भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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पृष्ठ 410

# ✽ निर्वाण प्रकरण ✽

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है। यह विश्व अहंभाव से उपजा है। जब अहंभाव उठता है, तब आगे सृष्टि बनती है, और जब अहं का अभाव होता है, तब विश्व कुछ नहीं। इस विश्व का बीज अहं है, इससे तू ऐसी भावना कर कि न मैं हूँ और न जगत् है। जब ऐसी भावना करेगा, तब आत्मा ही शेष रहेगा, जो प्रत्यक्ष ज्ञानरूप अपना रूप है। हे विद्याधर ! इस मेरे उपदेश को अङ्गीकार कर।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे संकल्पसंकल्पैकताप्रतिपाद- न्नमाम शताधिकअष्टत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ १३८ ॥

भुशुण्डिजी बोले, हे विद्याधर ! जब अहं का उत्थान होता है, तब आगे सृष्टि बनकर भासित होता है, और जब अहं का अभाव होता है तब विश्व कुछ नहीं भासित होता, केवल शुद्ध आत्मा ही भासित होता है। हे विद्याधर ! इन्द्र ने कहा कि मैं हूँ। उसको सूर्य की किरणों के अणु में ऐसे अहं हुआ तो उसने उसमें नाना विस्तार देखा और कष्ट पाया। जो उसको अहं न होता तो दुःख न पाता। दुःखरूपी वृक्ष का अहं बीज है। आत्मविचार से इसका नाश होता है। जब अहं का नाश होता है, तब आत्मपद का साक्षात्कार होता है। आत्मपद का साक्षात्कार होने से प्रच्छन्न अहं का नाश होता है। हे विद्याधर ! आत्मारूपी एक पर्वत है, जिस पर आकाशरूपी वन है। उसमें संसाररूपी वृक्ष लगा है। उसमें वासनारूपी रस है। अज्ञानरूपी भूमि से वह उत्पन्न हुआ है। नदियाँ, समुद्र उसकी नाड़ी हैं। चन्द्रमा और तारे फूल हैं। वासनारूपी जल से वह बढ़ता है। वही अहंकाररूपी वृक्ष का बीज है। सुख-दुःखरूपी इसके फल हैं। आकाश इसकी डालें और पाताल जड़ है। तुम इस वृक्ष को ज्ञानरूपी अग्नि से जलाओ और अहंरूपी वृक्ष के बीज का नाश करो। हे विद्याधर ! एक खाई है, जिसके जन्ममरणरूपी दो किनारे हैं। उसमें अनात्मारूपी जल है। वासनारूपी तरंगें उठती हैं और विश्वरूपी बुलबुले उठते हैं और मिट भी जाते हैं। शरीररूपी झाग है और अहंकाररूपी वायु है। जब वायु हुई तब तरंग और बुल-बुले सब होते हैं और जब वायु मिट गई, तब केवल स्वच्छ निर्मलरूप ही भासित होता है।