योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
४१४ ❋ योगवाशिष्ठ ❋
वासना के अनुसार सृष्टि भासित होता है। सब अपनी सृष्टि लेकर इस प्रकार उड़ते हैं, जैसे वायु गन्ध को ले जाती है। वही मुझको सूक्ष्म-दृष्टि से उड़ते भासित होते हैं। हे राम! स्थूलदृष्टि में लिङ्गशरीर नहीं भासित होता; सूक्ष्मदृष्टि में दीखता है। जिस पुरुष की सूक्ष्मदृष्टि में लिङ्गशरीर देखने की शक्ति है और ज्ञान से रहित है, वह भी मेरे मत में मूर्ख और पशु है।
हे राम! जब मनुष्य वासना का त्याग करता है, अर्थात् इस अहंकार को कि मैं हूँ, त्याग करता है तो आगे विश्व नहीं दिखाई देता, केवल निर्विकल्प ब्रह्म भासित होता है। उसके प्राण नहीं उड़ते, वहीं लीन हो जाते हैं; क्योंकि उसका चित्त अचित्त हो जाता है। जब तक अहंकार का संयोग है, तब तक विश्व भी चित्त में स्थित है। जैसे बीज में वृक्ष और तिलों में तेल होता है, वैसे ही उसके हृदय में विश्व स्थित है। जैसे मृत्तिका में बड़े छोटे बर्तन, लोहे में सुई और खड्ग और बीज में वृक्षभाव स्थित है, चैतन्य अथवा जड़ हो, वैसे ही यह संकल्पकल्पना में भेद है, स्वरूप से कुछ नहीं और वैसे ही यह जगत् भी है। हे राम! विश्व संकल्पमात्र है; क्योंकि दूसरी अवस्था में इसका नाश हो जाता है। यह जाग्रत् अवस्था जो तुमको भासित होती है, मिथ्या है। जब स्वप्न देख पड़ता है, तब जाग्रत् नहीं रहती। जब जाग्रत् आती है तब स्वप्न नष्ट हो जाता है। जब मृत्यु आती है, तब सृष्टि का अत्यन्त अभाव हो जाता है और देश, काल, पदार्थसहित वासनानुसार और सृष्टि भासित होता है। हे राम! यह विश्व ऐसा है, जैसे स्वप्ननगर। जैसे संकल्पपुर होते हैं, वैसे ही ये सब संकल्प उड़ते फिरते हैं। कई सृष्टि परस्पर मिलती हैं, कई नहीं मिलतीं, परन्तु सब संकल्परूप हैं। भ्रम में और का और भासित होता है। जैसे कोई पुरुष बड़ा होता है और कोई छोटा तो, छोटे को बड़ा भासित होता है। जैसे हाथी के निकट और पशु तुच्छ लगते हैं और चींटी के निकट और सब बड़े लगते हैं, वैसे ही जो ज्ञानवान् पुरुष है, उसको बड़े पदार्थ और देश-काल-संयुक्त विश्व तुच्छ भासित होता है और वह उन्हें असत्य जानता है। पर जो अज्ञानी है,
- निर्वाण प्रकरण * ४१५
उसको संकल्पसृष्टि बड़ी होकर भासित होती है । जैसे पहाड़ बड़ा भी होता है, परन्तु जिसकी दृष्टि से दूर है, उसको महालघु और तुच्छ सा लगता है और चींटी के निकट तुच्छ मृत्तिका का ढेला भी पहाड़ के समान है, वैसे ही ज्ञानी की दृष्टि में यही जगत् नहीं, इससे बड़ा जगत् भी तुच्छ लगता है । पर अज्ञानी को तुच्छ भी बड़ा लगता है ।
हे राम ! यह विश्व भ्रम से सिद्ध हुआ है । जैसे भ्रम से सीपी में रूपा और रस्सी में सर्प दिखता है, वैसे ही आत्मा के प्रमाद से यह विश्व भासित होता है, पर आत्मा से भिन्न नहीं है । जैसे निद्रादोष से जीव अपने अङ्ग भूल जाते हैं और जागने पर सब अङ्ग देख पड़ते हैं, वैसे ही अविद्यारूपी निद्रा में सोया हुआ जीव जब जागता है, तब उसे सब विश्व अपना रूप दिखाई देता है । जैसे स्वप्न से जागा हुआ पुरुष स्वप्न के विश्व को अलग ही देखता है, वैसे ही यह विश्व अपना रूप ही देख पड़ेगा । हे राम ! जब मनुष्य निद्रा में होता है, तब उसे शुभ-अशुभ विश्व में रागद्वेष कुछ नहीं होता, और जब जागता है तब इष्ट में राग और अनिष्ट में द्वेष होता है, इसी प्रकार जब तक विश्व में हेयोपादेय बुद्धि है, तब तक वह सर्वज्ञ हो तो भी मूर्ख है । हे राम ! जब जड़ हो जाय, तब कल्याण हो । जड़ होना यही है कि दृश्य से रहित आत्मा में स्थित हो । वह आत्मा चिन्मात्र है । जब तक आत्मा से भिन्न जो कुछ सत्य अथवा असत्य जानता है, तब तक स्वरूप की प्राप्ति नहीं होती । जब संवित् न फुरे, तब स्वरूप का साक्षात्कार हो । इससे वासना का त्याग करो । यह स्थावर-जङ्गम जगत् जो तुमको दिखता है सो सब ब्रह्मस्वरूप है । जब तुम ऐसे निश्चय करोगे, तब सब विवर्तों का अभाव हो जावेगा, और आत्मपद ही शेष रहेगा । राम ने पूछा, हे भगवन् ! यह जीव जो आपने कहा, सो जीव का स्वरूप क्या है ? वह आकार को कैसे ग्रहण करता है ? उसका अधिष्ठान परमात्मा कैसे है ? उसके रहने का स्थान कौन है ? कहिये ।
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह जीव शुद्ध परमात्मतत्त्व, निर्विकल्प, चिन्मात्र पद है, उसमें चैतन्योन्मुखत्व हुआ, अर्थात् 'मैं हूँ' ऐसे जो
४१६ ✻ योगवाशिष्ठ ✻
