योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ४०३
नहीं परन्तु यह नामसंज्ञा हुई है। विष न जन्मता, न मरता है और जलन-स्वाँमी उसमें देख पड़ती है, वैसे ही आत्मा न जन्मता है, न मरता है, और गुणों के साथ मिलकर भिन्न अवस्थाओं को प्राप्त हुआ देख पड़ता है।
आत्मा जन्ममरण से रहित है, पर गुणों के साथ मिलने से जन्मता-मरता भासित होता है और अन्तःकरण, देह, इन्द्रियादिक भिन्न-भिन्न जान पड़ते हैं। हे साधो! यह जगत् भ्रम से प्रतीत होता है। जो ज्ञानवान् पुरुष हैं, वे इस जगत् को गाय के पैर के गढ़े की तरह अपने पुरुषार्थ से नाँघ जाते हैं, और जो अज्ञानी हैं, उनको अल्प भी समुद्र समान हो जाता है। इससे आत्मपद पाने का यत्न करो, जिसके जानने से संसारसमुद्र तुच्छ हो जायगा। वह आत्मतत्त्व सबमें अनुस्यूत और सबसे अतीत है। उसके जानने से अन्तःकरण शीतल हो जाता है और सब ताप नष्ट हो जाते हैं। हे साधो! फिर उसका त्याग करना अविद्या और बड़ी मूर्खता है। हे साधो! ये सब पदार्थ ब्रह्मस्वरूप ही हैं। जब ब्रह्मस्वरूप हुए तब मन, अहंकार, कलङ्क आदिक भी वही हैं—किसी से किसी को कुछ सुख-दुःख नहीं। हे विद्याधर! जब आत्मपद को जाना, तब अन्तःकरण आदि भी ब्रह्मस्वरूप भासित होंगे। जो संकल्प से भिन्न-भिन्न जाने जाते हैं, वे संकल्प के होते भी ब्रह्मस्वरूप भासित होंगे। इसलिए संकल्प हीन होकर स्थित हो, सोचो—न मैं हूँ, न यह जगत् है और न इदम् है। इन शब्दों और अर्थों से रहित होकर स्थित हो रहो, सब संशय मिट जावें।
हे विद्याधर! जब तू ऐसा निरहंकार और निःसंकल्प होगा, तब उत्थानकाल में भी बुद्धि, बोध, लज्जा, लक्ष्मी, स्मृति, यश, कीर्ति इत्यादिक जो शुभाशुभ अवस्था हैं, सब आत्मस्वरूप भासित होंगी और सबमें आत्मबुद्धि रहेगी। इनके प्राप्त होने पर भी केवल परमार्थ सत्ता से भिन्न न भासित होगा—जैसे अन्धकार में सर्प के पैर का चिह्न नहीं जान पड़ता क्योंकि वह है ही नहीं, वैसे ही तुमको सब अवस्थाएँ न भासित होंगी—सब आत्मा ही भासित होगा—