगर भासता है और जैसे म्रगतृष्णा की नदी भासती है तैसे ही यह असतरूप जगत् भ्रम से सतरूप हो भासता है । जैसे दृढ़ अनुभव से संकल्प भासता है पर वह असतरूप है और जैसे कथा के अर्थ चित्त में भासते हैं तैसे ही निःसार-रूप जगत् चित्त में साररूप हो भासता है । जैसे स्वप्न में पहाड़ और नदियाँ भास आती हैं, तैसे ही सब भूत बड़े भी भासते हैं पर आकाशवत् शून्यरूप । स्वप्न में अङ्गना से प्रेम करना अर्थ से रहित और असत् रूप है सिद्ध नहीं होता तैसे ही यह भी प्रत्यक्ष भासता है परन्तु वास्तव में कुछ नहीं, अर्थ से रहित है जैसे चित्र की लिखी कमलिनी सुगन्ध से रहित होती है तैसे ही यह जगत् शून्यरूप है । जैसे आकाश में इन्द्रधनुष और केले का थम्भ सुन्दर भासता है परन्तु उसमें कुछ सार नहीं निकलता तैसे ही यह जगत् देखने में रमणीय भासता है परन्तु अत्यन्त असतरूप है, इसमें सार कुछ नहीं निकलता । देखने में प्रत्यक्ष

स्थिति प्रकरण । ४०१

अनुभव होता है परन्तु मृगतृष्णा की नदीवत् असतरूप है। रामजी ने पूछा, हे भगवन् सर्व संशयों के नाशकर्त्ता ! जब महाकल्प क्षय होता है तब दृश्यमान सब जगत् आत्मरूप बीज में लीन होता है। जैसे बीज में अंकुर रहता है, उससे उपजता है उसी में स्थित होता है और फिर उसी में लीन होता है। यह बुद्धि ज्ञान की है अथवा अज्ञान की ? सर्व संशयों की निवृत्ति के अर्थ मुझसे स्पष्ट करके कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार महाकल्प के क्षय होने पर बीजरूप आत्मा में जगत् स्थित होता है। जो ऐसे कहते हैं वह परम अज्ञानी और महा-मूर्ख बालक हैं जो ब्रह्म को जगत् का कारण बीज से अंकुर की नाईं कहते हैं वह मूर्ख हैं। बीज तो दृश्यरूप इन्द्रिय का विषय होता है। जैसे वटबीज में अंकुर होता है और फिर विस्तार पाता है सो इन्द्रियों का विषय है और जो मन सहित षट् इन्द्रियों से अतीत है, अर्थात् इन्द्रियों का विषय नहीं आकाश से भी अधिक निर्मल है, उसको जगत् का बीज कैसे कहिए ? जो आकाश से भी अधिक सूक्ष्म, परम उत्तम अनुभव से उपलब्ध और नित्य प्राप्त है उसको बीजभाव कहना नहीं बनता। हे रामजी ! जो कि शान्त, सूक्ष्म, सदा प्रकाशसत्ता है और जिसमें दृश्य जगत् असतरूप है उसको बीजरूप कैसे कहिये ? और जब बीजरूप कहना नहीं बनता तब उसे जगत् कैसे कहिये ? आकाश से भी अधिक सूक्ष्म निर्मल परमपद में सुमेरु, समुद्र, आकाश आदिक जगत् नहीं बनता । जो किञ्चन और अकिञ्चन है और निराकार, सूक्ष्म सत्ता है उसमें विद्यमान जगत् कैसे हो ? वह महासूक्ष्मरूप है और दृश्य उससे विरुद्धरूप है जैसे धूप में छाया नहीं, जैसे सूर्य में अंधकार नहीं, जैसे अग्नि में बरफ़ नहीं, और जैसे अणु में सुमेरु नहीं होता, तैसे ही आत्मा में जगत् नहीं होता । सत्यरूप आत्मा में असत्यरूप जगत् कैसे हो ? वट का बीज साकाररूप होता है और निराकाररूप आत्मा में साकाररूप जगत् होना अयुक्त है। हे रामजी ! कारण दो प्रकार का होता है—एक समवाय कारण और दूसरा निमित्तकारण, आत्मा दोनों कारणों से रहित है । निमित्तकारण तब होता है जब कार्य से कर्त्ता भिन्न हो,

४०२ योगवाशिष्ठ ।

पर आत्मा तो अद्वैत है, उसके निकट दूसरी वस्तु नहीं है, वह कर्त्ता कैसे हो और किसका हो, सहकारी भी नहीं जिससे कार्य करे, वह तो मन और इन्द्रियों से रहित निराकार अविकृतरूप है और समवाय कारण भी परिणाम से होता है। जैसे वट बीज परिणाम से वृक्ष होता है, पर आत्मा तो अच्युतरूप है, परिणाम को कदाचित् नहीं प्राप्त होता तो समवाय कारण कैसे हो ? जायते, अस्ति, वर्धते, विपरिणमते, क्षीयते, नश्यति, इन षट् विकारों से रहित निर्विकार आत्मा जगत् का कारण कैसे हो ? इससे यह जगत् अकारणरूप भ्रान्ति से भासता है। जैसे आकाश में नीलत्ता, सीप में रूपा निद्रादोष से स्वप्न दृष्टि भासते हैं तैसे ही यह जगत् भ्रान्ति से भासता है और जब स्वरूप में जागे तब जगद्भ्रम मिट जाता है। इससे कारणकार्य भ्रम को त्यागकर तुम अपने स्वरूप में स्थित हो। दुर्बोध से संकल्प रचना हुई है उसको त्याग करो और आदि, मध्य और अन्त से रहित जो सत्ता है उसी में स्थित हो तब जगद्भ्रम मिट जावेगा। इति श्रीयोगवाशिष्ठे स्थितिप्रकरणे जगत् निराकरणन्नाम प्रथमसर्गः ॥ १ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे देवताओं में श्रेष्ठ, रामजी ! बीज से अंकुरवत् आत्मा से जगत् का होना अङ्गीकार कीजिये तो भी नहीं बनता, क्योंकि आत्मा सर्वकल्पनाओं से रहित महाचैतन्य और निर्मल आकाशवत् है, उसको जगत् का बीज कैसे मानिये ? बीज के परिणाम में अंकुर होता है, और कारण समवायियों से होता है, आत्मा में समवाय और निमित्त सहकारी कदाचित् नहीं बनते। जैसे बन्ध्या स्त्री की सन्तान किसी ने नहीं देखी तैसे ही आत्मा से जगत् नहीं होता। जो समवाय और निमित्तकारण बिना पदार्थ भासे तो जानिये कि यह है नहीं, भ्रान्तिमात्र भासता है। आत्मसत्ता अपने आप में स्थित है। और सृष्टि स्थित, प्रलय से ब्रह्मसत्ता ही अपने आप में स्थित है। जो इस प्रकार स्थिति है तो कारण कार्य का क्रम कैसे हो और जो कारण कार्य भाव न हुआ तो पृथ्वी आदिक भूत कहाँ से उपजे ? और जो कारण कार्य मानिये तो पूर्व जो विकार कहे हैं उनका दूषण आता है। इससे न कोई कारण है और न कार्य है, कारण कार्य बिना जो पदार्थ भासे

