योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें- निर्वाण प्रकरण * ४१६
जानता, इसी से दुःख पाता है। जैसे पवन चलता है तो भी वही है और जब ठहरता है तो भी वही है—दोनों में तुल्य है। वैसे ही आत्मा सर्वदा एकरस है, कभी परिणाम या विकार को नहीं प्राप्त हुआ। जीव प्रमाद से दृश्य की कल्पना करता है और अपने को दृश्य जानता है, इसी से दुःख पाता है। पर जो इसको अपना स्वरूप स्मरण रहे तो दृश्य में भी अपना रूप भासित हो, और जो निःसंकल्प हो तो भी विश्व अपना रूप भासित हो। विश्व भी इसी का रूप है, परन्तु अविचार से भिन्न-भिन्न भासित होता है। जैसे स्वप्न का विश्व स्वप्नवाले का रूप है, परन्तु निद्रादोष से वह नहीं जानता और जब जागता है तब जानता है कि वह मैं ही था, वैसे ही यह प्रपञ्च सब तुम्हारा स्वरूप है। तुम अपने स्वरूप में निरहंकार स्थित होकर देखो तो कुछ नहीं बना। जो आत्मा से भिन्न तुम कुछ बनोगे तो प्रपञ्च विश्व भासित होगा और जो आत्मस्वरूप में स्थित हो तो अपना ही रूप भासित होगा और प्रपञ्च का अभाव हो जावेगा। हे राम! शून्य-अशून्य, जड़-चेतन, किंचन निष्किंचन, सत्य-असत्य सब आत्मा ही पूर्ण है, तब निषेध किसका करिये? हे राम! वह ऐसा अनुभवरूप है, जिसमें सब पदार्थ सिद्ध होते हैं; पर ऐसे आत्मा को मूर्ख लोग नहीं जानते। जैसे जन्म का अन्धा मार्ग को नहीं जानता, वैसे ही महाअन्ध अज्ञानी जाग्रती-ज्योति आत्मा को नहीं जानते। जैसे उलूकादिक उदय हुए सूर्य को नहीं जानते, वैसे ही वासना से घिरे हुए अपने को नहीं जान सकते। जैसे जाल में पक्षी फँसा होता है, वैसे ही ये जीव माया में फँसे हुए हैं। इसी का नाम बन्धन है। वासना के वियोग का नाम मुक्ति है।
हे राम! विषमता से जीव संज्ञा हुई है। जब सम हुआ तब ब्रह्म है। वह ब्रह्म अहंकार को त्यागकर होता है जैसे खप्पर के संयोग से घटाकाश कहलाता है, और जब खप्पर टूट जाता है, तब महाकाश हो जाता है, वैसे ही जब अहंकार नष्ट होता है, तब आत्मस्वरूप हो जाता है। हे राम! अज्ञान से जीव