चित्कला अज्ञानरूप फुरी, उसको देह का सम्बन्ध हुआ है। उसी का नाम जीव है। वह जीव न सूक्ष्म है, न स्थूल है, न शून्य है, न अशून्य है, न थोड़ा है, न बहुत है, केवल शुद्ध आत्मतत्त्वमात्र है। वह न अणु है, न स्थूल है, अनन्त चैतन्य आकाशरूप है। उसी को जीव कहते हैं। स्थूल से स्थूल और सूक्ष्म से सूक्ष्म वही है। अनुभव चैतन्य सर्वगत जीव है। उसमें वास्तव शब्द कोई नहीं। और जो कोई शब्द है सो प्रतियोगी में मिलकर हुआ है। जीव अद्वैत है। उसका प्रतियोगी कैसे हो? यह जीव का स्वरूप है। चैत्य के संयोग से जीव हुआ है। उसका अधिष्ठान चैतन्य आकाश, निर्विकल्प, चैत्य से रहित, शुद्ध, चैतन्य परमात्मतत्त्व है। उसमें जो संवित् फुरी है, उसी का नाम जीव है। वह सूक्ष्म से सूक्ष्म, स्थूल से स्थूल और सबका बीज है। उसी को विराट् कहते हैं। उनका शरीर मनोमय है। वह आदि परमात्मतत्त्व में फुरा है और अन्य अवस्था को नहीं प्राप्त हुआ, अर्थात् अस्वच्छता को नहीं प्राप्त हुआ। वह अपने को सबका आत्मा जानता है। इसका नाम विराट् है। उसका प्रथम शरीर मनोमात्र और शुद्ध प्रकाशरूप गगनरूपी मल से रहित अनन्त आत्मा है, वह मन, कर्मों और देहों का बीज है; सबमें व्याप्त रहा है और सब जीवों का अधिष्ठाता है। उसी ने संकल्प से ये जीव रचे हैं, और पञ्चज्ञान इन्द्रिय, अहंकार, मन और संकल्प, ये आठों आकार ग्रहण किये हैं। परमार्थरूप को छोड़ फुरने में जो आकार उत्पन्न हुए हैं, उनको ग्रहण करने का नाम पुर्यष्टका है। फिर इन इन्द्रियों के छिद्र रचे और स्थूल रूप रचकर उनमें आत्मा प्रतीत किया। जैसे जीव शयनकाल में जाग्रत् शरीर को त्यागकर स्वप्न-शरीर अङ्गीकार करता है, वैसे ही शुद्ध, चिन्मात्र, निर्विकार, अद्वैतस्वरूप को त्यागकर उसने वासनामय शरीर अङ्गीकार किया है। पर वास्तव स्वरूप का त्याग नहीं किया और स्वरूप से नहीं गिरा। शुद्ध निर्विकल्प भाव को त्यागकर विराट्-भाव ग्रहण किया है।
इसी प्रकार आगे उस पुरुष ने ज्ञान से चारों वेद रचे और नीति को
❈ निर्वाण प्रकरण ❈ ४१७
निश्चित किया। नीति इसे कहते हैं कि यह पदार्थ ऐसे हो और इतने काल तक रहे। निदान यह रचना रची और जो-जो संकल्प करता गया सो सो देश, काल, पदार्थ, दिशा, ब्रह्माण्ड सब होते गये। ईश्वर, विराट्, आत्मा, परमेश्वर इत्यादि सब जीव के नाम हैं। पर जीव का वासनामय स्वरूप झूठ नहीं। वासना के शरीर ग्रहण करने से वासनारूप कहा है, पर उसका वास्तवरूप शुद्ध, निर्विकार और अद्वैत है और कभी स्वरूप में अन्य अवस्था को नहीं प्राप्त हुआ; सदा ज्ञानरूप, अद्वैत और परमशुद्ध है। उसको अपने चैतन्य स्वभाव से चैत्य का संयोग हुआ है। इसी से कहा कि उसका वपु वासनारूप है। उसी आदि-जीव में ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि देवता, दैत्य, आकाश, मध्यलोक, पाताल और त्रिलोकी उत्पन्न हुई है। जैसे दीपक से दीपक जलता है और जल में जल होता है, वैसे ही सब विराट्स्वरूप हैं। महाआकाश उस विराट् का उदर है; समुद्र रुधिर है; नदियाँ नाड़ी हैं और दिशा वपु है। उसके उदर में सुमेरु पर्वत सहित कई ब्रह्माण्ड समाये रहते हैं। पवन उसका सिर है। उच्छ्वास पवन प्राणवायु है; पृथ्वी मांस है; सुमेरु आदिक पर्वत हाथ हैं; तारे रोमावली हैं; सहस्र शीश नेत्र हैं। वह अनन्त और अनादि है। चन्द्रमा उसका कफ है, जिसमे अमृत स्रवता है और प्राणी उपजते हैं। सूर्य पित्त है, जो सबको उत्पन्न करनेवाला है और सब मन, सब कर्मों और सब शरीरों का आदि-बीज विराट् है। हे राम! जीव इस चित्त के सम्बन्ध से तुच्छ हुआ है, पर वास्तव में परमात्मस्वरूप है। जैसे महाकाश घट के संयोग से घटाकाश होता है, वैसे ही विराट् परमात्मा ने फुरने से सृष्टि रची है और उसमें अहं प्रत्यय किया है, इससे तुच्छ हुआ है। यह इसको मिथ्या भ्रम हुआ है। जैसे स्वप्न में कोई अपना मरना देखता है, वैसे ही वह अपने को दृश्य देखता है। लघुता भी आत्मा की अपेक्षा से है; दृश्य में विराट् है और आत्मा में इसका अनुभव है।
हे राम! इसी प्रकार उसने उपजकर सृष्टि रची है। जैसे एक विराट् पुरुष ने आदि में निश्चय किया है, वैसे ही अब तक है। यह आप ही
४१८ ✴ योगवाशिष्ठ ✴
उपजा है और आप ही लीन हो जाता है । हे राम ! जिस प्रकार आत्मा में विराट् की उत्पत्ति हुई है, वैसे ही सब जीवों की हुई है । यह सब विराट्रूप है, परन्तु जो स्वरूप से उपजकर दृश्य में तद्रूप हुए हैं और जिनकी वास्तवस्वरूप भूल गया है, वे तुच्छरूप जीव हुए और जो स्वरूप में फुरकर स्वरूप में न गिरा और जिसे आगे अपना ही संकल्प-रूप विश्व देखकर प्रमाद न हुआ, उसका नाम विराट् आत्मा है । हे राम ! जीव चैतन्य और निराकाररूप है । उसको शरीर का संयोग कल्पना में हुआ है । यह जब अपने को दृश्य-संयुक्त देखता है, तब महाआपदा को प्राप्त होता है, और जब द्वैत से रहित निर्विकल्प होकर देखता है, तब शुद्ध चैतन्य आत्मपद को प्राप्त होता है । हे राम ! यह विराट् सबको उत्पन्न करता है । ऐसे कई विराट् आत्मपद से उदय हुए हैं; कई मिट गये हैं और कई आगे होंगे । जैसे समुद्र में कई तरङ्ग, बुलबुले उठते हैं और लीन होते हैं, वैसे ही आत्मरूपी समुद्र में कई विराट् उठते हैं; कई लीन होते हैं और कई उपजेंगे । ऐसा परमात्मा सबका अधिष्ठान है और सबमें भीतर-बाहर पूर्ण ज्ञानस्वरूप व्याप्त है । सोई तुम्हारा अपना रूप अनुभवरूप है । हे राम ! इस संवेदन को त्यागकर देखो, वही परमात्मस्वरूप है । यह जो कुछ तुमको भासित होता है, उसको विचारकर त्यागो । जब तुम इसका त्याग करोगे, तब तुम्हारा चिन्मात्र परम शुद्ध स्वरूप तुमको भासित होगा—उसके आगे चैतन्य ही आवरणरूप है । जैसे सूर्य के आगे बादलों का आवरण होता है, और जब तक बादल होते हैं, तब तक सूर्य का प्रकाश ज्यों का त्यों नहीं भासित होता, पर जब बादल दूर होते हैं, तब प्रकाश स्वच्छ दिखता है, वैसे ही जब वासना निवृत्त होवेगी, तब शुद्ध आत्मा ही प्रकाशमान होगा ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विराडात्मवर्णनं नाम शताधिकैकचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ १४१ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह परमात्मा पुरुष स्फुरण में जीवसंज्ञा को प्राप्त हुआ है । स्फुरण में भी वही है, पर अपने स्वरूप को नहीं
