भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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पृष्ठ 416
  • निर्वाण प्रकरण * ४१५

उसको संकल्पसृष्टि बड़ी होकर भासित होती है । जैसे पहाड़ बड़ा भी होता है, परन्तु जिसकी दृष्टि से दूर है, उसको महालघु और तुच्छ सा लगता है और चींटी के निकट तुच्छ मृत्तिका का ढेला भी पहाड़ के समान है, वैसे ही ज्ञानी की दृष्टि में यही जगत् नहीं, इससे बड़ा जगत् भी तुच्छ लगता है । पर अज्ञानी को तुच्छ भी बड़ा लगता है ।

हे राम ! यह विश्व भ्रम से सिद्ध हुआ है । जैसे भ्रम से सीपी में रूपा और रस्सी में सर्प दिखता है, वैसे ही आत्मा के प्रमाद से यह विश्व भासित होता है, पर आत्मा से भिन्न नहीं है । जैसे निद्रादोष से जीव अपने अङ्ग भूल जाते हैं और जागने पर सब अङ्ग देख पड़ते हैं, वैसे ही अविद्यारूपी निद्रा में सोया हुआ जीव जब जागता है, तब उसे सब विश्व अपना रूप दिखाई देता है । जैसे स्वप्न से जागा हुआ पुरुष स्वप्न के विश्व को अलग ही देखता है, वैसे ही यह विश्व अपना रूप ही देख पड़ेगा । हे राम ! जब मनुष्य निद्रा में होता है, तब उसे शुभ-अशुभ विश्व में रागद्वेष कुछ नहीं होता, और जब जागता है तब इष्ट में राग और अनिष्ट में द्वेष होता है, इसी प्रकार जब तक विश्व में हेयोपादेय बुद्धि है, तब तक वह सर्वज्ञ हो तो भी मूर्ख है । हे राम ! जब जड़ हो जाय, तब कल्याण हो । जड़ होना यही है कि दृश्य से रहित आत्मा में स्थित हो । वह आत्मा चिन्मात्र है । जब तक आत्मा से भिन्न जो कुछ सत्य अथवा असत्य जानता है, तब तक स्वरूप की प्राप्ति नहीं होती । जब संवित् न फुरे, तब स्वरूप का साक्षात्कार हो । इससे वासना का त्याग करो । यह स्थावर-जङ्गम जगत् जो तुमको दिखता है सो सब ब्रह्मस्वरूप है । जब तुम ऐसे निश्चय करोगे, तब सब विवर्तों का अभाव हो जावेगा, और आत्मपद ही शेष रहेगा । राम ने पूछा, हे भगवन् ! यह जीव जो आपने कहा, सो जीव का स्वरूप क्या है ? वह आकार को कैसे ग्रहण करता है ? उसका अधिष्ठान परमात्मा कैसे है ? उसके रहने का स्थान कौन है ? कहिये ।

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह जीव शुद्ध परमात्मतत्त्व, निर्विकल्प, चिन्मात्र पद है, उसमें चैतन्योन्मुखत्व हुआ, अर्थात् 'मैं हूँ' ऐसे जो