स्थिति प्रकरण । ४०३

उसको सत्रूप जाने । वह मूर्ख बालक और विवेक से रहित है जो उसे कार्य कारण मानता है—इससे यह जगत् न आगे था, न अब है और न पीछे होगा—स्वच्छ चिदाकाशसत्ता अपने आप में स्थित है । जब जगत् का अत्यन्त अभाव होता है तब सम्पूर्ण ब्रह्म ही दृष्टि आता है । जैसे समुद्र में तरङ्ग भासते हैं तैसे ही आत्मा में जगत् भासता है—अन्यथा कारण कार्यभाव कोई नहीं और न प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव और अन्योन्याभाव ही है । प्रागभाव उसे कहते हैं कि जो प्रथम न हो, जैसे प्रथम पुत्र नहीं होता और पीछे उत्पन्न होता है । और जैसे मृत्तिका से घट उत्पन्न होता है । प्रध्वंसाभाव वह है जो प्रथम होकर नष्ट हो जाता है, जैसे घट था और नष्ट हो गया । अन्योन्याभाव वह है, जैसे घट में पट का अभाव है और पट में घट का अभाव है । ये तीन प्रकार के अभाव जिसके हृदय में हैं उसको जगत् दृढ़ होता है और उसको शान्ति नहीं होती । जब जगत् का अत्यन्ताभाव दीखता है तब चित्त शान्तिमान् होता है । जगत् के अत्यन्ताभाव के शिवाय और कोई उपाय नहीं और अशेष जगत् की निवृत्ति बिना मुक्ति नहीं होती सूर्य आदि लेकर जो कुछ प्रकाश पृथ्वी आदिक तत्त्व, क्षण, वर्ष, कल्प आदिक काल और मैं, यह, रूप, अवलोक, मनस्कार इत्यादिक जगत् सब संकल्पमात्र है और कल्प, कल्पक, ब्रह्माण्ड, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र से कीट आदि पर्यन्त जो कुछ जगत् जाल है वह उपज उपजकर अन्तर्धान हो जाता है । महाचैतन्य परम आकाश में अनन्त वृत्ति उठती है । जैसे जगत् के पूर्व शान्त सत्ता थी तैसे ही तुम अब भी जानो और कुछ नहीं हुआ । परमाणु के सहस्रांश की नाईं सूक्ष्म चित्तकला है, उस चित्तकला में अनन्त कोटि सृष्टियाँ स्थित हैं, वही चित्तसत्ता फुरने से जगतरूप हो भासती है और प्रकाशरूप और निराकार शान्तरूप है, न उदय होता है, न अस्त होता है, न आता है और न जाता है । जैसे शिला में रेखा होती है तैसे आत्मा में जगत् है । जैसे आकाश में आकाशसत्ता फुरती है तैसे ही आत्मा में जगत् फुरता है और आत्मा ही में स्थित है । निराकार निर्विकाररूप विज्ञान घनसत्ता अपने आप में स्थित और उदय और अस्त से रहित, विस्तृतरूप है । हे

३६८ * योगवाशिष्ठ *

हो जायगा। संसाररूपी वृक्ष के सुमेरु आदिक पर्वत पत्ते हैं, तारागण कली और फूल हैं; मानों समुद्र रस हैं; जन्म-मरण बेल है, सुख-दुःख फल हैं और वह आकाश, दिशा, पाताल को धारण किये स्थित है। अहंकाररूपी वृक्ष पृथ्वी पर उत्पन्न हुआ है; अहंकार ही उसका बीज है। यह वृक्ष मिथ्या भ्रममात्र, असत्य और सत्य की नाईं स्थित है। इससे अहंकाररूप बीज का नाश करो और निरहंकाररूपी अग्नि में इसको जलाओ, तब इसका अत्यन्त अभाव हो जावेगा। यह भ्रम के कारण भय देता है, जैसे रज्जू में सर्पभ्रम डराता है। इससे निरहंकाररूपी अग्नि से उसका नाश करो।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शताधिकद्वात्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ १३२ ॥

भुशुण्डिजी बोले, हे विद्याधर ! यह ज्ञान जैसे उत्पन्न होता है सो सुनो। ब्रह्मविद्या-शास्त्र के सुनने और आत्मविचार में यह उपजता है। उस आत्मज्ञानरूपी अग्नि में संसाररूपी वृक्ष को जलाओ। यह आगे भी नहीं था, असत्त्वहीन ही उदय हुआ है और मन के संकल्प में विद्यमान की नाईं स्थित है। जैसे पत्थर में शिल्पी कल्पना करता है कि इतनी पुतलियाँ निकलेंगी, सो हुई कुछ नहीं, वैसे ही मनरूपी शिल्पी यह विश्वरूपी पुतलियाँ कल्पना में लाता है। जब मन का नाश करोगे, तब संसारभ्रम मिट जावेगा; आत्मविचार करके परमपद को प्राप्त होगे और अपना रूप परमात्मारूप प्रत्यक्ष भासित होगा। इसमें अहंता को त्याग कर अपने स्वरूप में स्थित होओ। हे विद्याधर ! यह संसाररूपी वृक्ष अहंतारूपी बीज से उपजता है। उसको जब ज्ञानरूपी अग्नि से जलाओगे, तब फिर यह जगत् न उपजेगा। यदि इसको विचार करके देखिये, तो अहं-त्व नहीं रहता।

हे विद्याधर ! यह अहं-त्व मिथ्या है—इसके अभाव की भावना करो यही उत्तम ज्ञान है। हे साधो ! जब गुरु के वचन सुनकर उनके अनुसार पुरुषार्थ करे, तब परमपद को प्राप्त होता है और जय होती है। हे विद्यारूपी कन्दरा को धारण करनेवाले, पर्वत, और विद्यारूपी पृथ्वी को धारण करनेवाले शेषनाग ! यह संसार एक आडम्बर है। इसके

