भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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पृष्ठ 409

४०८ ❋ योगवाशिष्ठ ❋

सब ओर उसके श्रवण हैं। सब ओर उसके नेत्र हैं। आत्मतत्त्व में वही मनमें स्थित हो रहा है। सब इन्द्रियों और विषयों को वही प्रकाशित करता है। वह सब इन्द्रियों से रहित है और असक्त हुआ भी सबको धारण कर रहा है। वह निर्गुण है और इन्द्रियों के साथ मिलकर गुणों को भोगता है। वही सब प्राणियों के भीतर बाहर व्याप्त रहा है। सूक्ष्म है, इससे दुर्विज्ञेय है, और इन्द्रियों का विषय नहीं है। अज्ञानी का अज्ञान के कारण दूर है और आत्मत्व द्वारा ज्ञानी को ज्ञान के कारण निकट है। वह अनन्त, सर्वव्यापी केवल शान्तरूप है, जिसमें दूसरा कोई नहीं। घट, पट, दीवार, गाय, आँदा, नाग, नर सबमें वही तत्त्व भासित है। पर्वत, पृथ्वी, चन्द्र, सूर्य, देश, काल, वस्तु, सब ब्रह्म ही है, ब्रह्म से भिन्न नहीं।

हे विद्याधर! इस प्रकार इन्द्र को ज्ञान हुआ और वह जीवन्मुक्त हुआ। तब वह सब चेष्टा करता, परन्तु अन्तःकरण में नहीं बँधता। जब कुछ काल बीता, तब इन्द्र उस निर्वाणपद को प्राप्त हुआ, जिसमें आकाश भी स्थूल है। फिर उस इन्द्र का एक बड़ा शूरवीर पुत्र सब दैत्यों को जीतकर देवताओं और त्रिलोकी का राज्य करने लगा। फिर उसको भी ज्ञान उत्पन्न हुआ। सतशास्त्र और गुरु के वचनों से कुछ काल में वह भी निर्वाण को प्राप्त हुआ। तब उसका जो पुत्र था, वह राज्य करने लगा। इसी प्रकार कई इन्द्र राज्य करते और नाना प्रकार के व्यवहारों को देखते रहे। फिर उसके कुल में कोई पुत्र था, उसको यह हमारी सृष्टि भाषित हुई तो वह भी ब्रह्मध्यानी हुआ और इस त्रिलोकी का राज्य करने लगा। अब तक विश्व का इन्द्र वही है। हे विद्याधर! इस प्रकार विश्व की उत्पत्ति संकल्पमात्र है और सब मैंने तुझसे कही। पहले उसको त्रसरेणु में सृष्टि दिखी, फिर उस सृष्टि के एक कमल के तन्तु में दिखी। फिर उसमें कई वृत्तान्त, जो संकल्पमात्र थे, उसने देखे। फिर उस अणु में अनेक अवस्थाएँ देखीं। हे विद्याधर! पर वास्तव में यह कुछ हुई नहीं। जैसे आकाश में नीलिमा भाषित होती है, पर है नहीं वैसे ही यह विश्व है। आत्मा में विश्व का अत्यन्त अभाव