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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ३६६

सुमेरु जैसे कई खम्भे हैं जो रत्नों की पंक्ति से जड़े हुए हैं। वन, दिशा, पहाड़, वृक्ष, कन्दरा, वैताल, देवता, पाताल, आकाश, इत्यादिक सारा ब्रह्माण्ड उनके ऊपर स्थित है। रात्रि, दिन, भूत, प्राणी और इनके जो घर हैं सो चौपड़ के खाने हैं। जो जैसा कर्म करता है, वह उसके अनुसार दुःख-सुख भोगता है। ऐसे ही यह जो क्रियासंयुक्त सम्पूर्ण प्रपञ्च दिखाई देता है सो भ्रम से सिद्ध है—इसलिए मिथ्या है। जैसे स्वप्न की सृष्टि संकल्प से भासित होती है, वैसे ही यह सृष्टि भी भ्रम से भासित होती है और अज्ञान की रची हुई है। आत्मा के अज्ञान से भासित होती है और आत्मा के ज्ञान से लीन हो जाती है। जब सृष्टि है तब भी परमात्मतत्त्व ही है और जब सृष्टि न होगी तब भी परमात्मतत्त्व ही होगा। आगे भी वही था। यह जो कुछ प्रपञ्च तुझे दीखता है सो शून्य आकाश ही है। त्रिगुणमय प्रपञ्च गुणों का रचा हुआ अपने स्वरूप के प्रमाद से स्थित हुआ है। आत्मज्ञान से यह शून्य सदृश हो जावेगा। जब प्रपञ्च ही शून्य हुआ, तब आत्मा और अनात्मा का कहना भी न रहेगा। पीछे जो शेष रहेगा, वह केवल शुद्ध परमतत्त्व और तेरा अपना रूप है। उसमें स्थित हो रहे और दृश्य का त्याग-कर। यह विचार कि न मैं हूँ और न जगत् है। जब तू ऐसा होगा, तब तेरी जय होगी। आत्मपद सबसे उत्तम है। जब तू आत्मपद में स्थित होगा, तब सबसे उत्तम होगा और तेरी जय होगी—इससे आत्मपद में ही स्थित हो।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे संगराडम्बरोत्पत्ति- नाम शताधिकत्रयस्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ १३३ ॥

भुशुण्डिजी बोले, हे विद्याधर ! यह प्रपञ्च भी आत्मा का चमत्कार है। आत्मा शुद्ध चैतन्य है, जिसमें जड़ और चेतन स्थित हैं। वह सबका अधिष्ठान है। वह सत्तामात्र तेरा अपना रूप है। वह अहं-त्वं शब्द-अर्थ से रहित आत्मत्वमात्र है, पर सत्यस्वरूप होकर असत्य की भाँति स्थित है। हे विद्याधर ! तू इस जड़ और चेतन से अबोध हो रह। जब तू अबोध होगा, तब शान्त और चिद्घन होगा। ये जो

४०० * योगवासिष्ठ *

जड़ और चेतन हैं, इन दोनों का परमार्थ चैतन्य के ऊपर आवरण है । यद्यपि वह अदृश्य है तो भी इनके भीतर ही रहता है, जैसे समुद्र के भीतर बड़वाग्नि रहती है । इन जड़-चेतन रूपों का कारणरूप वही है । इनकी उत्पत्ति भी उर्मी में होती है, और नाश भी वही करता है । हे विद्याधर ! जब ऐसे जाना कि मैं चेतनरूप भी नहीं और जड़ भी नहीं तो पीछे जो रहेगा, वही तेरा स्वरूप है । जब तेरे भीतर इन जड़ और चेतन, दोनों का स्पर्श नहीं हुआ, तब सबके भीतर जो चैतन्य है, वही ब्रह्म तुझे भासित होगा । विश्व और आत्मा में कुछ अन्तर नहीं हुआ । जैसे सूर्य की किरणों का चमत्कार जलाभास होता है, वैसे ही शुद्ध चैतन्य का चमत्कार विश्व होकर दिखता है ।

हे अङ्ग ! जैसे दीवाल पर पुतलियाँ लिखी होती हैं तो वे दीवाल में भिन्न चितेरे ने नहीं लिखी हैं, वैसे ही शून्य आकाश में चित्तरूपी चितेरे ने विश्वरूपी पुतलियों की कल्पना की है । जैसे सुवर्ण कल्पित भूषण सुवर्ण से भिन्न नहीं, वैसे ही आत्मा में अज्ञान से जो विश्व देखते हैं, वह आत्मा से भिन्न नहीं । जगत, ब्रह्म, आत्मा, आकाश, देश, काल सब उर्मी तत्त्व की संज्ञा है । वही शुद्ध चैतन्य आकाश है, जिसका चमत्कार ऐसे स्थित है । उर्मी तत्त्व में तू भी स्थित हो रह । यह जगत् ऐसे है, जैसे दूर-दृष्टि से आकाश में बादल हाथी की मूँड़ में लगते हैं । यह जो अहं-त्वं-रूप जगत् है सो अबोध से भासित होता और बोध से लीन हो जाता है—जैसे मरुस्थल में सूर्य की किरणों में जल दिखता है, वैसे ही यह जगत् है—इसमें डमका त्याग करो ।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे चित्तचमत्कारो नाम शताधिकचतुस्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ १३४ ॥

भुशुण्डिजी बोले, हे विद्याधर ! यह सब स्थावर जङ्गम जगत् आत्मा में उत्पन्न हुआ है और आत्मा ही में स्थित है । आत्मा ही विश्व में स्थित है । जैसे स्वप्न का विश्व स्वप्न देखनेवाले में स्थित होता है । आत्मा किसी का कारण नहीं; क्योंकि अद्वैत है । हे अङ्ग ! जो तू उस पद के पाने की इच्छा करता है तो तू ऐसा निश्चय कर कि न मैं हूँ और

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ <span style="float:right;">४०१</span>

न यह जगत् है। जब तू ऐसा जानेगा, तब आत्मपद की प्राप्ति होगी, जो कि देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित है। सर्वत्र सब वही परमात्मतत्त्व है। जगत् का कर्त्ता संकल्प ही है; क्योंकि संकल्प से जगत् उत्पन्न होता है। जैसे पवन से अग्नि उत्पन्न होता है और पवन ही से दीपक का निर्वाण होता है, वैसे ही जब संकल्प बहिर्मुख फुरता है, तब संसार उदय हो भासित होता है, और जब संकल्प अन्तर्मुख होता है, तब आत्मपद प्राप्त होता है, सब प्रपञ्च उरमी में लय हो जाता है। इस प्रकार संसार की नाना प्रकार की संज्ञाएँ फुरने से ही होती हैं, स्वरूप में कुछ नहीं है। न सत्य है, न असत्य है, न स्वतः है, न अन्य से है। यह सब कल्पनामात्र है। सत्, असत् और स्वतः, अन्य का जब अभाव हुआ, तब वहाँ अहं-त्वं कहाँ मिलेंगे? वह है नहीं और बालक के यक्षवत् भ्रममात्र है।

