योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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चित्कला अज्ञानरूप फुरी, उसको देह का सम्बन्ध हुआ है। उसी का नाम जीव है। वह जीव न सूक्ष्म है, न स्थूल है, न शून्य है, न अशून्य है, न थोड़ा है, न बहुत है, केवल शुद्ध आत्मतत्त्वमात्र है। वह न अणु है, न स्थूल है, अनन्त चैतन्य आकाशरूप है। उसी को जीव कहते हैं। स्थूल से स्थूल और सूक्ष्म से सूक्ष्म वही है। अनुभव चैतन्य सर्वगत जीव है। उसमें वास्तव शब्द कोई नहीं। और जो कोई शब्द है सो प्रतियोगी में मिलकर हुआ है। जीव अद्वैत है। उसका प्रतियोगी कैसे हो? यह जीव का स्वरूप है। चैत्य के संयोग से जीव हुआ है। उसका अधिष्ठान चैतन्य आकाश, निर्विकल्प, चैत्य से रहित, शुद्ध, चैतन्य परमात्मतत्त्व है। उसमें जो संवित् फुरी है, उसी का नाम जीव है। वह सूक्ष्म से सूक्ष्म, स्थूल से स्थूल और सबका बीज है। उसी को विराट् कहते हैं। उनका शरीर मनोमय है। वह आदि परमात्मतत्त्व में फुरा है और अन्य अवस्था को नहीं प्राप्त हुआ, अर्थात् अस्वच्छता को नहीं प्राप्त हुआ। वह अपने को सबका आत्मा जानता है। इसका नाम विराट् है। उसका प्रथम शरीर मनोमात्र और शुद्ध प्रकाशरूप गगनरूपी मल से रहित अनन्त आत्मा है, वह मन, कर्मों और देहों का बीज है; सबमें व्याप्त रहा है और सब जीवों का अधिष्ठाता है। उसी ने संकल्प से ये जीव रचे हैं, और पञ्चज्ञान इन्द्रिय, अहंकार, मन और संकल्प, ये आठों आकार ग्रहण किये हैं। परमार्थरूप को छोड़ फुरने में जो आकार उत्पन्न हुए हैं, उनको ग्रहण करने का नाम पुर्यष्टका है। फिर इन इन्द्रियों के छिद्र रचे और स्थूल रूप रचकर उनमें आत्मा प्रतीत किया। जैसे जीव शयनकाल में जाग्रत् शरीर को त्यागकर स्वप्न-शरीर अङ्गीकार करता है, वैसे ही शुद्ध, चिन्मात्र, निर्विकार, अद्वैतस्वरूप को त्यागकर उसने वासनामय शरीर अङ्गीकार किया है। पर वास्तव स्वरूप का त्याग नहीं किया और स्वरूप से नहीं गिरा। शुद्ध निर्विकल्प भाव को त्यागकर विराट्-भाव ग्रहण किया है।
इसी प्रकार आगे उस पुरुष ने ज्ञान से चारों वेद रचे और नीति को