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ३६६

सुमेरु जैसे कई खम्भे हैं जो रत्नों की पंक्ति से जड़े हुए हैं। वन, दिशा, पहाड़, वृक्ष, कन्दरा, वैताल, देवता, पाताल, आकाश, इत्यादिक सारा ब्रह्माण्ड उनके ऊपर स्थित है। रात्रि, दिन, भूत, प्राणी और इनके जो घर हैं सो चौपड़ के खाने हैं। जो जैसा कर्म करता है, वह उसके अनुसार दुःख-सुख भोगता है। ऐसे ही यह जो क्रियासंयुक्त सम्पूर्ण प्रपञ्च दिखाई देता है सो भ्रम से सिद्ध है—इसलिए मिथ्या है। जैसे स्वप्न की सृष्टि संकल्प से भासित होती है, वैसे ही यह सृष्टि भी भ्रम से भासित होती है और अज्ञान की रची हुई है। आत्मा के अज्ञान से भासित होती है और आत्मा के ज्ञान से लीन हो जाती है। जब सृष्टि है तब भी परमात्मतत्त्व ही है और जब सृष्टि न होगी तब भी परमात्मतत्त्व ही होगा। आगे भी वही था। यह जो कुछ प्रपञ्च तुझे दीखता है सो शून्य आकाश ही है। त्रिगुणमय प्रपञ्च गुणों का रचा हुआ अपने स्वरूप के प्रमाद से स्थित हुआ है। आत्मज्ञान से यह शून्य सदृश हो जावेगा। जब प्रपञ्च ही शून्य हुआ, तब आत्मा और अनात्मा का कहना भी न रहेगा। पीछे जो शेष रहेगा, वह केवल शुद्ध परमतत्त्व और तेरा अपना रूप है। उसमें स्थित हो रहे और दृश्य का त्याग-कर। यह विचार कि न मैं हूँ और न जगत् है। जब तू ऐसा होगा, तब तेरी जय होगी। आत्मपद सबसे उत्तम है। जब तू आत्मपद में स्थित होगा, तब सबसे उत्तम होगा और तेरी जय होगी—इससे आत्मपद में ही स्थित हो।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे संगराडम्बरोत्पत्ति- नाम शताधिकत्रयस्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ १३३ ॥

भुशुण्डिजी बोले, हे विद्याधर ! यह प्रपञ्च भी आत्मा का चमत्कार है। आत्मा शुद्ध चैतन्य है, जिसमें जड़ और चेतन स्थित हैं। वह सबका अधिष्ठान है। वह सत्तामात्र तेरा अपना रूप है। वह अहं-त्वं शब्द-अर्थ से रहित आत्मत्वमात्र है, पर सत्यस्वरूप होकर असत्य की भाँति स्थित है। हे विद्याधर ! तू इस जड़ और चेतन से अबोध हो रह। जब तू अबोध होगा, तब शान्त और चिद्घन होगा। ये जो

४०० * योगवासिष्ठ *

जड़ और चेतन हैं, इन दोनों का परमार्थ चैतन्य के ऊपर आवरण है । यद्यपि वह अदृश्य है तो भी इनके भीतर ही रहता है, जैसे समुद्र के भीतर बड़वाग्नि रहती है । इन जड़-चेतन रूपों का कारणरूप वही है । इनकी उत्पत्ति भी उर्मी में होती है, और नाश भी वही करता है । हे विद्याधर ! जब ऐसे जाना कि मैं चेतनरूप भी नहीं और जड़ भी नहीं तो पीछे जो रहेगा, वही तेरा स्वरूप है । जब तेरे भीतर इन जड़ और चेतन, दोनों का स्पर्श नहीं हुआ, तब सबके भीतर जो चैतन्य है, वही ब्रह्म तुझे भासित होगा । विश्व और आत्मा में कुछ अन्तर नहीं हुआ । जैसे सूर्य की किरणों का चमत्कार जलाभास होता है, वैसे ही शुद्ध चैतन्य का चमत्कार विश्व होकर दिखता है ।

हे अङ्ग ! जैसे दीवाल पर पुतलियाँ लिखी होती हैं तो वे दीवाल में भिन्न चितेरे ने नहीं लिखी हैं, वैसे ही शून्य आकाश में चित्तरूपी चितेरे ने विश्वरूपी पुतलियों की कल्पना की है । जैसे सुवर्ण कल्पित भूषण सुवर्ण से भिन्न नहीं, वैसे ही आत्मा में अज्ञान से जो विश्व देखते हैं, वह आत्मा से भिन्न नहीं । जगत, ब्रह्म, आत्मा, आकाश, देश, काल सब उर्मी तत्त्व की संज्ञा है । वही शुद्ध चैतन्य आकाश है, जिसका चमत्कार ऐसे स्थित है । उर्मी तत्त्व में तू भी स्थित हो रह । यह जगत् ऐसे है, जैसे दूर-दृष्टि से आकाश में बादल हाथी की मूँड़ में लगते हैं । यह जो अहं-त्वं-रूप जगत् है सो अबोध से भासित होता और बोध से लीन हो जाता है—जैसे मरुस्थल में सूर्य की किरणों में जल दिखता है, वैसे ही यह जगत् है—इसमें डमका त्याग करो ।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे चित्तचमत्कारो नाम शताधिकचतुस्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ १३४ ॥

भुशुण्डिजी बोले, हे विद्याधर ! यह सब स्थावर जङ्गम जगत् आत्मा में उत्पन्न हुआ है और आत्मा ही में स्थित है । आत्मा ही विश्व में स्थित है । जैसे स्वप्न का विश्व स्वप्न देखनेवाले में स्थित होता है । आत्मा किसी का कारण नहीं; क्योंकि अद्वैत है । हे अङ्ग ! जो तू उस पद के पाने की इच्छा करता है तो तू ऐसा निश्चय कर कि न मैं हूँ और

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ <span style="float:right;">४०१</span>

न यह जगत् है। जब तू ऐसा जानेगा, तब आत्मपद की प्राप्ति होगी, जो कि देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित है। सर्वत्र सब वही परमात्मतत्त्व है। जगत् का कर्त्ता संकल्प ही है; क्योंकि संकल्प से जगत् उत्पन्न होता है। जैसे पवन से अग्नि उत्पन्न होता है और पवन ही से दीपक का निर्वाण होता है, वैसे ही जब संकल्प बहिर्मुख फुरता है, तब संसार उदय हो भासित होता है, और जब संकल्प अन्तर्मुख होता है, तब आत्मपद प्राप्त होता है, सब प्रपञ्च उरमी में लय हो जाता है। इस प्रकार संसार की नाना प्रकार की संज्ञाएँ फुरने से ही होती हैं, स्वरूप में कुछ नहीं है। न सत्य है, न असत्य है, न स्वतः है, न अन्य से है। यह सब कल्पनामात्र है। सत्, असत् और स्वतः, अन्य का जब अभाव हुआ, तब वहाँ अहं-त्वं कहाँ मिलेंगे? वह है नहीं और बालक के यक्षवत् भ्रममात्र है।

हे साधो! जहाँ अहं-त्वं नष्ट हो गये, वहाँ जो सत्ता बची वही परमपद है। जहाँ जगत् का भ्रम है, वहाँ वह विचार से लीन हो जाता है। वास्तव में पूछो तो ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं—नाम-मात्र दो हैं—जैसे घट और कुम्भ—परन्तु भ्रम से नानात्व भासित होता है। जैसे समुद्र में उठनेवाले आवर्त्त और तरङ्ग जल से कुछ भिन्न नहीं और पवन के संयोग से उनके आकार भासित होते हैं, वैसे ही आत्मा में जगत् कुछ भिन्न नहीं। संकल्प के उठने से नाना प्रकार का जगत् भासित होता है। हे अङ्ग! संकल्प के साथ मिलकर चित्त जैसी भावना करता है, वैसा ही अपना रूप देखता है स्वरूप से कुछ भिन्न नहीं, परन्तु जीव भावना से और का और देखता है। जैसे शुद्ध मणि के निकट कोई रङ्ग रखिये, वैसा ही रंग भासित होता है, पर मणि में कोई रङ्ग नहीं होता, वैसे ही चित्त शक्ति में कुछ हुआ नहीं, पर हुए की नाईं स्थित है। इससे अपने स्वरूप की भावना करो और जड़ चैतन्य को छोड़कर शुद्ध चैतन्य में स्थित होओ। जब ऐसे जानकर अपने स्वरूप में स्थित होगे, तब तुम्हें उत्थान में भी अपना स्वरूप दिखेगा। जैसे स्थिर समुद्र में जो तरङ्ग उठते हैं, वे कारणरूप जल के