हे साधो! जहाँ अहं-त्वं नष्ट हो गये, वहाँ जो सत्ता बची वही परमपद है। जहाँ जगत् का भ्रम है, वहाँ वह विचार से लीन हो जाता है। वास्तव में पूछो तो ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं—नाम-मात्र दो हैं—जैसे घट और कुम्भ—परन्तु भ्रम से नानात्व भासित होता है। जैसे समुद्र में उठनेवाले आवर्त्त और तरङ्ग जल से कुछ भिन्न नहीं और पवन के संयोग से उनके आकार भासित होते हैं, वैसे ही आत्मा में जगत् कुछ भिन्न नहीं। संकल्प के उठने से नाना प्रकार का जगत् भासित होता है। हे अङ्ग! संकल्प के साथ मिलकर चित्त जैसी भावना करता है, वैसा ही अपना रूप देखता है स्वरूप से कुछ भिन्न नहीं, परन्तु जीव भावना से और का और देखता है। जैसे शुद्ध मणि के निकट कोई रङ्ग रखिये, वैसा ही रंग भासित होता है, पर मणि में कोई रङ्ग नहीं होता, वैसे ही चित्त शक्ति में कुछ हुआ नहीं, पर हुए की नाईं स्थित है। इससे अपने स्वरूप की भावना करो और जड़ चैतन्य को छोड़कर शुद्ध चैतन्य में स्थित होओ। जब ऐसे जानकर अपने स्वरूप में स्थित होगे, तब तुम्हें उत्थान में भी अपना स्वरूप दिखेगा। जैसे स्थिर समुद्र में जो तरङ्ग उठते हैं, वे कारणरूप जल के

४०२ ☸ योगवाशिष्ट ☸

बिना तो नहीं होते, वैसे ही कारणरूप ब्रह्म बिना जगत् नहीं है; परन्तु ब्रह्मसत्ता अकर्ता, अद्वैत और अच्युत है। इसी से कहा है कि ब्रह्म अकर्ता है और जगत् अकारणरूप है। जो जगत् अकारणरूप है तो वह न उपजता है और न नाश होता है—मरुस्थल के जल की तरह भ्रममात्र है। इसी से कहा है कि जगत् कुछ वस्तु नहीं, केवल अज, अच्युत और शान्तरूप आत्मतत्त्व ही अखण्डित स्थित है और शिला कोश की तरह अद्वैत चिन्मात्र है। जिसके हृदय में चिन्मात्र की भावना नहीं, उस मूर्ख को हम क्या कहें ! हे साधो ! वास्तव में परमार्थ दृष्टि से कुछ भी नहीं बना, पर जहाँ-जहाँ मन है, वहाँ-वहाँ अनेक जगत् हैं। तृण से सुमेरु तक सब जगत् में हैं। जो विचारकर देखिये तो सब वही ब्रह्मरूप है, और कुछ नहीं। जैसे सुवर्ण को जान लेने से भूषण भी सुवर्ण भासित होता है, वैसे ही केवल सत्ता समानपद एक अद्वैत है, भिन्न कुछ नहीं। और भिन्न-भिन्न संज्ञाएँ भी वही हैं।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे शताधिकपञ्चत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥१३५॥

भुशुण्डिजी बोले, हे विद्याधर ! जब आत्मपद प्राप्त होता है, तब ऐसी अवस्था होती है कि जो नग्न शरीर हो और उस पर बहुत शस्त्रों की वर्षा हो तो भी उसमे जीव दुःखी नहीं होता और सुन्दर अप्सरा कण्ठ से लगे तो हर्ष नहीं होता, अर्थात् दोनों ही में समदर्शी रहता है। हे विद्याधर ! तब तक आत्मपद का अभ्यास करे, जब तक संसार में सुपुप्ति की नाईं न हो जाय। अभ्यास ही से आत्मपद प्राप्त होगा। जब आत्मपद की प्राप्ति होगी, तब पाञ्चभौतिक शरीर को ताप या ज्वर स्पर्श न करेंगे, और यदि शरीर के हों भी, तो भी उनके अन्तः-करण में प्रवेश नहीं करते। वह केवल शान्तपद में स्थित रहता है—जैसे जल कमल को स्पर्श नहीं करता। हे देवपुत्र ! जब तक देहादि में अभ्यास है, तब तक आत्मा के प्रमाद से सुख-दुःख स्पर्श करते हैं। जब आत्मा का साक्षात्कार होता है, तब सब प्रपञ्च भी आत्मरूप हो जाते हैं। हे विद्याधर ! जैसे कोई पुरुष विष-पान करता है तो उसको जलन और खाँसी होती है—यह अवस्था विष की है—विष में भिन्न और कुछ

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ४०३

नहीं परन्तु यह नामसंज्ञा हुई है। विष न जन्मता, न मरता है और जलन-स्वाँमी उसमें देख पड़ती है, वैसे ही आत्मा न जन्मता है, न मरता है, और गुणों के साथ मिलकर भिन्न अवस्थाओं को प्राप्त हुआ देख पड़ता है।

आत्मा जन्ममरण से रहित है, पर गुणों के साथ मिलने से जन्मता-मरता भासित होता है और अन्तःकरण, देह, इन्द्रियादिक भिन्न-भिन्न जान पड़ते हैं। हे साधो! यह जगत् भ्रम से प्रतीत होता है। जो ज्ञानवान् पुरुष हैं, वे इस जगत् को गाय के पैर के गढ़े की तरह अपने पुरुषार्थ से नाँघ जाते हैं, और जो अज्ञानी हैं, उनको अल्प भी समुद्र समान हो जाता है। इससे आत्मपद पाने का यत्न करो, जिसके जानने से संसारसमुद्र तुच्छ हो जायगा। वह आत्मतत्त्व सबमें अनुस्यूत और सबसे अतीत है। उसके जानने से अन्तःकरण शीतल हो जाता है और सब ताप नष्ट हो जाते हैं। हे साधो! फिर उसका त्याग करना अविद्या और बड़ी मूर्खता है। हे साधो! ये सब पदार्थ ब्रह्मस्वरूप ही हैं। जब ब्रह्मस्वरूप हुए तब मन, अहंकार, कलङ्क आदिक भी वही हैं—किसी से किसी को कुछ सुख-दुःख नहीं। हे विद्याधर! जब आत्मपद को जाना, तब अन्तःकरण आदि भी ब्रह्मस्वरूप भासित होंगे। जो संकल्प से भिन्न-भिन्न जाने जाते हैं, वे संकल्प के होते भी ब्रह्मस्वरूप भासित होंगे। इसलिए संकल्प हीन होकर स्थित हो, सोचो—न मैं हूँ, न यह जगत् है और न इदम् है। इन शब्दों और अर्थों से रहित होकर स्थित हो रहो, सब संशय मिट जावें।

हे विद्याधर! जब तू ऐसा निरहंकार और निःसंकल्प होगा, तब उत्थानकाल में भी बुद्धि, बोध, लज्जा, लक्ष्मी, स्मृति, यश, कीर्ति इत्यादिक जो शुभाशुभ अवस्था हैं, सब आत्मस्वरूप भासित होंगी और सबमें आत्मबुद्धि रहेगी। इनके प्राप्त होने पर भी केवल परमार्थ सत्ता से भिन्न न भासित होगा—जैसे अन्धकार में सर्प के पैर का चिह्न नहीं जान पड़ता क्योंकि वह है ही नहीं, वैसे ही तुमको सब अवस्थाएँ न भासित होंगी—सब आत्मा ही भासित होगा—