- निर्वाण प्रकरण * ४१६
जानता, इसी से दुःख पाता है। जैसे पवन चलता है तो भी वही है और जब ठहरता है तो भी वही है—दोनों में तुल्य है। वैसे ही आत्मा सर्वदा एकरस है, कभी परिणाम या विकार को नहीं प्राप्त हुआ। जीव प्रमाद से दृश्य की कल्पना करता है और अपने को दृश्य जानता है, इसी से दुःख पाता है। पर जो इसको अपना स्वरूप स्मरण रहे तो दृश्य में भी अपना रूप भासित हो, और जो निःसंकल्प हो तो भी विश्व अपना रूप भासित हो। विश्व भी इसी का रूप है, परन्तु अविचार से भिन्न-भिन्न भासित होता है। जैसे स्वप्न का विश्व स्वप्नवाले का रूप है, परन्तु निद्रादोष से वह नहीं जानता और जब जागता है तब जानता है कि वह मैं ही था, वैसे ही यह प्रपञ्च सब तुम्हारा स्वरूप है। तुम अपने स्वरूप में निरहंकार स्थित होकर देखो तो कुछ नहीं बना। जो आत्मा से भिन्न तुम कुछ बनोगे तो प्रपञ्च विश्व भासित होगा और जो आत्मस्वरूप में स्थित हो तो अपना ही रूप भासित होगा और प्रपञ्च का अभाव हो जावेगा। हे राम! शून्य-अशून्य, जड़-चेतन, किंचन निष्किंचन, सत्य-असत्य सब आत्मा ही पूर्ण है, तब निषेध किसका करिये? हे राम! वह ऐसा अनुभवरूप है, जिसमें सब पदार्थ सिद्ध होते हैं; पर ऐसे आत्मा को मूर्ख लोग नहीं जानते। जैसे जन्म का अन्धा मार्ग को नहीं जानता, वैसे ही महाअन्ध अज्ञानी जाग्रती-ज्योति आत्मा को नहीं जानते। जैसे उलूकादिक उदय हुए सूर्य को नहीं जानते, वैसे ही वासना से घिरे हुए अपने को नहीं जान सकते। जैसे जाल में पक्षी फँसा होता है, वैसे ही ये जीव माया में फँसे हुए हैं। इसी का नाम बन्धन है। वासना के वियोग का नाम मुक्ति है।
हे राम! विषमता से जीव संज्ञा हुई है। जब सम हुआ तब ब्रह्म है। वह ब्रह्म अहंकार को त्यागकर होता है जैसे खप्पर के संयोग से घटाकाश कहलाता है, और जब खप्पर टूट जाता है, तब महाकाश हो जाता है, वैसे ही जब अहंकार नष्ट होता है, तब आत्मस्वरूप हो जाता है। हे राम! अज्ञान से जीव
४२० * योगवाशिष्ठ *
एकदेशी हुआ है। जब परिच्छिन्नता का वियोग हो, तब आत्मस्वरूप होता है। हे राम ! अपने वास्तव निर्गुणस्वरूप में गुणों का संयोग उपाधि से भानित होता है, वही अनर्थरूप है। जब निर्गुण और सगुण की गाँठ छूटेगी, तब अपना केवल अद्वैततत्त्व आप भानित होगा। वह अनामय और दुःख से रहित है, सत् असत् से परे ज्ञानरूप और आदि-अन्त से रहित है। उसके पाने से फिर कुछ पाना शेष नहीं रहता और उसको जानने से फिर कुछ जानना नहीं रह जाता। ऐसा जो उत्तम पद है, उसको आत्मतत्त्व में प्राप्त होगे। हे राम ! यह जो ज्ञान तुमसे कहा है, उसका आश्रय लेकर तुम ज्ञानवान् होना; ज्ञानबन्ध न होना। ज्ञानबन्ध से तो अज्ञानी भला है; क्योंकि अज्ञानी भी साधुओं के संग और सत्शास्त्रों को सुनने से ज्ञानवान् होता है; पर ज्ञानबन्ध मुक्त नहीं होता। जैसे रोगी कहे कि मुझको कोई रोग नहीं है, मैं नीरोग हूँ, तो वह वैद्य की औषध भी नहीं खाता क्योंकि वह अपने को नीरोग जानता है; वैसे ही जो ज्ञानबन्ध है वह सन्तों का संग और सत्शास्त्रों का श्रवण भी नहीं करता, इससे वह अन्धतम को प्राप्त होता है।
राम ने पूछा, हे भगवन् ! ज्ञान और ज्ञानबन्ध का लक्षण क्या है और ज्ञानबन्ध का फल क्या है, सो कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जिस पुरुष ने आत्मा के विशेषण शास्त्रों में श्रवण किये हैं कि आत्मा नित्य शुद्ध, ज्ञानस्वरूप और तीनों शरीरों से भिन्न है, और ऐसे सुनकर अपने को वही मानता है, पर विषयों को भोगने की सदा तृष्णा रहता है कि किसी प्रकार इन्द्रियों के विषय मुझे प्राप्त हों, ऐसा पुरुष ज्ञानबन्ध है। वह बोधशिल्पी है, जो कर्मफल के विचार से रहित है अर्थात् भला-बुरा विचार नहीं करता और उन्हें करता है। और जो मुख से शुभ-अशुभ निरूपण करता है, वह शास्त्रशिल्पी है और फल के लिए कर्म करता है। कोई ऐसा है कि अपने को शास्त्रोक्त उत्तम मानता है; शास्त्रों के बहुत प्रकार से अर्थ भी कहता है, पढ़ता और पढ़ाता भी है, पर विषयों में बँधा हुआ है और सदा विषयों का चिन्तन करता है-
☸ निर्वाण प्रकरण ☸
४२१
ऐसा पुरुष ज्ञानबन्ध है। इसी कारण वह अर्थशिल्पी भी कहलाता है अर्थात् चितेरा करने को समर्थ है और धारण करने को समर्थ नहीं। हे राम ! एक प्रवृत्तिमार्ग है और दूसरा निवृत्तिमार्ग है। प्रवृत्ति संसारमार्ग है और निवृत्ति आत्मज्ञानमार्ग है। जिस पुरुष ने निवृत्तिमार्ग ग्रहण किया है, पर प्रवृत्तिमार्ग में अर्थात् बहिर्मुख विषयों की ओर प्रवृत्त होता है; इन्द्रियों के विषयों की चाह करता और विषयों से उपरत नहीं होता एवम् उनसे संतुष्ट होकर स्वरूप का अभ्यास नहीं करता, वह ज्ञानबन्ध कहलाता है।