४०२ ☸ योगवाशिष्ट ☸

बिना तो नहीं होते, वैसे ही कारणरूप ब्रह्म बिना जगत् नहीं है; परन्तु ब्रह्मसत्ता अकर्ता, अद्वैत और अच्युत है। इसी से कहा है कि ब्रह्म अकर्ता है और जगत् अकारणरूप है। जो जगत् अकारणरूप है तो वह न उपजता है और न नाश होता है—मरुस्थल के जल की तरह भ्रममात्र है। इसी से कहा है कि जगत् कुछ वस्तु नहीं, केवल अज, अच्युत और शान्तरूप आत्मतत्त्व ही अखण्डित स्थित है और शिला कोश की तरह अद्वैत चिन्मात्र है। जिसके हृदय में चिन्मात्र की भावना नहीं, उस मूर्ख को हम क्या कहें ! हे साधो ! वास्तव में परमार्थ दृष्टि से कुछ भी नहीं बना, पर जहाँ-जहाँ मन है, वहाँ-वहाँ अनेक जगत् हैं। तृण से सुमेरु तक सब जगत् में हैं। जो विचारकर देखिये तो सब वही ब्रह्मरूप है, और कुछ नहीं। जैसे सुवर्ण को जान लेने से भूषण भी सुवर्ण भासित होता है, वैसे ही केवल सत्ता समानपद एक अद्वैत है, भिन्न कुछ नहीं। और भिन्न-भिन्न संज्ञाएँ भी वही हैं।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे शताधिकपञ्चत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥१३५॥

भुशुण्डिजी बोले, हे विद्याधर ! जब आत्मपद प्राप्त होता है, तब ऐसी अवस्था होती है कि जो नग्न शरीर हो और उस पर बहुत शस्त्रों की वर्षा हो तो भी उसमे जीव दुःखी नहीं होता और सुन्दर अप्सरा कण्ठ से लगे तो हर्ष नहीं होता, अर्थात् दोनों ही में समदर्शी रहता है। हे विद्याधर ! तब तक आत्मपद का अभ्यास करे, जब तक संसार में सुपुप्ति की नाईं न हो जाय। अभ्यास ही से आत्मपद प्राप्त होगा। जब आत्मपद की प्राप्ति होगी, तब पाञ्चभौतिक शरीर को ताप या ज्वर स्पर्श न करेंगे, और यदि शरीर के हों भी, तो भी उनके अन्तः-करण में प्रवेश नहीं करते। वह केवल शान्तपद में स्थित रहता है—जैसे जल कमल को स्पर्श नहीं करता। हे देवपुत्र ! जब तक देहादि में अभ्यास है, तब तक आत्मा के प्रमाद से सुख-दुःख स्पर्श करते हैं। जब आत्मा का साक्षात्कार होता है, तब सब प्रपञ्च भी आत्मरूप हो जाते हैं। हे विद्याधर ! जैसे कोई पुरुष विष-पान करता है तो उसको जलन और खाँसी होती है—यह अवस्था विष की है—विष में भिन्न और कुछ

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ४०३

नहीं परन्तु यह नामसंज्ञा हुई है। विष न जन्मता, न मरता है और जलन-स्वाँमी उसमें देख पड़ती है, वैसे ही आत्मा न जन्मता है, न मरता है, और गुणों के साथ मिलकर भिन्न अवस्थाओं को प्राप्त हुआ देख पड़ता है।

आत्मा जन्ममरण से रहित है, पर गुणों के साथ मिलने से जन्मता-मरता भासित होता है और अन्तःकरण, देह, इन्द्रियादिक भिन्न-भिन्न जान पड़ते हैं। हे साधो! यह जगत् भ्रम से प्रतीत होता है। जो ज्ञानवान् पुरुष हैं, वे इस जगत् को गाय के पैर के गढ़े की तरह अपने पुरुषार्थ से नाँघ जाते हैं, और जो अज्ञानी हैं, उनको अल्प भी समुद्र समान हो जाता है। इससे आत्मपद पाने का यत्न करो, जिसके जानने से संसारसमुद्र तुच्छ हो जायगा। वह आत्मतत्त्व सबमें अनुस्यूत और सबसे अतीत है। उसके जानने से अन्तःकरण शीतल हो जाता है और सब ताप नष्ट हो जाते हैं। हे साधो! फिर उसका त्याग करना अविद्या और बड़ी मूर्खता है। हे साधो! ये सब पदार्थ ब्रह्मस्वरूप ही हैं। जब ब्रह्मस्वरूप हुए तब मन, अहंकार, कलङ्क आदिक भी वही हैं—किसी से किसी को कुछ सुख-दुःख नहीं। हे विद्याधर! जब आत्मपद को जाना, तब अन्तःकरण आदि भी ब्रह्मस्वरूप भासित होंगे। जो संकल्प से भिन्न-भिन्न जाने जाते हैं, वे संकल्प के होते भी ब्रह्मस्वरूप भासित होंगे। इसलिए संकल्प हीन होकर स्थित हो, सोचो—न मैं हूँ, न यह जगत् है और न इदम् है। इन शब्दों और अर्थों से रहित होकर स्थित हो रहो, सब संशय मिट जावें।

हे विद्याधर! जब तू ऐसा निरहंकार और निःसंकल्प होगा, तब उत्थानकाल में भी बुद्धि, बोध, लज्जा, लक्ष्मी, स्मृति, यश, कीर्ति इत्यादिक जो शुभाशुभ अवस्था हैं, सब आत्मस्वरूप भासित होंगी और सबमें आत्मबुद्धि रहेगी। इनके प्राप्त होने पर भी केवल परमार्थ सत्ता से भिन्न न भासित होगा—जैसे अन्धकार में सर्प के पैर का चिह्न नहीं जान पड़ता क्योंकि वह है ही नहीं, वैसे ही तुमको सब अवस्थाएँ न भासित होंगी—सब आत्मा ही भासित होगा—

४०४ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

और जितने कुछ भावरूप पदार्थ स्थित हैं, वे अभाव हो जावेंगे। हे अङ्ग! जिस पुरुष ने विचारकर आत्मपद पाने का यत्न किया है, वह पावेगा और जिसने कहा कि मैं मुक्त हो जाऊँगा और ईश्वर मुझ पर दया करेंगे, वह पुरुष कभी मुक्त न होगा। पुरुष के प्रयत्न बिना कभी मुक्ति न होगी। आत्मस्वरूप में न कोई दुःख है और न किसी गुण से मिला हुआ सुख है। वह केवल शान्तरूप है। किसी से किसी को कुछ सुख-दुःख नहीं; न सुख है और न दुःख है, न कोई कर्त्ता है और न भोक्ता है, केवल ब्रह्मतत्ता अपने आपमें स्थित है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शताधिकषट्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ १३६ ॥