४०४ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

और जितने कुछ भावरूप पदार्थ स्थित हैं, वे अभाव हो जावेंगे। हे अङ्ग! जिस पुरुष ने विचारकर आत्मपद पाने का यत्न किया है, वह पावेगा और जिसने कहा कि मैं मुक्त हो जाऊँगा और ईश्वर मुझ पर दया करेंगे, वह पुरुष कभी मुक्त न होगा। पुरुष के प्रयत्न बिना कभी मुक्ति न होगी। आत्मस्वरूप में न कोई दुःख है और न किसी गुण से मिला हुआ सुख है। वह केवल शान्तरूप है। किसी से किसी को कुछ सुख-दुःख नहीं; न सुख है और न दुःख है, न कोई कर्त्ता है और न भोक्ता है, केवल ब्रह्मतत्ता अपने आपमें स्थित है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शताधिकषट्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ १३६ ॥

भुशुण्डिजी बोले, हे विद्याधर! जैसे कोई कल्पना करे कि आकाश में अन्य आकाश स्थित है तो वह मिथ्या प्रतीति है, वैसे ही आत्मा में जो अहंकार उठता है वह मिथ्या है। जैसे आकाश में अन्य आकाश कुछ वस्तु नहीं; परमार्थ तत्त्व ऐसा सूक्ष्म है कि उसमें आकाश भी स्थूल है। वह ऐसा स्थूल है कि उसके आगे सुमेरु आदिक भी सूक्ष्म आणुण है। राग-द्वेष से रहित चैतन्य केवल शान्तरूप है—गुण और तत्त्व के क्षोभ से रहित है। हे देवपुत्र! निजानुभवरूपी चन्द्रमा अमृत का बरसानेवाला है। हे अङ्ग! जितने दृश्य पदार्थ दिखते हैं, वे हुए कुछ नहीं। हे अङ्ग! आत्मरूप अमृत की भावना कर, जिससे तू जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त हो। जैसे आकाश में दूसरे आकाश की कल्पना मिथ्या है, वैसे ही निराकार चिदात्मा में अहं मिथ्या है। और जैसे आकाश अपने आपमें स्थित है वैसे ही आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित और अहं-त्वं आदि से रहित है। जब उसमें अहं का उत्थान होता है, तब जगत् फैल जाता है—जैसे वायु जब फुरने से रहित होती है, तब आकाशरूप ही होती है, वैसे ही रहित उत्थान अहं से रहित होने पर आत्मरूप हो जाती है और जगत् का भ्रम मिट जाता है।

फुरने में जगत् फुर आया है; वास्तव में कुछ नहीं है। ज्ञानवान् को आत्मा ही भासित होता है। देश, काल, बुद्धि, लज्जा, लक्ष्मी, स्मृति, कांति सब आकाशरूप हैं—ब्रह्मरूपी चन्द्रमा के प्रकाश से प्रकाशित

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ४०५

होते हैं। जैसे बादलों के संयोग से आकाश धूमिल होता है, वैसे ही प्रमाद से संवित् दृश्यभाव को प्राप्त होती है; परन्तु और कुछ नहीं हो जाती। जैसे तरङ्ग उठने से जल और कुछ नहीं हो जाता और जैसे काष्ठ काटने में और कुछ नहीं हो जाना, वैसे ही द्रष्टा से दृश्य भिन्न नहीं होता। जैसे केले के खम्भे में पत्ते के सिवा और कुछ नहीं निकलता और पत्ते शून्यरूप हैं, वैसे ही यह जगत् भासित होता है, परन्तु आत्मा से भिन्न नहीं, शून्यरूप है। शीश, भुजा, नेत्र, चरण आदिक नाना अंग जो भिन्न-भिन्न भासित होते हैं, वे सब शून्यरूप केले के पत्तों की नाईं हैं और सब असाररूप हैं। हे विद्याधर ! चित्त में रागरूपी मलीनता है। जब वैराग्यरूपी झाड़ू से झाड़िये, तब चित्त निर्मल हो। जैसे दीवार पर चित्र लिखे जाते हैं, वैसे ही आत्मा में जगत् भासित होता है। देवता, मनुष्य, नाग, दैत्य आदि का यह सब जगत् संकल्परूपी चितेरे ने चित्र सदृश लिखे हैं। ये स्वरूप के विचार से निवृत्त हो जाते हैं। जब स्नेहरूप संकल्प फुरता है, तब भाव-अभावरूप जगत् फैल जाता है। जैसे जल में तेल के बूंद फैल जाते हैं और जैसे बाँस में अग्नि निकल-कर बाँस को दग्ध करती है, वैसे ही संकल्प इससे उपजकर इसी को खाते हैं। आत्मा में जो देश-काल-पदार्थ भासित होते हैं, वही अविद्या है-पुरुषार्थ से इसका अभाव करो। दो भाग साधुओं के संग और सत् कथा सुनकर नष्ट करो; तृतीय भाग को शास्त्र का विचार करके और चतुर्थ भाग को आत्मज्ञान का आप ही अभ्यास करके मिटाओ। इस उपाय से अविद्या नष्ट हो जावेगी और अशब्द, अरूपपद की प्राप्ति होगी।

विद्याधर ने पूछा, हे मुनीश्वर ! जिन चार भागों ने नाश से अशब्द-पद प्राप्त होता है, वह काल का क्रम क्या है ? और नाम-अर्थ का अभाव होने पर शेष क्या रहता है ? भुशुण्डिजी बोले, हे विद्याधर ! संसार-समुद्र के तरने को ज्ञानवानों का संग करना और जो विद्वान निर्वैर पुरुष हैं, उनका भली प्रकार टहल करना। इसमें अविद्या का अर्ध-भाग नष्ट होगा। तीसरा भाग मनन करके और चतुर्थ भाग अभ्यास

५०६ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

करके नष्ट होगा। जो यह उपाय न कर सको तो यह युक्ति करो कि जिसमें चित्त अभिलाषा करके आसक्त हो, उसी का त्याग करो। एक भाग अविद्या इस प्रकार नष्ट होगी। तीन भाग शास्त्र-विचार और अपने यत्न से शनः-शनैः नष्ट होवेगा। साधुसंग, सत्शास्त्र-विचार और अपना यत्न हो तो एकवारगी अविद्या नष्ट हो जावेगी। ये समकाल कहे हैं। एक-एक के सेवने में एक-एक भाग निवृत्त होता है। पीछे जो शेष रहता है, उसमें काम-अर्थ सब असतरूप हैं और वे अजर, अनन्त, एकरूप हैं। संकल्प के उपजने से पदार्थ भासित होते हैं और संकल्प के लीन होने पर लीन हो जाते हैं। हे विद्याधर! यह जगत संकल्प ने रचा है—जैसे आकाश में सूर्य निराधार स्थित होता है, वैसे ही देश-काल की अपेक्षा से रहित यह मननमात्र स्थित है। तीनों जगत मन के फुरने से प्रकट होते हैं और मन के लय होने से लय हो जाते हैं—जैसे स्वप्न के पदार्थ जागने में मिट जाते हैं। हे विद्याधर! ब्रह्मरूपी बन में एक कल्पवृक्ष है, जिसकी अनेक शाखाएँ हैं। उसकी एक शाखा में जगतरूपी गूलर का फल है, जिसमें देवता, दैत्य, मनुष्य, पशु आदिक मच्छर हैं। वासनारूपी रस से पूर्ण मज्जा पहाड़ है। पञ्चभूत सूत द्वारा उनका निकलने का खुला मार्ग इत्यादिक सुन्दर रचना बनी है।