हे राम ! जो पुरुष श्रुति के कहे शुभकर्म फल की कामना हृदय में रखता है, वह पुरुष ज्ञान के निकटवर्ती है, तो भी ज्ञानबन्ध है। जिसको आत्मा में प्रीति भी है, पर जो विषय का चिन्तन करता है और अपने को उत्तम मानता है, वह ज्ञानबन्ध कहलाता है। और जो आत्मतत्त्व का यथार्थ निरूपण करता है और स्थित नहीं है, वह ज्ञान-आभास है और उसको ज्ञान का फल नहीं मिलता। जिस पुरुष ने सिद्धि और ऐश्वर्य पाया है और उससे अपने को बड़ा जानता है, पर आत्मज्ञान से रहित है, वह ज्ञानबन्ध कहलाता है। हे राम ! निदि-ध्यास से ज्ञान की प्राप्ति होती है और उससे शान्ति का प्रकाश होता है। जब तक शान्ति नहीं प्राप्ति होगी, तब तक अपने को बड़ा ज्ञानी न माने। हे राम ! मनुष्य ज्ञान से बड़ा होता है। जब तक ज्ञान न उपजे तब तक आत्मपरायण हो; अभ्यास और यत्न करे; शुभ व्यवहार में प्राणों की रक्षा के निमित्त उपजीविका उत्पन्न करे और ब्रह्मजिज्ञासा के लिए प्राणों की धारणा करे। ब्रह्मजिज्ञासा दुःखरूप संसार-सागर से मुक्त होने के लिए है। फिर संसारी न हो और आत्म-परायण हो। जब आत्मपरायण होगे, तब सब दुःख मिट जावेंगे। जैसे सूर्य के उदय होने पर अन्धकार नष्ट हो जाता है, वैसे ही आत्मपद के प्राप्त होने पर सब दुःख नष्ट हो जाते हैं। उस पद के प्राप्त होने का उपाय यह है कि सत्शास्त्रों में जो विशेषण सुने हों उसको समझकर बारम्बार अभ्यास करे; दृश्य से उपरत हो और उनको
४२२ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
मिथ्या जानकर विरक्त बने। इसी से आत्मपद की प्राप्ति होती है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ज्ञानबन्धयोगो नाम शताधिकद्विचत्वारिंशत्तमःसर्गः ॥ १४२ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जिज्ञासु होकर ज्ञाननिष्ठ होना और जो कुछ गुरुशास्त्रों में आत्मविशेषण सुने हैं उनमें अहं प्रत्यय करके स्थित होना, इसी का नाम ज्ञाननिष्ठा है। जीव इस ज्ञाननिष्ठा से परम उच्च पद को प्राप्त होता है, जो सबका अधिष्ठान है। जब उसमें स्थित हुआ, तब कर्मों के फल का ज्ञान नहीं रहता; क्योंकि शुभकर्मों के फल में राग नहीं रहता और अशुभ कर्मों के फल में द्वेष नहीं होता। ऐसा पुरुष ज्ञानी कहलाता है। वह शान्त-चित्त रहता है, अकृत्रिम शान्ति को प्राप्त होता है, किसी विषय के सम्बन्ध में नहीं फँसता। उसकी वासना की गाँठ टूट जाती है। हे राम ! बोध वही है जिसको पाने से फिर जन्म न हो, और जो जन्ममरण से रहित हो उसी को ज्ञानी कहते हैं। जब संसार से विमुख हो और संसार की सत्यता न भासित हो, तब जानिये कि फिर जन्म न पावेगा; क्योंकि उसकी संसार की वासना नष्ट हो गई है। हे राम ! जिससे ज्ञानी की वासना नष्ट होती है, वह भी सुनो। वह इस संसार का कारण नहीं देखता। जो पदार्थ कारण से उत्पन्न नहीं हुआ, वह सत्य नहीं होता; इससे संसार मिथ्या है। जैसे रस्सी में सर्प भासित होता है तो उसका कारण कोई नहीं, वह भ्रम से सिद्ध हुआ है, वैसे ही यह विश्व कारण के बिना दिखता है, इससे मिथ्या है। जो मिथ्या है तो उसकी वासना कैसे हो ? हे राम ! जो प्रवाहपतित काय प्राप्त हो, उसमें ज्ञानी विचरता है और संकल्प से रहित होकर अपना अभिमान कुछ नहीं करता कि इस प्रकार हो और इस प्रकार न हो। वह हृदय से आकाश की तरह संसार से न्यारा रहता है और वासना से शून्य होता है। ऐसा पुरुष पण्डित कहलाता है।
हे राम ! यह जीव परमात्मारूप है। जब अचेतन अर्थात् संसार की वासना से रहित हो, तब आत्मपद को प्राप्त हो। जैसे आम का
ॐ निर्वाण प्रकरण ॐ ४२३
वृक्ष फल से रहित होने पर भी उसका नाम आम है, परन्तु निष्फल है, वैसे ही यह जीव आत्मस्वरूप है, परन्तु चित्त के सम्बन्ध से इसका नाम जीव है। जब चित्त को त्याग करे, तब आत्मा हो। जैसे आम के पेड़ में फल लगने से वह शोभित होता है और सफल कहलाता है। वैसे ही जब जीव आत्मपद को प्राप्त होता है, तब महाशोभा से विराजता है। हे राम ! ज्ञानवान् पुरुष कर्म के फल की स्तुति नहीं करता अर्थात् इन्द्रियों के इष्ट विषय की चाह नहीं करता, जैसे जिस पुरुष ने अमृत-पान किया हो वह मद्यपान करने की इच्छा नहीं करता, वैसे ही जिसको आत्मसुख प्राप्त होता है, वह विषयों के सुख की इच्छा नहीं करता। जो किसी पदार्थ को पाकर सुख मानते हैं, वे मूढ़ हैं। जैसे कोई पुरुष कहे कि बन्ध्या के पुत्र के काँधे पर चढ़कर नदी के पार उतरते हैं तो वह पुरुष महामूढ़ है; क्योंकि जब बन्ध्या के पुत्र है ही नहीं तो उसके काँधे पर कैसे चढ़ेगा, वैसे ही जो कोई कहे कि मैं संसार के किसी पदार्थ को लेकर मुक्त हूँगा तो वह महामूढ़ है। हे राम ! ऐसा पुरुष ज्ञान से शून्य है। उसकी इन्द्रियाँ स्थिर नहीं होतीं। वह शास्त्रों के अर्थ प्रकट भी करता है, पर परमात्मा के ज्ञान से रहित है। उसको इन्द्रियाँ बलपूर्वक विषयों में गिरा देती हैं। जैसे चील पक्षी आकाश में उड़ता-उड़ता मांस को देखकर पृथ्वी पर गिर पड़ता है, वैसे ही अज्ञानी विषय को देखकर गिर पड़ता है। इससे मन सहित इन इन्द्रियों को वश करो और युक्ति से तत्परायण और अन्तर्मुख बनो। यह जो संवेदन उठता है, उसका त्याग करो। जब इसका स्फुरण निवृत्त होगा, तब परमात्मा का साक्षात्कार होगा। जब परमात्मा का साक्षात्कार होगा, तब रूप, अवलोक और मनस्कार की जो त्रिपुटी है, उसके अर्थ की सब भावना जाती रहेगी; केवल आत्मतत्त्व ही प्रत्यक्ष भासित होगा और संसार का अत्यन्त अभाव हो जावेगा।