भुशुण्डिजी बोले, हे विद्याधर! जैसे कोई कल्पना करे कि आकाश में अन्य आकाश स्थित है तो वह मिथ्या प्रतीति है, वैसे ही आत्मा में जो अहंकार उठता है वह मिथ्या है। जैसे आकाश में अन्य आकाश कुछ वस्तु नहीं; परमार्थ तत्त्व ऐसा सूक्ष्म है कि उसमें आकाश भी स्थूल है। वह ऐसा स्थूल है कि उसके आगे सुमेरु आदिक भी सूक्ष्म आणुण है। राग-द्वेष से रहित चैतन्य केवल शान्तरूप है—गुण और तत्त्व के क्षोभ से रहित है। हे देवपुत्र! निजानुभवरूपी चन्द्रमा अमृत का बरसानेवाला है। हे अङ्ग! जितने दृश्य पदार्थ दिखते हैं, वे हुए कुछ नहीं। हे अङ्ग! आत्मरूप अमृत की भावना कर, जिससे तू जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त हो। जैसे आकाश में दूसरे आकाश की कल्पना मिथ्या है, वैसे ही निराकार चिदात्मा में अहं मिथ्या है। और जैसे आकाश अपने आपमें स्थित है वैसे ही आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित और अहं-त्वं आदि से रहित है। जब उसमें अहं का उत्थान होता है, तब जगत् फैल जाता है—जैसे वायु जब फुरने से रहित होती है, तब आकाशरूप ही होती है, वैसे ही रहित उत्थान अहं से रहित होने पर आत्मरूप हो जाती है और जगत् का भ्रम मिट जाता है।

फुरने में जगत् फुर आया है; वास्तव में कुछ नहीं है। ज्ञानवान् को आत्मा ही भासित होता है। देश, काल, बुद्धि, लज्जा, लक्ष्मी, स्मृति, कांति सब आकाशरूप हैं—ब्रह्मरूपी चन्द्रमा के प्रकाश से प्रकाशित

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ४०५

होते हैं। जैसे बादलों के संयोग से आकाश धूमिल होता है, वैसे ही प्रमाद से संवित् दृश्यभाव को प्राप्त होती है; परन्तु और कुछ नहीं हो जाती। जैसे तरङ्ग उठने से जल और कुछ नहीं हो जाता और जैसे काष्ठ काटने में और कुछ नहीं हो जाना, वैसे ही द्रष्टा से दृश्य भिन्न नहीं होता। जैसे केले के खम्भे में पत्ते के सिवा और कुछ नहीं निकलता और पत्ते शून्यरूप हैं, वैसे ही यह जगत् भासित होता है, परन्तु आत्मा से भिन्न नहीं, शून्यरूप है। शीश, भुजा, नेत्र, चरण आदिक नाना अंग जो भिन्न-भिन्न भासित होते हैं, वे सब शून्यरूप केले के पत्तों की नाईं हैं और सब असाररूप हैं। हे विद्याधर ! चित्त में रागरूपी मलीनता है। जब वैराग्यरूपी झाड़ू से झाड़िये, तब चित्त निर्मल हो। जैसे दीवार पर चित्र लिखे जाते हैं, वैसे ही आत्मा में जगत् भासित होता है। देवता, मनुष्य, नाग, दैत्य आदि का यह सब जगत् संकल्परूपी चितेरे ने चित्र सदृश लिखे हैं। ये स्वरूप के विचार से निवृत्त हो जाते हैं। जब स्नेहरूप संकल्प फुरता है, तब भाव-अभावरूप जगत् फैल जाता है। जैसे जल में तेल के बूंद फैल जाते हैं और जैसे बाँस में अग्नि निकल-कर बाँस को दग्ध करती है, वैसे ही संकल्प इससे उपजकर इसी को खाते हैं। आत्मा में जो देश-काल-पदार्थ भासित होते हैं, वही अविद्या है-पुरुषार्थ से इसका अभाव करो। दो भाग साधुओं के संग और सत् कथा सुनकर नष्ट करो; तृतीय भाग को शास्त्र का विचार करके और चतुर्थ भाग को आत्मज्ञान का आप ही अभ्यास करके मिटाओ। इस उपाय से अविद्या नष्ट हो जावेगी और अशब्द, अरूपपद की प्राप्ति होगी।

विद्याधर ने पूछा, हे मुनीश्वर ! जिन चार भागों ने नाश से अशब्द-पद प्राप्त होता है, वह काल का क्रम क्या है ? और नाम-अर्थ का अभाव होने पर शेष क्या रहता है ? भुशुण्डिजी बोले, हे विद्याधर ! संसार-समुद्र के तरने को ज्ञानवानों का संग करना और जो विद्वान निर्वैर पुरुष हैं, उनका भली प्रकार टहल करना। इसमें अविद्या का अर्ध-भाग नष्ट होगा। तीसरा भाग मनन करके और चतुर्थ भाग अभ्यास

५०६ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

करके नष्ट होगा। जो यह उपाय न कर सको तो यह युक्ति करो कि जिसमें चित्त अभिलाषा करके आसक्त हो, उसी का त्याग करो। एक भाग अविद्या इस प्रकार नष्ट होगी। तीन भाग शास्त्र-विचार और अपने यत्न से शनः-शनैः नष्ट होवेगा। साधुसंग, सत्शास्त्र-विचार और अपना यत्न हो तो एकवारगी अविद्या नष्ट हो जावेगी। ये समकाल कहे हैं। एक-एक के सेवने में एक-एक भाग निवृत्त होता है। पीछे जो शेष रहता है, उसमें काम-अर्थ सब असतरूप हैं और वे अजर, अनन्त, एकरूप हैं। संकल्प के उपजने से पदार्थ भासित होते हैं और संकल्प के लीन होने पर लीन हो जाते हैं। हे विद्याधर! यह जगत संकल्प ने रचा है—जैसे आकाश में सूर्य निराधार स्थित होता है, वैसे ही देश-काल की अपेक्षा से रहित यह मननमात्र स्थित है। तीनों जगत मन के फुरने से प्रकट होते हैं और मन के लय होने से लय हो जाते हैं—जैसे स्वप्न के पदार्थ जागने में मिट जाते हैं। हे विद्याधर! ब्रह्मरूपी बन में एक कल्पवृक्ष है, जिसकी अनेक शाखाएँ हैं। उसकी एक शाखा में जगतरूपी गूलर का फल है, जिसमें देवता, दैत्य, मनुष्य, पशु आदिक मच्छर हैं। वासनारूपी रस से पूर्ण मज्जा पहाड़ है। पञ्चभूत सूत द्वारा उनका निकलने का खुला मार्ग इत्यादिक सुन्दर रचना बनी है।