उसमें त्रिलोकी का ईश्वर एक इन्द्र हुआ और गुरु के उपदेश से उसका आवरण नष्ट हो गया। फिर इन्द्र और दैत्यों का युद्ध होने लगा और इन्द्र अपनी सेना को ले चला। पर उसकी निर्बलता हुई, इसलिए वह भागा और दशों दिशाओं में घूमता रहा। पर जहाँ जावे, वहीं दैत्य उसके पीछे चले आवें। जैसे पापी परलोक में शोभा नहीं पाता, वैसे ही इन्द्र ने जब शान्ति न पाई, तब अणुमात्ररूप करके सूर्य के त्रसरेणु में प्रवेश कर गया। जैसे कमल में भौंरा प्रवेश करे, वैसे ही उसने प्रवेश किया तो वहाँ उसको युद्ध का वृतान्त भूल गया। तब उसने एक मन्दिर में बैठा अपने को देखा। जैसे निद्रा से स्वप्न-सृष्टि प्रकट हो, वैसे ही उसने वहाँ रत्न और मणियों संयुक्त नगर देखा

🌸 निर्वाण प्रकरण 🌸 ४०७

वह उनमें गया और पृथ्वी, पहाड़, नदियाँ, चन्द्र, सूर्य, त्रिलोकी उनको वहाँ दिखाई देने लगी। उस जगत् का इन्द्र अपने को उनमें देखा कि दिव्य भोग और ऐश्वर्य से सम्पन्न मैं इन्द्र स्थित हूँ। वह इन्द्र कुछ काल के उपरान्त शरीर को त्यागकर निर्वाण को प्राप्त हुआ- जैसे तेल से रहित दीपक निर्वाण होता है। तब कुन्द नाम उसका पुत्र इन्द्र हुआ और राज्य करने लगा। फिर उसके एक पुत्र हुआ। तब कुन्द भी इन्द्र शरीर को त्यागकर परमपद को प्राप्त हुआ और उसका पुत्र राज्य करने लगा। फिर उसके भी एक पुत्र हुआ। इसी प्रकार सहस्र पुत्र होकर राज्य करते रहे। उन्हीं के कुल में यह हमारा इन्द्र राज्य करता है। इससे यह जगत् संकल्पमात्र है और उस अमरेणु से यह सृष्टि है। इसलिए इस जगत् को संकल्पमात्र जानकर इसकी आस्था त्यागो।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे इन्द्रोपाख्याने अमरेणुजगत्-वर्णननाम शताधिकसप्तविंशतितमसर्गः ॥ १३७ ॥

भुशुण्डजी बोले, हे विद्याधर ! फिर उनके कुल में एक बड़ा श्रीमान् इन्द्र हुआ, जो त्रिलोकी का राज्य करता रहा और फिर निर्वाण को प्राप्त हुआ। उसके एक पुत्र था, जिसको बृहस्पतिजी के वचनों से ज्ञानरूप प्रतिभा उदय हुई। तब वह विदितवेद होकर स्थित हुआ। यथाप्राप्ति में इन्द्र होकर राज्य करने लगा और दैत्यों को जीता। एक समय वह किसी कार्य के लिए कमल के तन्तु में घुस गया तो वहाँ उसको नाना प्रकार का जगत् दिखने लगा और अपनी इन्द्र की प्रतिभा हुई। इससे उसे इच्छा हुई कि मैं ब्रह्मतत्त्व को पाऊँ और दृश्य पदार्थ की तरह उसे प्रत्यक्ष देखूँ। इसलिए वह एकान्त में बैठकर समाधि में स्थित हुआ। तब उसको भीतर-बाहर ब्रह्म का साक्षात्कार हुआ और प्रतिभा के उदय होने से यह निश्चय हुआ कि सब ब्रह्म ही है और वही पूजने योग्य है। सब उसी को पूजते भी हैं। केवल शुद्ध आत्मपद सब शब्द, रूप, अवलोक और नमस्कार से रहित है। सब ओर उसी के पाणिपाद हैं। सब सिर और मुख उसी के हैं।

४०८ ❋ योगवाशिष्ठ ❋

सब ओर उसके श्रवण हैं। सब ओर उसके नेत्र हैं। आत्मतत्त्व में वही मनमें स्थित हो रहा है। सब इन्द्रियों और विषयों को वही प्रकाशित करता है। वह सब इन्द्रियों से रहित है और असक्त हुआ भी सबको धारण कर रहा है। वह निर्गुण है और इन्द्रियों के साथ मिलकर गुणों को भोगता है। वही सब प्राणियों के भीतर बाहर व्याप्त रहा है। सूक्ष्म है, इससे दुर्विज्ञेय है, और इन्द्रियों का विषय नहीं है। अज्ञानी का अज्ञान के कारण दूर है और आत्मत्व द्वारा ज्ञानी को ज्ञान के कारण निकट है। वह अनन्त, सर्वव्यापी केवल शान्तरूप है, जिसमें दूसरा कोई नहीं। घट, पट, दीवार, गाय, आँदा, नाग, नर सबमें वही तत्त्व भासित है। पर्वत, पृथ्वी, चन्द्र, सूर्य, देश, काल, वस्तु, सब ब्रह्म ही है, ब्रह्म से भिन्न नहीं।

हे विद्याधर! इस प्रकार इन्द्र को ज्ञान हुआ और वह जीवन्मुक्त हुआ। तब वह सब चेष्टा करता, परन्तु अन्तःकरण में नहीं बँधता। जब कुछ काल बीता, तब इन्द्र उस निर्वाणपद को प्राप्त हुआ, जिसमें आकाश भी स्थूल है। फिर उस इन्द्र का एक बड़ा शूरवीर पुत्र सब दैत्यों को जीतकर देवताओं और त्रिलोकी का राज्य करने लगा। फिर उसको भी ज्ञान उत्पन्न हुआ। सतशास्त्र और गुरु के वचनों से कुछ काल में वह भी निर्वाण को प्राप्त हुआ। तब उसका जो पुत्र था, वह राज्य करने लगा। इसी प्रकार कई इन्द्र राज्य करते और नाना प्रकार के व्यवहारों को देखते रहे। फिर उसके कुल में कोई पुत्र था, उसको यह हमारी सृष्टि भाषित हुई तो वह भी ब्रह्मध्यानी हुआ और इस त्रिलोकी का राज्य करने लगा। अब तक विश्व का इन्द्र वही है। हे विद्याधर! इस प्रकार विश्व की उत्पत्ति संकल्पमात्र है और सब मैंने तुझसे कही। पहले उसको त्रसरेणु में सृष्टि दिखी, फिर उस सृष्टि के एक कमल के तन्तु में दिखी। फिर उसमें कई वृत्तान्त, जो संकल्पमात्र थे, उसने देखे। फिर उस अणु में अनेक अवस्थाएँ देखीं। हे विद्याधर! पर वास्तव में यह कुछ हुई नहीं। जैसे आकाश में नीलिमा भाषित होती है, पर है नहीं वैसे ही यह विश्व है। आत्मा में विश्व का अत्यन्त अभाव