हे राम ! संसार का आदि परमात्मतत्त्व है और अन्त भी वही है। जैसे स्वर्ण गलाइये तो भी स्वर्ण है और जो न गलाइये तो भी स्वर्ण है, वैसे ही जब सृष्टि का अभाव होता है तब भी आत्मा ही शेष रहता
४२४ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
है, जब सृष्टि उपजी न थी तब भी आत्मा ही था और मध्य भी वही है। परन्तु यह सम्यक्दर्शी को भासित होता है, असम्यक्दर्शी को आत्मसत्ता नहीं भासिते होती। हे राम ! विश्व आत्मा का परिणाम नहीं, चमत्कार है। जैसे सुवर्ण गलता है तो उसकी रैनीसंज्ञा होती है अथवा शलाका कहाती है। यद्यपि उसमें भूषण नहीं हुए तो भी उसका चमत्कार ऐसा ही होता है कि उससे भूषण उपजकर लीन हो जाता है। जैसे सूर्य की किरणें जल का आभास देती हैं, वैसे ही विश्व आत्मा का चमत्कार है। बना कुछ नहीं, आत्मसत्ता ज्यों की त्यों है और उसका चमत्कार विश्व होकर स्थित हुआ है। हे राम ! जब तुमने ऐसे जाना कि केवल आत्मसत्ता है, तब वासना का क्षय हो जावेगा और चेष्टा स्वाभाविक होगी। जैसे वृक्ष के पत्ते पवन से हिलते हैं, वैसे ही शरीर की चेष्टा प्रारब्धवेग से होगी। हे राम ! देखने भर को तुम्हारे शरीर में क्रिया होगी और हृदय में शून्य भासित होगा। जैसे यन्त्र की पुतली संवेदन बिना तागे से चेष्टा करती है, वैसे ही शरीर की चेष्टा प्रारब्ध से स्वाभाविक होगी और तुमको उसका अभिमान न होगा। जैसे कोई पुरुष दूध के लिए अहीर के पास बर्तन ले जाय और उसको दूध दुहने में कुछ विलम्ब हो तो कहे कि बर्तन यहाँ रखा है, मैं घर से कोई काम शीघ्र ही कर आऊँ तो यद्यपि वह घर का काम करने लगता है, पर उसका मन दूध की ओर ही रहता है कि शीघ्र ही जाऊँ, ऐसा न हो कि वह दुहता हो, वैसे ही तुम्हारी क्रिया प्रारब्धवेग से होगी, पर मन आत्मतत्त्व में रहेगा और तुम अहंकार से रहित होगे। जबतक अहंकार उठता है, तबतक परिछिन्न अर्थात् तुच्छ जीव है, उसको शरीर मात्र का ज्ञान होता है। पर अन्तःकरण में प्रतिबिम्बित जो जीव है, उसको नखशिखपर्यन्त शरीर का ज्ञान होता है। इसी में आत्माभिमान होता है। ज्ञान नहीं होता, इससे जीव है। जो पहले तुमसे कहा है, वह विराट् ही ईश्वर है। वह सब शरीर और अन्तःकरण का ज्ञाता, सब लिंग शरीर का अभिमानी, सबको अपना रूप जानता है।
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ४२५
हे राम ! यद्यपि वह विश्वरूप है, तो भी अहंकार से तुच्छ-सा हुआ है । जैसे घनघटा से भिन्न हुआ एक मेघ बादल कहाता है, और घट से अनन्त आकाश घटाकाश कहाता है, पर वह बादल भी मेघ है और घटाकाश भी महाकाश है, वैसे ही अहं के स्फुरण से जीव परिच्छिन्न हुआ है, सो फुरना दृश्य में हुआ है, और दृश्य फुरने में हुआ है । जैसे फूलों में गन्ध और तिलों में तेल है, वैसे ही फुरने में दृश्य है । हे राम ! आत्मा में बुद्धि आदिक स्फुरण है, अर्थात् जब 'मैं हूँ' ऐसे फुरता है, तब आगे दृश्य होता है और जब अहंकार होता है, तब आगे देह इन्द्रियादिक विश्व रचता है । इससे फुरने में दृश्य हुआ और फुरना दृश्य में हुआ । देह, इन्द्रियाँ, मन आदिक जो दृश्य हैं, उनमें जीव के अहंप्रत्यय से फुरना हुआ है; इसी कारण इसकी जीवसंज्ञा हुई है । जब फुरना या अहंभाव नष्ट हो जावे तब आत्मा का साक्षात्कार हो । यह जन्म, मरण, आना, जाना आदि विकारों से युक्त प्रपञ्च भासित होता है तो भी मिथ्या है; क्योंकि विचार करने से कुछ नहीं रहता । जैसे केले के खम्भे में कुछ सार नहीं; वैसे ही विचार करने से प्रपञ्च नहीं रहता । जैसे स्वप्न में मनुष्य अपना जन्म, मरण, आना, जाना देखता है, परन्तु वह सब मिथ्या है, वैसे ही जाग्रत् की सब क्रिया भी मिथ्या है ।
हे राम ! जो परावरदर्शी है, वह इन सब अवस्थाओं में निर्विकल्प है । वह जन्मता भी है । परन्तु नहीं जन्मता; और सब क्रिया करता भी है, परन्तु नहीं करता । वह सबको स्वप्नवत् समझता है; क्योंकि स्वरूप से कभी कुछ नहीं हुआ । हे राम ! ज्ञानी जाग्रत् में भी ऐसे ही देखता है । जब यह आत्मपद में जागता है, तब सब विकारों का अभाव हो जाता है, कोई विकार नहीं भासित होता । हे राम ! जो पुरुष इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह बँधा हुआ है; क्योंकि अभिलाषा ही दुःखदायक है । यद्यपि वह राजा हो, पर उसके हृदय में अभिलाषा है, इससे उसे दरिद्री जानो । जिस पुरुष का छादन, भोजन, शयन कष्ट से देखते हो, अर्थात् भोजन भिक्षा माँगकर अथवा किसी और यत्न से होता है, छादन भी साधारण सा पहिनता है और शयन करने
४२६ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
का स्थान भी जैसा-तैसा है, पर ज्ञान से सम्पन्न है तो उसको चक्रवर्ती जानो। यथा—
दो०—सात गाँठ कोपीन की, साध न मानै शङ्क। राम अमल माता फिरै, गिनै इन्द्र को रङ्क॥
