भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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पृष्ठ 418

❈ निर्वाण प्रकरण ❈ ४१७

निश्चित किया। नीति इसे कहते हैं कि यह पदार्थ ऐसे हो और इतने काल तक रहे। निदान यह रचना रची और जो-जो संकल्प करता गया सो सो देश, काल, पदार्थ, दिशा, ब्रह्माण्ड सब होते गये। ईश्वर, विराट्, आत्मा, परमेश्वर इत्यादि सब जीव के नाम हैं। पर जीव का वासनामय स्वरूप झूठ नहीं। वासना के शरीर ग्रहण करने से वासनारूप कहा है, पर उसका वास्तवरूप शुद्ध, निर्विकार और अद्वैत है और कभी स्वरूप में अन्य अवस्था को नहीं प्राप्त हुआ; सदा ज्ञानरूप, अद्वैत और परमशुद्ध है। उसको अपने चैतन्य स्वभाव से चैत्य का संयोग हुआ है। इसी से कहा कि उसका वपु वासनारूप है। उसी आदि-जीव में ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि देवता, दैत्य, आकाश, मध्यलोक, पाताल और त्रिलोकी उत्पन्न हुई है। जैसे दीपक से दीपक जलता है और जल में जल होता है, वैसे ही सब विराट्स्वरूप हैं। महाआकाश उस विराट् का उदर है; समुद्र रुधिर है; नदियाँ नाड़ी हैं और दिशा वपु है। उसके उदर में सुमेरु पर्वत सहित कई ब्रह्माण्ड समाये रहते हैं। पवन उसका सिर है। उच्छ्वास पवन प्राणवायु है; पृथ्वी मांस है; सुमेरु आदिक पर्वत हाथ हैं; तारे रोमावली हैं; सहस्र शीश नेत्र हैं। वह अनन्त और अनादि है। चन्द्रमा उसका कफ है, जिसमे अमृत स्रवता है और प्राणी उपजते हैं। सूर्य पित्त है, जो सबको उत्पन्न करनेवाला है और सब मन, सब कर्मों और सब शरीरों का आदि-बीज विराट् है। हे राम! जीव इस चित्त के सम्बन्ध से तुच्छ हुआ है, पर वास्तव में परमात्मस्वरूप है। जैसे महाकाश घट के संयोग से घटाकाश होता है, वैसे ही विराट् परमात्मा ने फुरने से सृष्टि रची है और उसमें अहं प्रत्यय किया है, इससे तुच्छ हुआ है। यह इसको मिथ्या भ्रम हुआ है। जैसे स्वप्न में कोई अपना मरना देखता है, वैसे ही वह अपने को दृश्य देखता है। लघुता भी आत्मा की अपेक्षा से है; दृश्य में विराट् है और आत्मा में इसका अनुभव है।

हे राम! इसी प्रकार उसने उपजकर सृष्टि रची है। जैसे एक विराट् पुरुष ने आदि में निश्चय किया है, वैसे ही अब तक है। यह आप ही