उसमें त्रिलोकी का ईश्वर एक इन्द्र हुआ और गुरु के उपदेश से उसका आवरण नष्ट हो गया। फिर इन्द्र और दैत्यों का युद्ध होने लगा और इन्द्र अपनी सेना को ले चला। पर उसकी निर्बलता हुई, इसलिए वह भागा और दशों दिशाओं में घूमता रहा। पर जहाँ जावे, वहीं दैत्य उसके पीछे चले आवें। जैसे पापी परलोक में शोभा नहीं पाता, वैसे ही इन्द्र ने जब शान्ति न पाई, तब अणुमात्ररूप करके सूर्य के त्रसरेणु में प्रवेश कर गया। जैसे कमल में भौंरा प्रवेश करे, वैसे ही उसने प्रवेश किया तो वहाँ उसको युद्ध का वृतान्त भूल गया। तब उसने एक मन्दिर में बैठा अपने को देखा। जैसे निद्रा से स्वप्न-सृष्टि प्रकट हो, वैसे ही उसने वहाँ रत्न और मणियों संयुक्त नगर देखा

🌸 निर्वाण प्रकरण 🌸 ४०७

वह उनमें गया और पृथ्वी, पहाड़, नदियाँ, चन्द्र, सूर्य, त्रिलोकी उनको वहाँ दिखाई देने लगी। उस जगत् का इन्द्र अपने को उनमें देखा कि दिव्य भोग और ऐश्वर्य से सम्पन्न मैं इन्द्र स्थित हूँ। वह इन्द्र कुछ काल के उपरान्त शरीर को त्यागकर निर्वाण को प्राप्त हुआ- जैसे तेल से रहित दीपक निर्वाण होता है। तब कुन्द नाम उसका पुत्र इन्द्र हुआ और राज्य करने लगा। फिर उसके एक पुत्र हुआ। तब कुन्द भी इन्द्र शरीर को त्यागकर परमपद को प्राप्त हुआ और उसका पुत्र राज्य करने लगा। फिर उसके भी एक पुत्र हुआ। इसी प्रकार सहस्र पुत्र होकर राज्य करते रहे। उन्हीं के कुल में यह हमारा इन्द्र राज्य करता है। इससे यह जगत् संकल्पमात्र है और उस अमरेणु से यह सृष्टि है। इसलिए इस जगत् को संकल्पमात्र जानकर इसकी आस्था त्यागो।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे इन्द्रोपाख्याने अमरेणुजगत्-वर्णननाम शताधिकसप्तविंशतितमसर्गः ॥ १३७ ॥

भुशुण्डजी बोले, हे विद्याधर ! फिर उनके कुल में एक बड़ा श्रीमान् इन्द्र हुआ, जो त्रिलोकी का राज्य करता रहा और फिर निर्वाण को प्राप्त हुआ। उसके एक पुत्र था, जिसको बृहस्पतिजी के वचनों से ज्ञानरूप प्रतिभा उदय हुई। तब वह विदितवेद होकर स्थित हुआ। यथाप्राप्ति में इन्द्र होकर राज्य करने लगा और दैत्यों को जीता। एक समय वह किसी कार्य के लिए कमल के तन्तु में घुस गया तो वहाँ उसको नाना प्रकार का जगत् दिखने लगा और अपनी इन्द्र की प्रतिभा हुई। इससे उसे इच्छा हुई कि मैं ब्रह्मतत्त्व को पाऊँ और दृश्य पदार्थ की तरह उसे प्रत्यक्ष देखूँ। इसलिए वह एकान्त में बैठकर समाधि में स्थित हुआ। तब उसको भीतर-बाहर ब्रह्म का साक्षात्कार हुआ और प्रतिभा के उदय होने से यह निश्चय हुआ कि सब ब्रह्म ही है और वही पूजने योग्य है। सब उसी को पूजते भी हैं। केवल शुद्ध आत्मपद सब शब्द, रूप, अवलोक और नमस्कार से रहित है। सब ओर उसी के पाणिपाद हैं। सब सिर और मुख उसी के हैं।

४०८ ❋ योगवाशिष्ठ ❋

सब ओर उसके श्रवण हैं। सब ओर उसके नेत्र हैं। आत्मतत्त्व में वही मनमें स्थित हो रहा है। सब इन्द्रियों और विषयों को वही प्रकाशित करता है। वह सब इन्द्रियों से रहित है और असक्त हुआ भी सबको धारण कर रहा है। वह निर्गुण है और इन्द्रियों के साथ मिलकर गुणों को भोगता है। वही सब प्राणियों के भीतर बाहर व्याप्त रहा है। सूक्ष्म है, इससे दुर्विज्ञेय है, और इन्द्रियों का विषय नहीं है। अज्ञानी का अज्ञान के कारण दूर है और आत्मत्व द्वारा ज्ञानी को ज्ञान के कारण निकट है। वह अनन्त, सर्वव्यापी केवल शान्तरूप है, जिसमें दूसरा कोई नहीं। घट, पट, दीवार, गाय, आँदा, नाग, नर सबमें वही तत्त्व भासित है। पर्वत, पृथ्वी, चन्द्र, सूर्य, देश, काल, वस्तु, सब ब्रह्म ही है, ब्रह्म से भिन्न नहीं।

हे विद्याधर! इस प्रकार इन्द्र को ज्ञान हुआ और वह जीवन्मुक्त हुआ। तब वह सब चेष्टा करता, परन्तु अन्तःकरण में नहीं बँधता। जब कुछ काल बीता, तब इन्द्र उस निर्वाणपद को प्राप्त हुआ, जिसमें आकाश भी स्थूल है। फिर उस इन्द्र का एक बड़ा शूरवीर पुत्र सब दैत्यों को जीतकर देवताओं और त्रिलोकी का राज्य करने लगा। फिर उसको भी ज्ञान उत्पन्न हुआ। सतशास्त्र और गुरु के वचनों से कुछ काल में वह भी निर्वाण को प्राप्त हुआ। तब उसका जो पुत्र था, वह राज्य करने लगा। इसी प्रकार कई इन्द्र राज्य करते और नाना प्रकार के व्यवहारों को देखते रहे। फिर उसके कुल में कोई पुत्र था, उसको यह हमारी सृष्टि भाषित हुई तो वह भी ब्रह्मध्यानी हुआ और इस त्रिलोकी का राज्य करने लगा। अब तक विश्व का इन्द्र वही है। हे विद्याधर! इस प्रकार विश्व की उत्पत्ति संकल्पमात्र है और सब मैंने तुझसे कही। पहले उसको त्रसरेणु में सृष्टि दिखी, फिर उस सृष्टि के एक कमल के तन्तु में दिखी। फिर उसमें कई वृत्तान्त, जो संकल्पमात्र थे, उसने देखे। फिर उस अणु में अनेक अवस्थाएँ देखीं। हे विद्याधर! पर वास्तव में यह कुछ हुई नहीं। जैसे आकाश में नीलिमा भाषित होती है, पर है नहीं वैसे ही यह विश्व है। आत्मा में विश्व का अत्यन्त अभाव