हे राम! उसको चक्रवर्ती से भी अधिक जानो। यदि वह आरम्भ किया करता भी दिखता है; पर संकल्प से रहित है तो कुछ नहीं करता। उसका करना, न करना दोनों बराबर हैं, क्योंकि वह निरभिमान है। वह शुभकर्मों के करने से स्वर्ग नहीं जाता और अशुभकर्म से नरक नहीं भोगता—उसको दोनों एक समान हैं।
हे राम! ज्ञानी और अज्ञानी दोनों की चेष्टा समान है; परन्तु अज्ञानी अहङ्कारसहित करता है इससे दुख पाता है। इससे तुम अहँकार का त्याग करो और अपना स्वरूप, जो चैत्य से रहित चैतन्य है, उसमें स्थित हो रहो, जिससे सब संशय मिट जावें। जितने जीव तुमको भासित होते हैं, वे सब संवित् अर्थात् ज्ञानरूप हैं, परन्तु बहिर्मुख फुरने के कारण भ्रम में पड़े हैं। जब जीव अन्तर्मुख हो तब केवल शान्तरूप हो। जहाँ गुणों और तत्त्वों का क्षोभ नहीं, वह शान्तपद कहाता है। हे राम! जैसे विराटरूप का मन चन्द्रमा है, वैसे ही सब जीवों का है, अर्थात् सब विराटरूप हैं, परन्तु प्रमाद से वास्तव स्वरूप नहीं भासित होता। हे राम! जैसे गुलाब की सुगन्ध सम्पूर्ण वृक्ष में व्याप्त है, परन्तु फूल ही में भासित होती है, वैसे ही चैतन्य सत्ता सब शरीर में व्याप्त है, परन्तु हृदय में ही भासित होती है। जो त्रिकोणरूप निर्मलचक्र है, वही अहंब्रह्म का उत्थान होता है। वहाँ से वृत्ति फलकर पञ्चइन्द्रियों के छिद्र से निकलकर विषय को ग्रहण करती है और जीव उन इन्द्रियों के इष्ट-अनिष्ट की प्राप्ति में राग-द्वेष मानता है। इससे हे राम! इतना कष्ट प्रमाद से है। जब बोध होता है, तब संसार का भ्रम मिट जाता है।
हे राम! वासनारूप जो संसार है, उसका बीज अहंभाव है और वह प्रत्यक्ष संसार में दिखता है। जब इसकी चिन्तना न हो और स्वरूप
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ४२७
में अहंप्रत्यय हो, तब संसार का भ्रम मिट जावे। अहंभाव के शान्त होने पर ज्ञानवान् यन्त्र की पुतली के समान चेष्टा करता है। हे राम! जो पदार्थ सत्य है, उसका कभी अभाव नहीं होता, और जो असत्य है, वह सत्य नहीं होता। यदि होने की भावना कीजिए तो भी नहीं होता। जैसे अग्नि को जानकर स्पर्श कीजिये तो भी जलाती है और बिना जाने स्पर्श करिये तो भी जलाती है, क्योंकि सत्य है, और जैसे जल की भावना से मृग मरुस्थल में दौड़ता है, परन्तु जल नहीं पाता, क्योंकि वह असत्य है, वैसे ही हे राम! अहंकार जो स्फुरता है वह असत्य है; भ्रम से सिद्ध है और विचार से नष्ट हो जावेगा। हे राम! यह अहंकाररूपी कलंक उठा है। यदि निरहंकार होकर देखो तो मुक्तरूप हो और यदि अहंकार-संयुक्त हो तो बन्धन है। इससे निरहंकार होकर परमनिर्वाण को प्राप्त होओ। यही हमारा सिद्धान्त है और परमभूमिका भी यही है। जैसे पूर्णमासी का चन्द्रमा शोभा पाता है, वैसे ही तुम ब्राह्मी लक्ष्मी से शोभा पाओगे। हे राम! ज्ञानवान् का चित्त सत्पद को प्राप्त होता है, इससे अहंकार नहीं रहता और उसके चित्त की चेष्टा फलदायक नहीं होती। जैसे भुना बीज नहीं उगता वैसे ही उसका जन्म नहीं होता। और अज्ञानी का चित्त जन्ममरण का कारण होता है। जैसे कच्चा बीज उगता है, वैसे ही अज्ञानी की चेष्टा जन्म का कारण होती है।
हे राम! जितने पदार्थ हैं, उन सबसे निराश हो रहो; जिससे हृदय में किसी की अभिलाषा न उठे, और न किसी का सद्भाव उठे, पाषाण की तरह तुम्हारा हृदय हो। हे राम! जिसका हृदय कोमल स्नेहसंयुक्त है, वह अज्ञानी है। जिसका हृदय पाषाण-समान स्नेह से रहित है, वह ज्ञानी है। इससे निर्मम और निरहंकार होकर स्थित रहो। ये भोग मिथ्या हैं—इनकी इच्छा में सुख नहीं। हे राम! जब संसार से उपरत और अन्तर्मुख आत्मपरायण होगे, तब अहंकार निवृत्त हो जावेगा और आत्मा ही भासित होगा। जैसे वसन्तऋतु आती है तो वृक्ष प्रफुल्लित होते हैं और पुरातन पत्ते गिरकर नूतन निकल आते हैं, वैसे ही
१२८ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
जब तुम अन्तर्मुख होगे, तब अहंकार निवृत्त हो जावेगा, विभुता को प्राप्त होगे; अहंप्रत्यय जाता रहेगा और परमानिर्वाण पद पाओगे। इससे संवेदन अहंकार का त्याग करो और कोई यत्न न करो। तुमको यही हमारा उपदेश है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे सुखेनयोगोपदेशो नाम शताधिकत्रिचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ १४३ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह जो वासनारूपी संसार है; उससे तुम मङ्की ऋषि के सदृश तर जाओ। रामजी ने पूछा, हे भगवन्! मङ्की ऋषि किस प्रकार तरे हैं सो कृपा करके कहिये? वशिष्ठजी बोले, हे राम! मङ्कीऋषि का वृत्तान्त सुनो। उसने महाउग्र तप किया था। एक समय मैं आकाश में अपने घर में था। तुम्हारे पितामह राजा अज ने मेरा आवाहन किया। तब मैं राजा अज के निमित्त आकाश से उतरा तो मार्ग में एक वन देखा जिसमें अनेक वन के समूह थे, जो भयानक और शून्य थे। वहाँ न कोई मनुष्य देख पड़ता था और न कोई पशु, केवल महाशून्य वन था—मानो एकान्त ब्रह्मस्थान हो—और कई योजन तक मरुस्थल ही देख पड़ता था। मध्याह्न का समय था और अतितीक्ष्ण धूप पड़ती थी, जाँघों तक तपी हुई रेत में मैंने प्रवेश किया और कई वृक्ष जले हुए वहाँ देख पड़े। हे राम! उस शून्य स्थल में एक अतिदुःखित विदेशी आता मुझको देख पड़ा। उसने यह वाक्य मुख से निकाला कि हाय हाय! मैंने महाकष्ट पाया है। जैसे किसी को दुष्टजन दुःख देते हैं और दया नहीं करते, वैसे ही मुझको धूप और यात्रा ने जलाया है और मैं अतिदुःख को प्राप्त हुआ हूँ। हे राम! ऐसे वचन कहता हुआ वह मेरे साथ चला जाता था। जब कुछ आगे गया तो एक धीवरों का गाँव देख पड़ा; जहाँ पाँच अथवा सात घर थे। उसको देखकर वह शीघ्र चलने लगा कि वहाँ मुझको शान्ति होगी और मैं जलपान करके छाया के नीचे बैठूँगा।