# ✽ निर्वाण प्रकरण ✽

४०६

है। यह विश्व अहंभाव से उपजा है। जब अहंभाव उठता है, तब आगे सृष्टि बनती है, और जब अहं का अभाव होता है, तब विश्व कुछ नहीं। इस विश्व का बीज अहं है, इससे तू ऐसी भावना कर कि न मैं हूँ और न जगत् है। जब ऐसी भावना करेगा, तब आत्मा ही शेष रहेगा, जो प्रत्यक्ष ज्ञानरूप अपना रूप है। हे विद्याधर ! इस मेरे उपदेश को अङ्गीकार कर।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे संकल्पसंकल्पैकताप्रतिपाद- न्नमाम शताधिकअष्टत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ १३८ ॥

भुशुण्डिजी बोले, हे विद्याधर ! जब अहं का उत्थान होता है, तब आगे सृष्टि बनकर भासित होता है, और जब अहं का अभाव होता है तब विश्व कुछ नहीं भासित होता, केवल शुद्ध आत्मा ही भासित होता है। हे विद्याधर ! इन्द्र ने कहा कि मैं हूँ। उसको सूर्य की किरणों के अणु में ऐसे अहं हुआ तो उसने उसमें नाना विस्तार देखा और कष्ट पाया। जो उसको अहं न होता तो दुःख न पाता। दुःखरूपी वृक्ष का अहं बीज है। आत्मविचार से इसका नाश होता है। जब अहं का नाश होता है, तब आत्मपद का साक्षात्कार होता है। आत्मपद का साक्षात्कार होने से प्रच्छन्न अहं का नाश होता है। हे विद्याधर ! आत्मारूपी एक पर्वत है, जिस पर आकाशरूपी वन है। उसमें संसाररूपी वृक्ष लगा है। उसमें वासनारूपी रस है। अज्ञानरूपी भूमि से वह उत्पन्न हुआ है। नदियाँ, समुद्र उसकी नाड़ी हैं। चन्द्रमा और तारे फूल हैं। वासनारूपी जल से वह बढ़ता है। वही अहंकाररूपी वृक्ष का बीज है। सुख-दुःखरूपी इसके फल हैं। आकाश इसकी डालें और पाताल जड़ है। तुम इस वृक्ष को ज्ञानरूपी अग्नि से जलाओ और अहंरूपी वृक्ष के बीज का नाश करो। हे विद्याधर ! एक खाई है, जिसके जन्ममरणरूपी दो किनारे हैं। उसमें अनात्मारूपी जल है। वासनारूपी तरंगें उठती हैं और विश्वरूपी बुलबुले उठते हैं और मिट भी जाते हैं। शरीररूपी झाग है और अहंकाररूपी वायु है। जब वायु हुई तब तरंग और बुल-बुले सब होते हैं और जब वायु मिट गई, तब केवल स्वच्छ निर्मलरूप ही भासित होता है।

४१० ✲ योगवाशिष्ठ ✲

हे विद्याधर ! जो वायु हुई तो जल से भिन्न कुछ न हुआ और जो न हुई तो भी जल से भिन्न कुछ नहीं, जल ही है । वैसे ही अज्ञान के होने और निवृत्त होने पर भी आत्मपद ज्यों का त्यों है । परन्तु सम्यक्दर्शन से आत्मपद और अज्ञान से जगत् भासित होता है । अहं का होना ही अज्ञान है । जब अहं हुआ तब मम भी होता है । सो 'अहं' 'मम' नाम संसार का है । जब अहं-मम मिटता है, तब जगत् का अभाव होता है । अहं के होने दृश्य भासित होता है और दृश्य में अहं होता है । इसमें संवेदन को त्यागकर निर्वाणपद में प्राप्त हो । इतना कह भुशुण्डिजी ने मुझसे कहा कि हे वशिष्ठजी ! इस प्रकार जब मैंने विद्याधर को उपदेश किया तो वह समाधि में स्थित होकर निर्वाणपद को प्राप्त हुआ । जैसे दीपक बुझ जाता है, वैसे ही उसका चित्त क्षोभ से रहित शान्ति को प्राप्त हुआ । हे ब्राह्मण ! उसका हृदय शुद्ध था, इस कारण मेरे वचन शीघ्र ही उसके हृदय में प्रवेश कर गये । जब वह समाधि में स्थित हुआ तो मैंने उसको बारम्बार जगाया परन्तु वह न जागा—जैसे कोई जलता-जलता शीतल समुद्र में जाकर बैठे और उससे कहिये कि तू निकल तो वह नहीं निकलता; वैसे ही संसारताप से जलता हुआ जीव जब आत्मसमुद्र में गोता लगाता है, तब वह संसार के अज्ञानरूपी प्रवाह को नहीं देखता । हे वशिष्ठजी ! जिसका अन्तःकरण शुद्ध होता है, उसको थोड़े वचन भी बहुत हो लगते हैं । जैसे तेल की एक बूंद जल में बहुत फैल जाती है, वैसे ही जिसका अन्तःकरण शुद्ध होता है, उसको थोड़ा वचन भी बहुत होकर लगता है । पर जिसका अन्तःकरण मलिन होता है, उस पर वचन प्रभाव नहीं डालते । जैसे आरसी पर मोती नहीं ठहरता वैसे ही गुरुशास्त्र के वचन उसको नहीं लगते । जब विषयों से वैराग्य उपजे; तब जानिये कि हृदय शुद्ध हुआ ।

हे वशिष्ठजी ! जब मैंने विद्याधर को उपदेश किया, तब वह शीघ्र ही आत्मपद को प्राप्त हुआ; क्योंकि उसका चित्त निर्मल था । हे मुनीश्वर ! जो तुमने मुझसे पूछा था सो मैंने कहा कि उस

