योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 408, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें🌸 निर्वाण प्रकरण 🌸 ४०७
वह उनमें गया और पृथ्वी, पहाड़, नदियाँ, चन्द्र, सूर्य, त्रिलोकी उनको वहाँ दिखाई देने लगी। उस जगत् का इन्द्र अपने को उनमें देखा कि दिव्य भोग और ऐश्वर्य से सम्पन्न मैं इन्द्र स्थित हूँ। वह इन्द्र कुछ काल के उपरान्त शरीर को त्यागकर निर्वाण को प्राप्त हुआ- जैसे तेल से रहित दीपक निर्वाण होता है। तब कुन्द नाम उसका पुत्र इन्द्र हुआ और राज्य करने लगा। फिर उसके एक पुत्र हुआ। तब कुन्द भी इन्द्र शरीर को त्यागकर परमपद को प्राप्त हुआ और उसका पुत्र राज्य करने लगा। फिर उसके भी एक पुत्र हुआ। इसी प्रकार सहस्र पुत्र होकर राज्य करते रहे। उन्हीं के कुल में यह हमारा इन्द्र राज्य करता है। इससे यह जगत् संकल्पमात्र है और उस अमरेणु से यह सृष्टि है। इसलिए इस जगत् को संकल्पमात्र जानकर इसकी आस्था त्यागो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे इन्द्रोपाख्याने अमरेणुजगत्-वर्णननाम शताधिकसप्तविंशतितमसर्गः ॥ १३७ ॥
भुशुण्डजी बोले, हे विद्याधर ! फिर उनके कुल में एक बड़ा श्रीमान् इन्द्र हुआ, जो त्रिलोकी का राज्य करता रहा और फिर निर्वाण को प्राप्त हुआ। उसके एक पुत्र था, जिसको बृहस्पतिजी के वचनों से ज्ञानरूप प्रतिभा उदय हुई। तब वह विदितवेद होकर स्थित हुआ। यथाप्राप्ति में इन्द्र होकर राज्य करने लगा और दैत्यों को जीता। एक समय वह किसी कार्य के लिए कमल के तन्तु में घुस गया तो वहाँ उसको नाना प्रकार का जगत् दिखने लगा और अपनी इन्द्र की प्रतिभा हुई। इससे उसे इच्छा हुई कि मैं ब्रह्मतत्त्व को पाऊँ और दृश्य पदार्थ की तरह उसे प्रत्यक्ष देखूँ। इसलिए वह एकान्त में बैठकर समाधि में स्थित हुआ। तब उसको भीतर-बाहर ब्रह्म का साक्षात्कार हुआ और प्रतिभा के उदय होने से यह निश्चय हुआ कि सब ब्रह्म ही है और वही पूजने योग्य है। सब उसी को पूजते भी हैं। केवल शुद्ध आत्मपद सब शब्द, रूप, अवलोक और नमस्कार से रहित है। सब ओर उसी के पाणिपाद हैं। सब सिर और मुख उसी के हैं।