हे राम! उसको देखकर मुझे दया आई तो मैंने कहा कि हे मार्ग के मीत! तू कहाँ जाता है? जिनको सुखदायी जानकर तू दौड़ता है
⚙️ निर्वाण प्रकरण ४२६
वे दुःखदायक हैं। जैसे मरुस्थल को नदी जानकर मृग जलपान के निमित्त दौड़ता है कि शान्ति पाऊँ और अतिदुःख पाता है, वैसे ही जिस स्थान को तू सुखरूप जानता है, वह दुःखरूप है। हे अङ्ग! ये जो इस गाँव के वासी हैं, उनका संग कदापि न करना। इनका संग दुःखरूप है। जो पुरुष विचारपूर्वक चेष्टा करता है, उसको दुःख नहीं होता और जो बिना विचारे काम करता है, वह दुःख पाता है। ये नगरवासी आप जलते हैं तो तुझको कैसे सुख देंगे ? जैसे कोई पुरुष अग्निकुण्ड में जलता हो और उससे कहिये कि तू मेरी तपन शान्त कर तो कहनेवाला मूढ़ होता है, क्योंकि वह तो आप ही जलता है और की तपन कैसे शान्त करेगा, वैसे ही वे तो आप इन्द्रियों के विषय की तृष्णारूपी अग्नि में जलते हैं, तुझको कैसे शान्त करेंगे ? हे मार्ग के मीत ! पृथ्वी के छिद्र में सर्प होना, मरुस्थल का मृग होना और पाषाण की शिला में कीट होकर रहना अङ्गीकार कीजिये, परन्तु अज्ञानी का सङ्ग न कीजिये, जिनको इन्द्रियों के सुख की तृष्णा रहती है। इन्द्रियों के सुख आपातरमणीय हैं अर्थात् जब तक इन्द्रियों का विषय के साथ संयोग है, तब तक सुख है और जब वियोग होता है, तब दुःख होता है। विषयी जनों की प्रीति भी विषयतुल्य है। वह विचारवती बुद्धिरूपी कमलिनी का नाश करनेवाली वरफ है। इनकी संगति में वचनरूपी पवन से राख उड़ती है और पास बैठनेवाले को अन्धकार में डालती है। इससे इन ग्रामवासी अज्ञानियों का संग न करना। ये अज्ञानी विचारवती बुद्धिरूपी सूर्य को ढकनेवाले बादल हैं। जैसे वेलि पर अग्नि डालिये तो जलाती है, वैसे ही इनकी संगति वैराग्य को ग्रहण करनेवाली बुद्धि का नाश करनेवाली है—इससे इनका संग न करना। हे साधो! संग उसका कर, जिसके संग से तेरा ताप मिटे। इनके संग से शान्ति न पावेगा।
हे राम! इस प्रकार जब मैंने कहा, तब वह मेरे निकट आकर बोला, हे भगवन्! तुम कौन हो और तुम्हारा नाम क्या है ? तुम्हारे वचन सुनकर मुझे शान्ति मिली है। तुम शून्य दिखते हो; पर सब
४३० ☸ योगवाशिष्ठ ☸
गुणों से पूर्ण हो और तुम्हारा दिव्य प्रकाश मुझको भासित होता है। तुम आदिपुरुष विराट् हो और तुम सुन्दर देख पड़ते हो। हे भगवन्! जो सुन्दर होता है, उसको देखकर राग उपजता है और चित्त क्षोभ को भी प्राप्त होता है। तुम ऐसे सुन्दर हो कि तुम्हारे दर्शन से मुझको शान्ति मिलती जाती है। तुम दिव्य तेज को धारण किये देख पड़ते हो और ऐसे तेजवान् हो कि देखने नहीं देते—अर्थ यह है कि तुम्हारे समान किसी की सुन्दरता नहीं और तुम्हारा तेज हृदय में शान्ति उपजाता है। वह एक शीतल प्रकाश है। हे भगवन्! तुम धर्म से उन्मत्त से दिखते हो सो तुम कैसी शान्ति को लेकर एकान्त में स्थित हो? अपने स्वरूप प्रकाश को तुम दया करके दिखाते हो। पृथ्वी पर स्थित भी दिखते हो, परन्तु त्रिलोकी के ऊपर विराजमान भासित होते हो। एक ही दिखते हो, परन्तु सर्वात्मा हो। किंचन-अकिंचन और सब भावपदार्थों से शून्य दिखते हो, पर सब पदार्थ तुम्हारी सत्ता से प्रकाशित होते हैं। तुम सब पदार्थों के अधिष्ठान हो। तुम्हारे नेत्रों के खोलने से सृष्टि की उत्पत्ति होती है और मूँदने से लय हो जाती है; इससे ईश्वर हो। तुम सकलङ्क दिखते हो, परन्तु निष्कलङ्क हो अर्थात् तुममें फुरना देख पड़ता है, परन्तु हृदय से शून्य हो। तुम किसी अमृत का पान करके आये हो और बड़े ऐश्वर्य से सम्पन्न दिखाते हो। इससे हे भगवन्! तुम कौन हो? यदि मुझसे पूछो कि तू कौन है तो मैं माण्डव्य ऋषि के कुल में हूँ और मेरा नाम मङ्गी है। मैं ब्राह्मण हूँ और तीर्थयात्रा के निमित्त निकला था। मैं सब दिशाओं में घूमा और अति भयानक स्थानों में जो तीर्थ हैं वहाँ भी गया। परन्तु मुझको शान्ति न हुई ऐसी शान्ति कहीं न पाई कि इन्द्रियों की जलन से रहित हो जाऊँ—अब मैं अपने घर को जा रहा हूँ। हे भगवन्! अब घर से भी मेरा चित्त विरक्त हुआ है। यह संसार ही मिथ्या है तो घर किसका है? संसार में सुख कहीं नहीं। यह प्राण ऐसे हैं जैसी बिजली की चमक होती है और वैसे ही यह संसार भी नष्ट होता दिखता है। शरीर उपजते भी हैं और मिट भी
- निर्वाण प्रकरण * ४३१
जाते हैं—ये सृष्टि का भ्रम मात्र है, जैसे रात्रि आती है और फिर नहीं जान पड़ती कि कहाँ गई । हे भगवन् ! इस संसार को असार जान-कर मैं उदासीन हुआ हूँ, क्योंकि मैंने अनेक जन्म पाये हैं, जो नष्ट हो गये हैं। मैं इसी प्रकार घूमता फिरता हूँ। अब तुम्हारे शरणागत हूँ और जानता हूँ कि तुमसे मेरा कल्याण होगा । तुम कल्याणरूप देख पड़ते हो, इससे कृपा करके कहो कि कौन हो ?
