योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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हे विद्याधर ! जो वायु हुई तो जल से भिन्न कुछ न हुआ और जो न हुई तो भी जल से भिन्न कुछ नहीं, जल ही है । वैसे ही अज्ञान के होने और निवृत्त होने पर भी आत्मपद ज्यों का त्यों है । परन्तु सम्यक्दर्शन से आत्मपद और अज्ञान से जगत् भासित होता है । अहं का होना ही अज्ञान है । जब अहं हुआ तब मम भी होता है । सो 'अहं' 'मम' नाम संसार का है । जब अहं-मम मिटता है, तब जगत् का अभाव होता है । अहं के होने दृश्य भासित होता है और दृश्य में अहं होता है । इसमें संवेदन को त्यागकर निर्वाणपद में प्राप्त हो । इतना कह भुशुण्डिजी ने मुझसे कहा कि हे वशिष्ठजी ! इस प्रकार जब मैंने विद्याधर को उपदेश किया तो वह समाधि में स्थित होकर निर्वाणपद को प्राप्त हुआ । जैसे दीपक बुझ जाता है, वैसे ही उसका चित्त क्षोभ से रहित शान्ति को प्राप्त हुआ । हे ब्राह्मण ! उसका हृदय शुद्ध था, इस कारण मेरे वचन शीघ्र ही उसके हृदय में प्रवेश कर गये । जब वह समाधि में स्थित हुआ तो मैंने उसको बारम्बार जगाया परन्तु वह न जागा—जैसे कोई जलता-जलता शीतल समुद्र में जाकर बैठे और उससे कहिये कि तू निकल तो वह नहीं निकलता; वैसे ही संसारताप से जलता हुआ जीव जब आत्मसमुद्र में गोता लगाता है, तब वह संसार के अज्ञानरूपी प्रवाह को नहीं देखता । हे वशिष्ठजी ! जिसका अन्तःकरण शुद्ध होता है, उसको थोड़े वचन भी बहुत हो लगते हैं । जैसे तेल की एक बूंद जल में बहुत फैल जाती है, वैसे ही जिसका अन्तःकरण शुद्ध होता है, उसको थोड़ा वचन भी बहुत होकर लगता है । पर जिसका अन्तःकरण मलिन होता है, उस पर वचन प्रभाव नहीं डालते । जैसे आरसी पर मोती नहीं ठहरता वैसे ही गुरुशास्त्र के वचन उसको नहीं लगते । जब विषयों से वैराग्य उपजे; तब जानिये कि हृदय शुद्ध हुआ ।
हे वशिष्ठजी ! जब मैंने विद्याधर को उपदेश किया, तब वह शीघ्र ही आत्मपद को प्राप्त हुआ; क्योंकि उसका चित्त निर्मल था । हे मुनीश्वर ! जो तुमने मुझसे पूछा था सो मैंने कहा कि उस