योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 419, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें४१८ ✴ योगवाशिष्ठ ✴
उपजा है और आप ही लीन हो जाता है । हे राम ! जिस प्रकार आत्मा में विराट् की उत्पत्ति हुई है, वैसे ही सब जीवों की हुई है । यह सब विराट्रूप है, परन्तु जो स्वरूप से उपजकर दृश्य में तद्रूप हुए हैं और जिनकी वास्तवस्वरूप भूल गया है, वे तुच्छरूप जीव हुए और जो स्वरूप में फुरकर स्वरूप में न गिरा और जिसे आगे अपना ही संकल्प-रूप विश्व देखकर प्रमाद न हुआ, उसका नाम विराट् आत्मा है । हे राम ! जीव चैतन्य और निराकाररूप है । उसको शरीर का संयोग कल्पना में हुआ है । यह जब अपने को दृश्य-संयुक्त देखता है, तब महाआपदा को प्राप्त होता है, और जब द्वैत से रहित निर्विकल्प होकर देखता है, तब शुद्ध चैतन्य आत्मपद को प्राप्त होता है । हे राम ! यह विराट् सबको उत्पन्न करता है । ऐसे कई विराट् आत्मपद से उदय हुए हैं; कई मिट गये हैं और कई आगे होंगे । जैसे समुद्र में कई तरङ्ग, बुलबुले उठते हैं और लीन होते हैं, वैसे ही आत्मरूपी समुद्र में कई विराट् उठते हैं; कई लीन होते हैं और कई उपजेंगे । ऐसा परमात्मा सबका अधिष्ठान है और सबमें भीतर-बाहर पूर्ण ज्ञानस्वरूप व्याप्त है । सोई तुम्हारा अपना रूप अनुभवरूप है । हे राम ! इस संवेदन को त्यागकर देखो, वही परमात्मस्वरूप है । यह जो कुछ तुमको भासित होता है, उसको विचारकर त्यागो । जब तुम इसका त्याग करोगे, तब तुम्हारा चिन्मात्र परम शुद्ध स्वरूप तुमको भासित होगा—उसके आगे चैतन्य ही आवरणरूप है । जैसे सूर्य के आगे बादलों का आवरण होता है, और जब तक बादल होते हैं, तब तक सूर्य का प्रकाश ज्यों का त्यों नहीं भासित होता, पर जब बादल दूर होते हैं, तब प्रकाश स्वच्छ दिखता है, वैसे ही जब वासना निवृत्त होवेगी, तब शुद्ध आत्मा ही प्रकाशमान होगा ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विराडात्मवर्णनं नाम शताधिकैकचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ १४१ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह परमात्मा पुरुष स्फुरण में जीवसंज्ञा को प्राप्त हुआ है । स्फुरण में भी वही है, पर अपने स्वरूप को नहीं