हे राम ! इतना सुन मैंने कहा-हे मङ्गीऋषि ! मैं वशिष्ठ ब्राह्मण हूँ और मेरा घर आकाश में है । मुझको राजा अज ने स्मरण किया है, इसलिए मैं इस मार्ग से जाता हूँ । अब तुम संशय मत करो, ज्ञानमार्ग को पाओगे । हे राम ! जब मैंने ऐसे कहा, तब वह मेरे चरणों पर गिर पड़ा और उसके नेत्रों से जल बहने लगा । वह महाआनन्द को प्राप्त हुआ । तब मैंने कहा कि हे ऋषि ! तू संशय मत कर । मैं तुझको अकृत्रिम शान्ति देकर जाऊँगा । जो कुछ तू पूछा चाहता है सो पूछ । मैं तुझको उपदेश करूँगा । मैं जानता हूँ कि तू कल्याणकृत है, इसलिए जो कुछ मैं कहूँगा, वह तू धारण करेगा । तू कुछ प्रश्न कर; क्योंकि तेरे कषाय परिपक्व हुए हैं । तू मेरे वचनों का अधिकारी है, तुझको मैं उपदेश करूँगा । अब तू संसार-सागर के तट पर आ गया है । अब तुझे उससे निकालने भर की देर है; अर्थात् तू वैराग्य से पूर्ण है और संसार का तट वैराग्य ही है; इससे संशय मत कर ।
इति श्रीयोग० निर्वाण० शताधिकचतुश्चत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ १४४ ॥
मङ्गी बोले, हे भगवन् ! अब मैं जानता हूँ कि मेरा कार्य सिद्ध हो गया । मुझको अज्ञान से मोह था, उसका नाश करने को तुम समर्थ देख पड़ते हो । मेरे हृदय का तम नष्ट करने को तुम सूर्य उदय हुए हो । हे भगवन् ! यह संसार असार है, पर लोगों की बुद्धि विषयों की ओर ही दौड़ती है, जहाँ दुःख ही होते हैं । जैसे जल नीचे स्थान को चला जाता है, वैसे ही हमारी बुद्धि नीचे स्थानों को दौड़ती है और वही चाहती है । हे भगवन् ! जितने भोग हैं, उनको मैंने भोगा है, परन्तु शान्ति न पाई, बल्कि उल्टी तृष्णा बढ़ती गई । जैसे तृषा लगे
४३२ ॐ योगवाशिष्ठ ॐ
और खारा जल पान करिये तो तृषा नहीं मिटती, बल्कि बढ़ती ही जाती है, वैसे ही विषयों को भोगने से शान्ति नहीं प्राप्त होती—तृष्णा बढ़ती जाती है। हे मुनिराज ! देह जर्जर हो जाती है, दाँत गिर पड़ते हैं और अतिक्षोभ होता है, तो भी तृष्णा नहीं मिटती। अब मैं दुःख चाहता हूँ, सुख नहीं चाहता; क्योंकि संसार के जितने सुख हैं उनका परिणाम दुःख है। जो प्रथम दुःख हैं, उनका परिणाम सुख है, इसी से दुःख चाहता हूँ, संसार के सुख नहीं चाहता, हे भगवन् ! अपनी वासना ही दुःखदायक है। जैसे कुम्भारी (कीड़ा) घर बनाकर उसमें आप ही फँस मरती है, वैसे ही अपनी वासना से जीव आप ही बंधन को प्राप्त होता है। हे मुने ! वह कौन काल था; जब अज्ञानरूपी हाथी ने मुझको वश किया था और उसका नाश करनेवाला ज्ञानरूपी सिंह कब प्रकट होगा ? कर्मरूपी तृणों का नाशकर्त्ता विवेकरूपी वसन्त कब प्रकटेगा और वासनारूपी अँधेरी रात्रि का नाशकर्त्ता ज्ञानरूपी सूर्य कब उदय होगा ? हे भगवन् ! वैताल तब तक ही दिखता है, जब तक निशा है, जब सूर्य उदय होता है, तब निशा जाती रहती है और वैताल नहीं दिखता, वैसे ही अहंकाररूपी वैताल तब तक है, जब तक अज्ञानरूपी रात्रि दूर नहीं होती।
हे भगवन् ! जब सन्तजनों के उपदेश से आत्मज्ञानरूपी सूर्य प्रकट होता है, तब अहंकाररूपी वैताल वहाँ नहीं विचरता। सन्तजनों का संग और सत्शास्त्रों को देखना चाँदनी रात्रि के समान है। उनसे जब स्वरूप का साक्षात्कार हो, तब दिन हुआ जानिये। जब तक सन्तजनों का संग नहीं करता और सत्शास्त्रों को नहीं देखता, तबतक अँधेरी रात्रि है। हे भगवन् ! जो सत्शास्त्रों को भी सुने और फिर विषयों की ओर भी गिरे, उसे बड़ा अभागी जानिये। मैं वही हूँ। परन्तु अब मैं तुम्हारी शरण आया हूँ। मेरे हृदयरूपी आकाश में जो अज्ञानरूपी कुहरा है, वह तुम्हारे वचनरूपी शरत्काल से नष्ट हो जावेगा और हृदयाकाश निर्मल होगा। हे भगवन् ! मैंने त्रिदण्ड साधे हैं अर्थात् दीर्घ काल तक मन, शरीर और वाणी में तीन तप किये हैं, परन्तु आत्मप्रकाश नहीं
☸ निर्वाण प्रकरण ☸
४३३
हुआ। अब तुम्हारे शरणागत होकर तरूँगा। इसलिए कृपा करके उपदेश करो, जिससे मेरे हृदय का तम दूर हो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे मङ्गिवैराग्ययोगो नाम शताधिकपञ्चचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ १४५ ॥
वशिष्ठजी ने कहा, हे तात ! संवेदन, भावना, वासना और कलना, ये अनर्थ के कारण हैं। जब इनका अभाव हो, तब कल्याण हो। शुद्ध चिन्मात्रपद प्रत्यक्ष चैतन्य अपने स्वरूप में स्थित है। जो अहंकार का उत्थान है, वही संवेदन है। भाव यह है कि पहले आप कुछ बना, फिर चेता, और अपना रूप चित्त में स्मरण हुआ, तब भ्रम मिट जाता है। और यदि जो कुछ बना उसकी भावना होती है कि मैं यह हूँ तो इससे संसार दृढ़ होता है। फिर वैसे ही वासना दृढ़ होती है और अपने शरीर के अनुसार नाना प्रकार की कलना होती है। फिर संसार के संकल्प-विकल्प उठते हैं। हे ब्राह्मण ! ये अनर्थ के कारण हैं। जब इनका अभाव हो, तब कल्याण हो। जितने शब्द और अर्थ हैं, उनका अधिष्ठान प्रत्यक्ष चैतन्य है। सब शब्द उसी के आश्रित हैं और सब वही है। जब तू ऐसे जानेगा, तब वासना का क्षय हो जायगा। जब अहंसंवेदन फुरता है, तब आगे संसार भासित होता है। जैसे जब बसन्त ऋतु आती है, तब बेलें प्रफुल्लित होती हैं, वैसे ही जब संवेदन फुरता है, तब आगे संसार सिद्ध होता है। और जब संसार हुआ, तब नाना प्रकार की वासना फुरती है और संसार नहीं मिटता। हे अङ्ग ! संसार जन्म-मरण का ही नाम है। जब यह संसरण मिटेगा, तब आत्मपद ही शेष रहेगा। वह तेरा अपना रूप है, इससे इस वासना को त्यागकर अपने आपमें स्थित हो रह—सब तेरा ही रूप है। जबतक वासना फुरती है, तबतक संसार दृढ़ रहता है। जैसे वृक्ष को जल दीजिए तो बढ़ता जाता है, वैसे ही वासनारूपी जल देने से संसाररूपी वृक्ष बढ़ता जाता है। इससे वासना का नाश करो कि यह संवेदन न उठे। जब वृक्ष जल से रहित होता है, तब आप ही सूख जाता है। हे पुत्र ! आत्मा में जगत् नहीं हुआ, केवल परमार्थसत्ता है। जैसे रस्सी में सर्प