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विद्याधर को मैंने अज्ञान से रहित चिरकाल जीता देखा। इतना कह वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ऐसे कहकर काकभुशुण्डि चुप हो रहे और मैं नमस्कार करके आकाशमार्ग से अपने घर आया। हे राम ! मेरे और काकभुशुण्डि के इस संवाद को एकादश चौकड़ी युग बीतते हैं। हे राम ! यह कोई नियम नहीं है कि थोड़े काल में ज्ञान उपजे वा बहुत काल में। यह हृदय की शुद्धता की बात है। जिसका हृदय शुद्ध होता है, उसको गुरु और शास्त्रों का वचन शीघ्र ही लगता है—जैसे जल नीचे को स्वाभाविक जाता है। हे राम ! इतना उपदेश जो मैंने तुमको क्रम से किया है, उसका तात्पर्य यही है कि वासना को त्याग करो, सोचो कि न मैं हूँ और न कोई जगत् है—तब पीछे निर्विकल्प केवल आत्मपद रहेगा, जो सबका अपना रूप है और उसका साक्षात्कार तुमको होगा। जैसे मलिन दर्पण में मुख नहीं दीखता, वैसे ही आत्मरूपी दर्पण अहंशूपी मल से ढका है। जब इसका त्याग करोगे, तब आत्मपद की प्राप्ति होगी और जगत् भी अपना रूप भासित होगा। आत्मा से भिन्न कुछ नहीं है; क्योंकि सब केवल आत्मतत्त्वमात्र है। और जो कुछ भासित होता है, उसे मृगतृष्णा के जल सा और बन्ध्या के पुत्र सा जानो। यह जगत् आत्मा के प्रमाद से भासित होता है—जैसे आकाश में नीलिमा भासित होती है, पर है नहीं, वैसे ही जगत् प्रत्यक्ष भासित होता है और है नहीं। जैसे रस्सी में सर्प मिथ्या है, वैसे ही आत्मा में जगत् मिथ्या है। जब आत्मा का ज्ञान होगा, तब जगत् का अत्यन्त अभाव होगा और केवल आत्मत्वमात्र भासित होगा।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुण्डि विद्याधरोपाख्यान-समाप्तिर्नाम शताधिकनवत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ १३६ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! तुम अहंवेदना से रहित होओ। संसाररूपी वृक्ष का बीज अहं ही है। वासना से शुभ-अशुभरूप कर्मों का सुख-दुःख फल है, और वह वासना ही से प्रफुल्लित होता है। इससे अहंभाव को निवृत्त करो जब अहं फुरता है, तब आगे जगत् भासित

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होता है । जब अहंता से रहित होगे तब जगत् का भ्रम मिट जावेगा । अहंता आत्मबोध में नष्ट होती है । आत्मबोधरूपी खंगारी में उड़ाया अहंतारूपी पाषाण न जानोगे कि कहाँ गया । सुवर्ण मिट्टी के ढेले सा तुमको हो जावेगा । शरीररूपी पत्ते पर अहंतारूपी अणु स्थित है; जब बोधरूपी वायु चलेगी तब न जान पाओगे कि कहाँ गया । शरीर-रूपी पत्ते पर अहंतारूपी वरफ का कणका स्थित है; बोधरूपी सूर्य के उदय होने पर न जानोगे कि वह कहाँ गया । बोध बिना अहंता नष्ट नहीं होती । चाहे कीचड़ में रहे और चाहे पहाड़ में जावे, चाहे घर में रहे और चाहे स्थल में रहे, चाहे स्थूल हो और चाहे सूक्ष्म हो, चाहे निराकार हो और चाहे रूपान्तर को प्राप्त हो, चाहे भस्म हो और चाहे मृतक हो, चाहे दूर हो अथवा निकट हो, जहाँ रहेगा, वहीं अहंता इसके साथ है । हे राम ! संसाररूपी वट का बीज अहंता है । उसी से सब शाखा फैली हैं । सब अर्थों का कारण अहंता है । जब तक अहंता है, तब तक दुःख नहीं मिटता । और जब अहंभाव नष्ट होता है तब परमसिद्धि की प्राप्ति होती है । हे राम ! जो कुछ मैंने उपदेश किया है, उसका भली प्रकार विचारकर उसका अभ्यास करो, तब संसाररूपी वृक्ष का बीज जल जायगा और आत्मपद की प्राप्ति होगी ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे अहंभावत्यागोपदेशो नाम शताधिकचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ १४० ॥

वशिष्टजी बोले, हे राम ! संसार संकल्पमात्र से सिद्ध है और भ्रम में उदय हुआ है । आत्मस्वरूप में अनेक सृष्टियाँ बनती हैं । कोई लीन होती हैं, कोई उत्पन्न होती हैं और कोई उड़ती हैं, कहीं इकट्ठी उड़ती हैं और कहीं भिन्न-भिन्न उड़ती हैं, सो सब मुझको प्रत्यक्ष भासित होती हैं, देखो, वे उड़ती जाती हैं । ये सब आकाशरूप हैं और आकाश ही में मिलती हैं । जैसे केले का वृक्ष देखने भर को सुन्दर होता है, पर उसमें कुछ सार नहीं होता, वैसे ही विश्व देखने भर को सुन्दर है, पर आकाश रूप है । जैसे जल में पहाड़ का प्रतिबिम्ब पड़ता है और हिलना जान पड़ता है, वैसे ही यह जगत् है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! आप कहते

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है कि सृष्टि मुझे प्रत्यक्ष उड़ती दिखती है—तुम भी देखो; यह तो मैंने कुछ नहीं समझा कि आप क्या कहते हैं? वशिष्ठजी बोले, हे राम! अनेक सृष्टियाँ उड़ती हैं, सो सुनो। पञ्चभौतिक शरीर में प्राण स्थित हैं। प्राण में चित्त स्थित है। और उस चित्त में अपनी-अपनी सृष्टि है। जब यह पुरुष शरीर का त्याग करता है, तब लिङ्गशरीर (जो वासना और प्राण है) उड़ता है। उस लिङ्गशरीर में जो विश्व है, वह सूक्ष्मदृष्टि से मुझको भासित होता है। हे राम! आकाश में जो वायु है, उसका रूपरङ्ग कुछ नहीं। वही वायु प्राणों से मिलकर मुझे प्रत्यक्ष दिखाई देती है। इसी का नाम जीव है। यथार्थ में न कोई आता है, न जाता है, परन्तु लिङ्गशरीर के संयोग से आता-जाता और जन्मता-मरता दीखता है। मनुष्य अपनी वासना के अनुसार आत्मा में विश्व देखता है। यह वासनामात्र सृष्टि है। जैसी वासना होती है, वैसा ही विश्व भासित होता है।

हे राम! यह पुरुष आत्मस्वरूप है, परन्तु लिङ्गशरीर के मिलने से इसका नाम जीव हुआ है। यह अपने को प्रच्छन्न जानता है; पर वास्तव में ब्रह्मस्वरूप है। देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित ब्रह्म है, पर प्रमाद से अपने को कुछ का कुछ मानता है। इसी का नाम लिङ्गशरीर है। जैसे घटाकाश भी महाकाश है, परन्तु घट के खप्पर से परिच्छिन्न हुआ है, वैसे ही यह पुरुष भी आत्मस्वरूप है, और अहंकार के संयोग से प्रच्छन्न हुआ है। जैसे घट को एकदेश से उठाकर देशान्तर में ले जाकर रखो तो आकाश तो न कहीं गया और न आया, परन्तु आता-जाता लगता है, वैसे ही आत्मा अखण्डरूप है, परन्तु प्राण चित्त से चलता भासित होता है। जब अहंकाररूप चित्त नष्ट हो तब अखण्डरूप हो। जब तक अहंकार नहीं जाता, तब तक जगत् भ्रम दीखता है और वासना करके भटकता फिरता है। वासनामय सृष्टि अपने-अपने चित्त में स्थित है। जीव जब शरीर का त्याग करता है, तब आकाश में उड़ता है, और प्राणवायु उड़कर जो आकाश में शून्यरूप वायु है उससे जा मिलता है। वहाँ सबको अपनी-अपनी