# ✽ निर्वाण प्रकरण ✽

४०६

है। यह विश्व अहंभाव से उपजा है। जब अहंभाव उठता है, तब आगे सृष्टि बनती है, और जब अहं का अभाव होता है, तब विश्व कुछ नहीं। इस विश्व का बीज अहं है, इससे तू ऐसी भावना कर कि न मैं हूँ और न जगत् है। जब ऐसी भावना करेगा, तब आत्मा ही शेष रहेगा, जो प्रत्यक्ष ज्ञानरूप अपना रूप है। हे विद्याधर ! इस मेरे उपदेश को अङ्गीकार कर।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे संकल्पसंकल्पैकताप्रतिपाद- न्नमाम शताधिकअष्टत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ १३८ ॥

भुशुण्डिजी बोले, हे विद्याधर ! जब अहं का उत्थान होता है, तब आगे सृष्टि बनकर भासित होता है, और जब अहं का अभाव होता है तब विश्व कुछ नहीं भासित होता, केवल शुद्ध आत्मा ही भासित होता है। हे विद्याधर ! इन्द्र ने कहा कि मैं हूँ। उसको सूर्य की किरणों के अणु में ऐसे अहं हुआ तो उसने उसमें नाना विस्तार देखा और कष्ट पाया। जो उसको अहं न होता तो दुःख न पाता। दुःखरूपी वृक्ष का अहं बीज है। आत्मविचार से इसका नाश होता है। जब अहं का नाश होता है, तब आत्मपद का साक्षात्कार होता है। आत्मपद का साक्षात्कार होने से प्रच्छन्न अहं का नाश होता है। हे विद्याधर ! आत्मारूपी एक पर्वत है, जिस पर आकाशरूपी वन है। उसमें संसाररूपी वृक्ष लगा है। उसमें वासनारूपी रस है। अज्ञानरूपी भूमि से वह उत्पन्न हुआ है। नदियाँ, समुद्र उसकी नाड़ी हैं। चन्द्रमा और तारे फूल हैं। वासनारूपी जल से वह बढ़ता है। वही अहंकाररूपी वृक्ष का बीज है। सुख-दुःखरूपी इसके फल हैं। आकाश इसकी डालें और पाताल जड़ है। तुम इस वृक्ष को ज्ञानरूपी अग्नि से जलाओ और अहंरूपी वृक्ष के बीज का नाश करो। हे विद्याधर ! एक खाई है, जिसके जन्ममरणरूपी दो किनारे हैं। उसमें अनात्मारूपी जल है। वासनारूपी तरंगें उठती हैं और विश्वरूपी बुलबुले उठते हैं और मिट भी जाते हैं। शरीररूपी झाग है और अहंकाररूपी वायु है। जब वायु हुई तब तरंग और बुल-बुले सब होते हैं और जब वायु मिट गई, तब केवल स्वच्छ निर्मलरूप ही भासित होता है।

४१० ✲ योगवाशिष्ठ ✲

हे विद्याधर ! जो वायु हुई तो जल से भिन्न कुछ न हुआ और जो न हुई तो भी जल से भिन्न कुछ नहीं, जल ही है । वैसे ही अज्ञान के होने और निवृत्त होने पर भी आत्मपद ज्यों का त्यों है । परन्तु सम्यक्दर्शन से आत्मपद और अज्ञान से जगत् भासित होता है । अहं का होना ही अज्ञान है । जब अहं हुआ तब मम भी होता है । सो 'अहं' 'मम' नाम संसार का है । जब अहं-मम मिटता है, तब जगत् का अभाव होता है । अहं के होने दृश्य भासित होता है और दृश्य में अहं होता है । इसमें संवेदन को त्यागकर निर्वाणपद में प्राप्त हो । इतना कह भुशुण्डिजी ने मुझसे कहा कि हे वशिष्ठजी ! इस प्रकार जब मैंने विद्याधर को उपदेश किया तो वह समाधि में स्थित होकर निर्वाणपद को प्राप्त हुआ । जैसे दीपक बुझ जाता है, वैसे ही उसका चित्त क्षोभ से रहित शान्ति को प्राप्त हुआ । हे ब्राह्मण ! उसका हृदय शुद्ध था, इस कारण मेरे वचन शीघ्र ही उसके हृदय में प्रवेश कर गये । जब वह समाधि में स्थित हुआ तो मैंने उसको बारम्बार जगाया परन्तु वह न जागा—जैसे कोई जलता-जलता शीतल समुद्र में जाकर बैठे और उससे कहिये कि तू निकल तो वह नहीं निकलता; वैसे ही संसारताप से जलता हुआ जीव जब आत्मसमुद्र में गोता लगाता है, तब वह संसार के अज्ञानरूपी प्रवाह को नहीं देखता । हे वशिष्ठजी ! जिसका अन्तःकरण शुद्ध होता है, उसको थोड़े वचन भी बहुत हो लगते हैं । जैसे तेल की एक बूंद जल में बहुत फैल जाती है, वैसे ही जिसका अन्तःकरण शुद्ध होता है, उसको थोड़ा वचन भी बहुत होकर लगता है । पर जिसका अन्तःकरण मलिन होता है, उस पर वचन प्रभाव नहीं डालते । जैसे आरसी पर मोती नहीं ठहरता वैसे ही गुरुशास्त्र के वचन उसको नहीं लगते । जब विषयों से वैराग्य उपजे; तब जानिये कि हृदय शुद्ध हुआ ।

हे वशिष्ठजी ! जब मैंने विद्याधर को उपदेश किया, तब वह शीघ्र ही आत्मपद को प्राप्त हुआ; क्योंकि उसका चित्त निर्मल था । हे मुनीश्वर ! जो तुमने मुझसे पूछा था सो मैंने कहा कि उस

