भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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पृष्ठ 403

४०२ ☸ योगवाशिष्ट ☸

बिना तो नहीं होते, वैसे ही कारणरूप ब्रह्म बिना जगत् नहीं है; परन्तु ब्रह्मसत्ता अकर्ता, अद्वैत और अच्युत है। इसी से कहा है कि ब्रह्म अकर्ता है और जगत् अकारणरूप है। जो जगत् अकारणरूप है तो वह न उपजता है और न नाश होता है—मरुस्थल के जल की तरह भ्रममात्र है। इसी से कहा है कि जगत् कुछ वस्तु नहीं, केवल अज, अच्युत और शान्तरूप आत्मतत्त्व ही अखण्डित स्थित है और शिला कोश की तरह अद्वैत चिन्मात्र है। जिसके हृदय में चिन्मात्र की भावना नहीं, उस मूर्ख को हम क्या कहें ! हे साधो ! वास्तव में परमार्थ दृष्टि से कुछ भी नहीं बना, पर जहाँ-जहाँ मन है, वहाँ-वहाँ अनेक जगत् हैं। तृण से सुमेरु तक सब जगत् में हैं। जो विचारकर देखिये तो सब वही ब्रह्मरूप है, और कुछ नहीं। जैसे सुवर्ण को जान लेने से भूषण भी सुवर्ण भासित होता है, वैसे ही केवल सत्ता समानपद एक अद्वैत है, भिन्न कुछ नहीं। और भिन्न-भिन्न संज्ञाएँ भी वही हैं।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे शताधिकपञ्चत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥१३५॥

भुशुण्डिजी बोले, हे विद्याधर ! जब आत्मपद प्राप्त होता है, तब ऐसी अवस्था होती है कि जो नग्न शरीर हो और उस पर बहुत शस्त्रों की वर्षा हो तो भी उसमे जीव दुःखी नहीं होता और सुन्दर अप्सरा कण्ठ से लगे तो हर्ष नहीं होता, अर्थात् दोनों ही में समदर्शी रहता है। हे विद्याधर ! तब तक आत्मपद का अभ्यास करे, जब तक संसार में सुपुप्ति की नाईं न हो जाय। अभ्यास ही से आत्मपद प्राप्त होगा। जब आत्मपद की प्राप्ति होगी, तब पाञ्चभौतिक शरीर को ताप या ज्वर स्पर्श न करेंगे, और यदि शरीर के हों भी, तो भी उनके अन्तः-करण में प्रवेश नहीं करते। वह केवल शान्तपद में स्थित रहता है—जैसे जल कमल को स्पर्श नहीं करता। हे देवपुत्र ! जब तक देहादि में अभ्यास है, तब तक आत्मा के प्रमाद से सुख-दुःख स्पर्श करते हैं। जब आत्मा का साक्षात्कार होता है, तब सब प्रपञ्च भी आत्मरूप हो जाते हैं। हे विद्याधर ! जैसे कोई पुरुष विष-पान करता है तो उसको जलन और खाँसी होती है—यह अवस्था विष की है—विष में भिन्न और कुछ