योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६८ * योगवाशिष्ठ *
हो जायगा। संसाररूपी वृक्ष के सुमेरु आदिक पर्वत पत्ते हैं, तारागण कली और फूल हैं; मानों समुद्र रस हैं; जन्म-मरण बेल है, सुख-दुःख फल हैं और वह आकाश, दिशा, पाताल को धारण किये स्थित है। अहंकाररूपी वृक्ष पृथ्वी पर उत्पन्न हुआ है; अहंकार ही उसका बीज है। यह वृक्ष मिथ्या भ्रममात्र, असत्य और सत्य की नाईं स्थित है। इससे अहंकाररूप बीज का नाश करो और निरहंकाररूपी अग्नि में इसको जलाओ, तब इसका अत्यन्त अभाव हो जावेगा। यह भ्रम के कारण भय देता है, जैसे रज्जू में सर्पभ्रम डराता है। इससे निरहंकाररूपी अग्नि से उसका नाश करो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शताधिकद्वात्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ १३२ ॥
भुशुण्डिजी बोले, हे विद्याधर ! यह ज्ञान जैसे उत्पन्न होता है सो सुनो। ब्रह्मविद्या-शास्त्र के सुनने और आत्मविचार में यह उपजता है। उस आत्मज्ञानरूपी अग्नि में संसाररूपी वृक्ष को जलाओ। यह आगे भी नहीं था, असत्त्वहीन ही उदय हुआ है और मन के संकल्प में विद्यमान की नाईं स्थित है। जैसे पत्थर में शिल्पी कल्पना करता है कि इतनी पुतलियाँ निकलेंगी, सो हुई कुछ नहीं, वैसे ही मनरूपी शिल्पी यह विश्वरूपी पुतलियाँ कल्पना में लाता है। जब मन का नाश करोगे, तब संसारभ्रम मिट जावेगा; आत्मविचार करके परमपद को प्राप्त होगे और अपना रूप परमात्मारूप प्रत्यक्ष भासित होगा। इसमें अहंता को त्याग कर अपने स्वरूप में स्थित होओ। हे विद्याधर ! यह संसाररूपी वृक्ष अहंतारूपी बीज से उपजता है। उसको जब ज्ञानरूपी अग्नि से जलाओगे, तब फिर यह जगत् न उपजेगा। यदि इसको विचार करके देखिये, तो अहं-त्व नहीं रहता।
हे विद्याधर ! यह अहं-त्व मिथ्या है—इसके अभाव की भावना करो यही उत्तम ज्ञान है। हे साधो ! जब गुरु के वचन सुनकर उनके अनुसार पुरुषार्थ करे, तब परमपद को प्राप्त होता है और जय होती है। हे विद्यारूपी कन्दरा को धारण करनेवाले, पर्वत, और विद्यारूपी पृथ्वी को धारण करनेवाले शेषनाग ! यह संसार एक आडम्बर है। इसके