# ❋ निर्वाण प्रकरण ❋ <span style="float:right;">४११</span>

विद्याधर को मैंने अज्ञान से रहित चिरकाल जीता देखा। इतना कह वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ऐसे कहकर काकभुशुण्डि चुप हो रहे और मैं नमस्कार करके आकाशमार्ग से अपने घर आया। हे राम ! मेरे और काकभुशुण्डि के इस संवाद को एकादश चौकड़ी युग बीतते हैं। हे राम ! यह कोई नियम नहीं है कि थोड़े काल में ज्ञान उपजे वा बहुत काल में। यह हृदय की शुद्धता की बात है। जिसका हृदय शुद्ध होता है, उसको गुरु और शास्त्रों का वचन शीघ्र ही लगता है—जैसे जल नीचे को स्वाभाविक जाता है। हे राम ! इतना उपदेश जो मैंने तुमको क्रम से किया है, उसका तात्पर्य यही है कि वासना को त्याग करो, सोचो कि न मैं हूँ और न कोई जगत् है—तब पीछे निर्विकल्प केवल आत्मपद रहेगा, जो सबका अपना रूप है और उसका साक्षात्कार तुमको होगा। जैसे मलिन दर्पण में मुख नहीं दीखता, वैसे ही आत्मरूपी दर्पण अहंशूपी मल से ढका है। जब इसका त्याग करोगे, तब आत्मपद की प्राप्ति होगी और जगत् भी अपना रूप भासित होगा। आत्मा से भिन्न कुछ नहीं है; क्योंकि सब केवल आत्मतत्त्वमात्र है। और जो कुछ भासित होता है, उसे मृगतृष्णा के जल सा और बन्ध्या के पुत्र सा जानो। यह जगत् आत्मा के प्रमाद से भासित होता है—जैसे आकाश में नीलिमा भासित होती है, पर है नहीं, वैसे ही जगत् प्रत्यक्ष भासित होता है और है नहीं। जैसे रस्सी में सर्प मिथ्या है, वैसे ही आत्मा में जगत् मिथ्या है। जब आत्मा का ज्ञान होगा, तब जगत् का अत्यन्त अभाव होगा और केवल आत्मत्वमात्र भासित होगा।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुण्डि विद्याधरोपाख्यान-समाप्तिर्नाम शताधिकनवत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ १३६ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! तुम अहंवेदना से रहित होओ। संसाररूपी वृक्ष का बीज अहं ही है। वासना से शुभ-अशुभरूप कर्मों का सुख-दुःख फल है, और वह वासना ही से प्रफुल्लित होता है। इससे अहंभाव को निवृत्त करो जब अहं फुरता है, तब आगे जगत् भासित

४१२ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

होता है । जब अहंता से रहित होगे तब जगत् का भ्रम मिट जावेगा । अहंता आत्मबोध में नष्ट होती है । आत्मबोधरूपी खंगारी में उड़ाया अहंतारूपी पाषाण न जानोगे कि कहाँ गया । सुवर्ण मिट्टी के ढेले सा तुमको हो जावेगा । शरीररूपी पत्ते पर अहंतारूपी अणु स्थित है; जब बोधरूपी वायु चलेगी तब न जान पाओगे कि कहाँ गया । शरीर-रूपी पत्ते पर अहंतारूपी वरफ का कणका स्थित है; बोधरूपी सूर्य के उदय होने पर न जानोगे कि वह कहाँ गया । बोध बिना अहंता नष्ट नहीं होती । चाहे कीचड़ में रहे और चाहे पहाड़ में जावे, चाहे घर में रहे और चाहे स्थल में रहे, चाहे स्थूल हो और चाहे सूक्ष्म हो, चाहे निराकार हो और चाहे रूपान्तर को प्राप्त हो, चाहे भस्म हो और चाहे मृतक हो, चाहे दूर हो अथवा निकट हो, जहाँ रहेगा, वहीं अहंता इसके साथ है । हे राम ! संसाररूपी वट का बीज अहंता है । उसी से सब शाखा फैली हैं । सब अर्थों का कारण अहंता है । जब तक अहंता है, तब तक दुःख नहीं मिटता । और जब अहंभाव नष्ट होता है तब परमसिद्धि की प्राप्ति होती है । हे राम ! जो कुछ मैंने उपदेश किया है, उसका भली प्रकार विचारकर उसका अभ्यास करो, तब संसाररूपी वृक्ष का बीज जल जायगा और आत्मपद की प्राप्ति होगी ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे अहंभावत्यागोपदेशो नाम शताधिकचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ १४० ॥

वशिष्टजी बोले, हे राम ! संसार संकल्पमात्र से सिद्ध है और भ्रम में उदय हुआ है । आत्मस्वरूप में अनेक सृष्टियाँ बनती हैं । कोई लीन होती हैं, कोई उत्पन्न होती हैं और कोई उड़ती हैं, कहीं इकट्ठी उड़ती हैं और कहीं भिन्न-भिन्न उड़ती हैं, सो सब मुझको प्रत्यक्ष भासित होती हैं, देखो, वे उड़ती जाती हैं । ये सब आकाशरूप हैं और आकाश ही में मिलती हैं । जैसे केले का वृक्ष देखने भर को सुन्दर होता है, पर उसमें कुछ सार नहीं होता, वैसे ही विश्व देखने भर को सुन्दर है, पर आकाश रूप है । जैसे जल में पहाड़ का प्रतिबिम्ब पड़ता है और हिलना जान पड़ता है, वैसे ही यह जगत् है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! आप कहते

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ५१३

है कि सृष्टि मुझे प्रत्यक्ष उड़ती दिखती है—तुम भी देखो; यह तो मैंने कुछ नहीं समझा कि आप क्या कहते हैं? वशिष्ठजी बोले, हे राम! अनेक सृष्टियाँ उड़ती हैं, सो सुनो। पञ्चभौतिक शरीर में प्राण स्थित हैं। प्राण में चित्त स्थित है। और उस चित्त में अपनी-अपनी सृष्टि है। जब यह पुरुष शरीर का त्याग करता है, तब लिङ्गशरीर (जो वासना और प्राण है) उड़ता है। उस लिङ्गशरीर में जो विश्व है, वह सूक्ष्मदृष्टि से मुझको भासित होता है। हे राम! आकाश में जो वायु है, उसका रूपरङ्ग कुछ नहीं। वही वायु प्राणों से मिलकर मुझे प्रत्यक्ष दिखाई देती है। इसी का नाम जीव है। यथार्थ में न कोई आता है, न जाता है, परन्तु लिङ्गशरीर के संयोग से आता-जाता और जन्मता-मरता दीखता है। मनुष्य अपनी वासना के अनुसार आत्मा में विश्व देखता है। यह वासनामात्र सृष्टि है। जैसी वासना होती है, वैसा ही विश्व भासित होता है।

हे राम! यह पुरुष आत्मस्वरूप है, परन्तु लिङ्गशरीर के मिलने से इसका नाम जीव हुआ है। यह अपने को प्रच्छन्न जानता है; पर वास्तव में ब्रह्मस्वरूप है। देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित ब्रह्म है, पर प्रमाद से अपने को कुछ का कुछ मानता है। इसी का नाम लिङ्गशरीर है। जैसे घटाकाश भी महाकाश है, परन्तु घट के खप्पर से परिच्छिन्न हुआ है, वैसे ही यह पुरुष भी आत्मस्वरूप है, और अहंकार के संयोग से प्रच्छन्न हुआ है। जैसे घट को एकदेश से उठाकर देशान्तर में ले जाकर रखो तो आकाश तो न कहीं गया और न आया, परन्तु आता-जाता लगता है, वैसे ही आत्मा अखण्डरूप है, परन्तु प्राण चित्त से चलता भासित होता है। जब अहंकाररूप चित्त नष्ट हो तब अखण्डरूप हो। जब तक अहंकार नहीं जाता, तब तक जगत् भ्रम दीखता है और वासना करके भटकता फिरता है। वासनामय सृष्टि अपने-अपने चित्त में स्थित है। जीव जब शरीर का त्याग करता है, तब आकाश में उड़ता है, और प्राणवायु उड़कर जो आकाश में शून्यरूप वायु है उससे जा मिलता है। वहाँ सबको अपनी-अपनी