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वासना के अनुसार सृष्टि भासित होता है। सब अपनी सृष्टि लेकर इस प्रकार उड़ते हैं, जैसे वायु गन्ध को ले जाती है। वही मुझको सूक्ष्म-दृष्टि से उड़ते भासित होते हैं। हे राम! स्थूलदृष्टि में लिङ्गशरीर नहीं भासित होता; सूक्ष्मदृष्टि में दीखता है। जिस पुरुष की सूक्ष्मदृष्टि में लिङ्गशरीर देखने की शक्ति है और ज्ञान से रहित है, वह भी मेरे मत में मूर्ख और पशु है।

हे राम! जब मनुष्य वासना का त्याग करता है, अर्थात् इस अहंकार को कि मैं हूँ, त्याग करता है तो आगे विश्व नहीं दिखाई देता, केवल निर्विकल्प ब्रह्म भासित होता है। उसके प्राण नहीं उड़ते, वहीं लीन हो जाते हैं; क्योंकि उसका चित्त अचित्त हो जाता है। जब तक अहंकार का संयोग है, तब तक विश्व भी चित्त में स्थित है। जैसे बीज में वृक्ष और तिलों में तेल होता है, वैसे ही उसके हृदय में विश्व स्थित है। जैसे मृत्तिका में बड़े छोटे बर्तन, लोहे में सुई और खड्ग और बीज में वृक्षभाव स्थित है, चैतन्य अथवा जड़ हो, वैसे ही यह संकल्पकल्पना में भेद है, स्वरूप से कुछ नहीं और वैसे ही यह जगत् भी है। हे राम! विश्व संकल्पमात्र है; क्योंकि दूसरी अवस्था में इसका नाश हो जाता है। यह जाग्रत् अवस्था जो तुमको भासित होती है, मिथ्या है। जब स्वप्न देख पड़ता है, तब जाग्रत् नहीं रहती। जब जाग्रत् आती है तब स्वप्न नष्ट हो जाता है। जब मृत्यु आती है, तब सृष्टि का अत्यन्त अभाव हो जाता है और देश, काल, पदार्थसहित वासनानुसार और सृष्टि भासित होता है। हे राम! यह विश्व ऐसा है, जैसे स्वप्ननगर। जैसे संकल्पपुर होते हैं, वैसे ही ये सब संकल्प उड़ते फिरते हैं। कई सृष्टि परस्पर मिलती हैं, कई नहीं मिलतीं, परन्तु सब संकल्परूप हैं। भ्रम में और का और भासित होता है। जैसे कोई पुरुष बड़ा होता है और कोई छोटा तो, छोटे को बड़ा भासित होता है। जैसे हाथी के निकट और पशु तुच्छ लगते हैं और चींटी के निकट और सब बड़े लगते हैं, वैसे ही जो ज्ञानवान् पुरुष है, उसको बड़े पदार्थ और देश-काल-संयुक्त विश्व तुच्छ भासित होता है और वह उन्हें असत्य जानता है। पर जो अज्ञानी है,

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उसको संकल्पसृष्टि बड़ी होकर भासित होती है । जैसे पहाड़ बड़ा भी होता है, परन्तु जिसकी दृष्टि से दूर है, उसको महालघु और तुच्छ सा लगता है और चींटी के निकट तुच्छ मृत्तिका का ढेला भी पहाड़ के समान है, वैसे ही ज्ञानी की दृष्टि में यही जगत् नहीं, इससे बड़ा जगत् भी तुच्छ लगता है । पर अज्ञानी को तुच्छ भी बड़ा लगता है ।

हे राम ! यह विश्व भ्रम से सिद्ध हुआ है । जैसे भ्रम से सीपी में रूपा और रस्सी में सर्प दिखता है, वैसे ही आत्मा के प्रमाद से यह विश्व भासित होता है, पर आत्मा से भिन्न नहीं है । जैसे निद्रादोष से जीव अपने अङ्ग भूल जाते हैं और जागने पर सब अङ्ग देख पड़ते हैं, वैसे ही अविद्यारूपी निद्रा में सोया हुआ जीव जब जागता है, तब उसे सब विश्व अपना रूप दिखाई देता है । जैसे स्वप्न से जागा हुआ पुरुष स्वप्न के विश्व को अलग ही देखता है, वैसे ही यह विश्व अपना रूप ही देख पड़ेगा । हे राम ! जब मनुष्य निद्रा में होता है, तब उसे शुभ-अशुभ विश्व में रागद्वेष कुछ नहीं होता, और जब जागता है तब इष्ट में राग और अनिष्ट में द्वेष होता है, इसी प्रकार जब तक विश्व में हेयोपादेय बुद्धि है, तब तक वह सर्वज्ञ हो तो भी मूर्ख है । हे राम ! जब जड़ हो जाय, तब कल्याण हो । जड़ होना यही है कि दृश्य से रहित आत्मा में स्थित हो । वह आत्मा चिन्मात्र है । जब तक आत्मा से भिन्न जो कुछ सत्य अथवा असत्य जानता है, तब तक स्वरूप की प्राप्ति नहीं होती । जब संवित् न फुरे, तब स्वरूप का साक्षात्कार हो । इससे वासना का त्याग करो । यह स्थावर-जङ्गम जगत् जो तुमको दिखता है सो सब ब्रह्मस्वरूप है । जब तुम ऐसे निश्चय करोगे, तब सब विवर्तों का अभाव हो जावेगा, और आत्मपद ही शेष रहेगा । राम ने पूछा, हे भगवन् ! यह जीव जो आपने कहा, सो जीव का स्वरूप क्या है ? वह आकार को कैसे ग्रहण करता है ? उसका अधिष्ठान परमात्मा कैसे है ? उसके रहने का स्थान कौन है ? कहिये ।

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह जीव शुद्ध परमात्मतत्त्व, निर्विकल्प, चिन्मात्र पद है, उसमें चैतन्योन्मुखत्व हुआ, अर्थात् 'मैं हूँ' ऐसे जो

