भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 412, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 412

# ❋ निर्वाण प्रकरण ❋ <span style="float:right;">४११</span>

विद्याधर को मैंने अज्ञान से रहित चिरकाल जीता देखा। इतना कह वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ऐसे कहकर काकभुशुण्डि चुप हो रहे और मैं नमस्कार करके आकाशमार्ग से अपने घर आया। हे राम ! मेरे और काकभुशुण्डि के इस संवाद को एकादश चौकड़ी युग बीतते हैं। हे राम ! यह कोई नियम नहीं है कि थोड़े काल में ज्ञान उपजे वा बहुत काल में। यह हृदय की शुद्धता की बात है। जिसका हृदय शुद्ध होता है, उसको गुरु और शास्त्रों का वचन शीघ्र ही लगता है—जैसे जल नीचे को स्वाभाविक जाता है। हे राम ! इतना उपदेश जो मैंने तुमको क्रम से किया है, उसका तात्पर्य यही है कि वासना को त्याग करो, सोचो कि न मैं हूँ और न कोई जगत् है—तब पीछे निर्विकल्प केवल आत्मपद रहेगा, जो सबका अपना रूप है और उसका साक्षात्कार तुमको होगा। जैसे मलिन दर्पण में मुख नहीं दीखता, वैसे ही आत्मरूपी दर्पण अहंशूपी मल से ढका है। जब इसका त्याग करोगे, तब आत्मपद की प्राप्ति होगी और जगत् भी अपना रूप भासित होगा। आत्मा से भिन्न कुछ नहीं है; क्योंकि सब केवल आत्मतत्त्वमात्र है। और जो कुछ भासित होता है, उसे मृगतृष्णा के जल सा और बन्ध्या के पुत्र सा जानो। यह जगत् आत्मा के प्रमाद से भासित होता है—जैसे आकाश में नीलिमा भासित होती है, पर है नहीं, वैसे ही जगत् प्रत्यक्ष भासित होता है और है नहीं। जैसे रस्सी में सर्प मिथ्या है, वैसे ही आत्मा में जगत् मिथ्या है। जब आत्मा का ज्ञान होगा, तब जगत् का अत्यन्त अभाव होगा और केवल आत्मत्वमात्र भासित होगा।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुण्डि विद्याधरोपाख्यान-समाप्तिर्नाम शताधिकनवत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ १३६ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! तुम अहंवेदना से रहित होओ। संसाररूपी वृक्ष का बीज अहं ही है। वासना से शुभ-अशुभरूप कर्मों का सुख-दुःख फल है, और वह वासना ही से प्रफुल्लित होता है। इससे अहंभाव को निवृत्त करो जब अहं फुरता है, तब आगे जगत् भासित