भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 400, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 400

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ३६६

सुमेरु जैसे कई खम्भे हैं जो रत्नों की पंक्ति से जड़े हुए हैं। वन, दिशा, पहाड़, वृक्ष, कन्दरा, वैताल, देवता, पाताल, आकाश, इत्यादिक सारा ब्रह्माण्ड उनके ऊपर स्थित है। रात्रि, दिन, भूत, प्राणी और इनके जो घर हैं सो चौपड़ के खाने हैं। जो जैसा कर्म करता है, वह उसके अनुसार दुःख-सुख भोगता है। ऐसे ही यह जो क्रियासंयुक्त सम्पूर्ण प्रपञ्च दिखाई देता है सो भ्रम से सिद्ध है—इसलिए मिथ्या है। जैसे स्वप्न की सृष्टि संकल्प से भासित होती है, वैसे ही यह सृष्टि भी भ्रम से भासित होती है और अज्ञान की रची हुई है। आत्मा के अज्ञान से भासित होती है और आत्मा के ज्ञान से लीन हो जाती है। जब सृष्टि है तब भी परमात्मतत्त्व ही है और जब सृष्टि न होगी तब भी परमात्मतत्त्व ही होगा। आगे भी वही था। यह जो कुछ प्रपञ्च तुझे दीखता है सो शून्य आकाश ही है। त्रिगुणमय प्रपञ्च गुणों का रचा हुआ अपने स्वरूप के प्रमाद से स्थित हुआ है। आत्मज्ञान से यह शून्य सदृश हो जावेगा। जब प्रपञ्च ही शून्य हुआ, तब आत्मा और अनात्मा का कहना भी न रहेगा। पीछे जो शेष रहेगा, वह केवल शुद्ध परमतत्त्व और तेरा अपना रूप है। उसमें स्थित हो रहे और दृश्य का त्याग-कर। यह विचार कि न मैं हूँ और न जगत् है। जब तू ऐसा होगा, तब तेरी जय होगी। आत्मपद सबसे उत्तम है। जब तू आत्मपद में स्थित होगा, तब सबसे उत्तम होगा और तेरी जय होगी—इससे आत्मपद में ही स्थित हो।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे संगराडम्बरोत्पत्ति- नाम शताधिकत्रयस्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ १३३ ॥

भुशुण्डिजी बोले, हे विद्याधर ! यह प्रपञ्च भी आत्मा का चमत्कार है। आत्मा शुद्ध चैतन्य है, जिसमें जड़ और चेतन स्थित हैं। वह सबका अधिष्ठान है। वह सत्तामात्र तेरा अपना रूप है। वह अहं-त्वं शब्द-अर्थ से रहित आत्मत्वमात्र है, पर सत्यस्वरूप होकर असत्य की भाँति स्थित है। हे विद्याधर ! तू इस जड़ और चेतन से अबोध हो रह। जब तू अबोध होगा, तब शान्त और चिद्घन होगा। ये जो