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चित्कला अज्ञानरूप फुरी, उसको देह का सम्बन्ध हुआ है। उसी का नाम जीव है। वह जीव न सूक्ष्म है, न स्थूल है, न शून्य है, न अशून्य है, न थोड़ा है, न बहुत है, केवल शुद्ध आत्मतत्त्वमात्र है। वह न अणु है, न स्थूल है, अनन्त चैतन्य आकाशरूप है। उसी को जीव कहते हैं। स्थूल से स्थूल और सूक्ष्म से सूक्ष्म वही है। अनुभव चैतन्य सर्वगत जीव है। उसमें वास्तव शब्द कोई नहीं। और जो कोई शब्द है सो प्रतियोगी में मिलकर हुआ है। जीव अद्वैत है। उसका प्रतियोगी कैसे हो? यह जीव का स्वरूप है। चैत्य के संयोग से जीव हुआ है। उसका अधिष्ठान चैतन्य आकाश, निर्विकल्प, चैत्य से रहित, शुद्ध, चैतन्य परमात्मतत्त्व है। उसमें जो संवित् फुरी है, उसी का नाम जीव है। वह सूक्ष्म से सूक्ष्म, स्थूल से स्थूल और सबका बीज है। उसी को विराट् कहते हैं। उनका शरीर मनोमय है। वह आदि परमात्मतत्त्व में फुरा है और अन्य अवस्था को नहीं प्राप्त हुआ, अर्थात् अस्वच्छता को नहीं प्राप्त हुआ। वह अपने को सबका आत्मा जानता है। इसका नाम विराट् है। उसका प्रथम शरीर मनोमात्र और शुद्ध प्रकाशरूप गगनरूपी मल से रहित अनन्त आत्मा है, वह मन, कर्मों और देहों का बीज है; सबमें व्याप्त रहा है और सब जीवों का अधिष्ठाता है। उसी ने संकल्प से ये जीव रचे हैं, और पञ्चज्ञान इन्द्रिय, अहंकार, मन और संकल्प, ये आठों आकार ग्रहण किये हैं। परमार्थरूप को छोड़ फुरने में जो आकार उत्पन्न हुए हैं, उनको ग्रहण करने का नाम पुर्यष्टका है। फिर इन इन्द्रियों के छिद्र रचे और स्थूल रूप रचकर उनमें आत्मा प्रतीत किया। जैसे जीव शयनकाल में जाग्रत् शरीर को त्यागकर स्वप्न-शरीर अङ्गीकार करता है, वैसे ही शुद्ध, चिन्मात्र, निर्विकार, अद्वैतस्वरूप को त्यागकर उसने वासनामय शरीर अङ्गीकार किया है। पर वास्तव स्वरूप का त्याग नहीं किया और स्वरूप से नहीं गिरा। शुद्ध निर्विकल्प भाव को त्यागकर विराट्-भाव ग्रहण किया है।

इसी प्रकार आगे उस पुरुष ने ज्ञान से चारों वेद रचे और नीति को

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निश्चित किया। नीति इसे कहते हैं कि यह पदार्थ ऐसे हो और इतने काल तक रहे। निदान यह रचना रची और जो-जो संकल्प करता गया सो सो देश, काल, पदार्थ, दिशा, ब्रह्माण्ड सब होते गये। ईश्वर, विराट्, आत्मा, परमेश्वर इत्यादि सब जीव के नाम हैं। पर जीव का वासनामय स्वरूप झूठ नहीं। वासना के शरीर ग्रहण करने से वासनारूप कहा है, पर उसका वास्तवरूप शुद्ध, निर्विकार और अद्वैत है और कभी स्वरूप में अन्य अवस्था को नहीं प्राप्त हुआ; सदा ज्ञानरूप, अद्वैत और परमशुद्ध है। उसको अपने चैतन्य स्वभाव से चैत्य का संयोग हुआ है। इसी से कहा कि उसका वपु वासनारूप है। उसी आदि-जीव में ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि देवता, दैत्य, आकाश, मध्यलोक, पाताल और त्रिलोकी उत्पन्न हुई है। जैसे दीपक से दीपक जलता है और जल में जल होता है, वैसे ही सब विराट्स्वरूप हैं। महाआकाश उस विराट् का उदर है; समुद्र रुधिर है; नदियाँ नाड़ी हैं और दिशा वपु है। उसके उदर में सुमेरु पर्वत सहित कई ब्रह्माण्ड समाये रहते हैं। पवन उसका सिर है। उच्छ्वास पवन प्राणवायु है; पृथ्वी मांस है; सुमेरु आदिक पर्वत हाथ हैं; तारे रोमावली हैं; सहस्र शीश नेत्र हैं। वह अनन्त और अनादि है। चन्द्रमा उसका कफ है, जिसमे अमृत स्रवता है और प्राणी उपजते हैं। सूर्य पित्त है, जो सबको उत्पन्न करनेवाला है और सब मन, सब कर्मों और सब शरीरों का आदि-बीज विराट् है। हे राम! जीव इस चित्त के सम्बन्ध से तुच्छ हुआ है, पर वास्तव में परमात्मस्वरूप है। जैसे महाकाश घट के संयोग से घटाकाश होता है, वैसे ही विराट् परमात्मा ने फुरने से सृष्टि रची है और उसमें अहं प्रत्यय किया है, इससे तुच्छ हुआ है। यह इसको मिथ्या भ्रम हुआ है। जैसे स्वप्न में कोई अपना मरना देखता है, वैसे ही वह अपने को दृश्य देखता है। लघुता भी आत्मा की अपेक्षा से है; दृश्य में विराट् है और आत्मा में इसका अनुभव है।

हे राम! इसी प्रकार उसने उपजकर सृष्टि रची है। जैसे एक विराट् पुरुष ने आदि में निश्चय किया है, वैसे ही अब तक है। यह आप ही

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उपजा है और आप ही लीन हो जाता है । हे राम ! जिस प्रकार आत्मा में विराट् की उत्पत्ति हुई है, वैसे ही सब जीवों की हुई है । यह सब विराट्रूप है, परन्तु जो स्वरूप से उपजकर दृश्य में तद्रूप हुए हैं और जिनकी वास्तवस्वरूप भूल गया है, वे तुच्छरूप जीव हुए और जो स्वरूप में फुरकर स्वरूप में न गिरा और जिसे आगे अपना ही संकल्प-रूप विश्व देखकर प्रमाद न हुआ, उसका नाम विराट् आत्मा है । हे राम ! जीव चैतन्य और निराकाररूप है । उसको शरीर का संयोग कल्पना में हुआ है । यह जब अपने को दृश्य-संयुक्त देखता है, तब महाआपदा को प्राप्त होता है, और जब द्वैत से रहित निर्विकल्प होकर देखता है, तब शुद्ध चैतन्य आत्मपद को प्राप्त होता है । हे राम ! यह विराट् सबको उत्पन्न करता है । ऐसे कई विराट् आत्मपद से उदय हुए हैं; कई मिट गये हैं और कई आगे होंगे । जैसे समुद्र में कई तरङ्ग, बुलबुले उठते हैं और लीन होते हैं, वैसे ही आत्मरूपी समुद्र में कई विराट् उठते हैं; कई लीन होते हैं और कई उपजेंगे । ऐसा परमात्मा सबका अधिष्ठान है और सबमें भीतर-बाहर पूर्ण ज्ञानस्वरूप व्याप्त है । सोई तुम्हारा अपना रूप अनुभवरूप है । हे राम ! इस संवेदन को त्यागकर देखो, वही परमात्मस्वरूप है । यह जो कुछ तुमको भासित होता है, उसको विचारकर त्यागो । जब तुम इसका त्याग करोगे, तब तुम्हारा चिन्मात्र परम शुद्ध स्वरूप तुमको भासित होगा—उसके आगे चैतन्य ही आवरणरूप है । जैसे सूर्य के आगे बादलों का आवरण होता है, और जब तक बादल होते हैं, तब तक सूर्य का प्रकाश ज्यों का त्यों नहीं भासित होता, पर जब बादल दूर होते हैं, तब प्रकाश स्वच्छ दिखता है, वैसे ही जब वासना निवृत्त होवेगी, तब शुद्ध आत्मा ही प्रकाशमान होगा ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विराडात्मवर्णनं नाम शताधिकैकचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ १४१ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह परमात्मा पुरुष स्फुरण में जीवसंज्ञा को प्राप्त हुआ है । स्फुरण में भी वही है, पर अपने स्वरूप को नहीं