भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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४३० ☸ योगवाशिष्ठ ☸

गुणों से पूर्ण हो और तुम्हारा दिव्य प्रकाश मुझको भासित होता है। तुम आदिपुरुष विराट् हो और तुम सुन्दर देख पड़ते हो। हे भगवन्! जो सुन्दर होता है, उसको देखकर राग उपजता है और चित्त क्षोभ को भी प्राप्त होता है। तुम ऐसे सुन्दर हो कि तुम्हारे दर्शन से मुझको शान्ति मिलती जाती है। तुम दिव्य तेज को धारण किये देख पड़ते हो और ऐसे तेजवान् हो कि देखने नहीं देते—अर्थ यह है कि तुम्हारे समान किसी की सुन्दरता नहीं और तुम्हारा तेज हृदय में शान्ति उपजाता है। वह एक शीतल प्रकाश है। हे भगवन्! तुम धर्म से उन्मत्त से दिखते हो सो तुम कैसी शान्ति को लेकर एकान्त में स्थित हो? अपने स्वरूप प्रकाश को तुम दया करके दिखाते हो। पृथ्वी पर स्थित भी दिखते हो, परन्तु त्रिलोकी के ऊपर विराजमान भासित होते हो। एक ही दिखते हो, परन्तु सर्वात्मा हो। किंचन-अकिंचन और सब भावपदार्थों से शून्य दिखते हो, पर सब पदार्थ तुम्हारी सत्ता से प्रकाशित होते हैं। तुम सब पदार्थों के अधिष्ठान हो। तुम्हारे नेत्रों के खोलने से सृष्टि की उत्पत्ति होती है और मूँदने से लय हो जाती है; इससे ईश्वर हो। तुम सकलङ्क दिखते हो, परन्तु निष्कलङ्क हो अर्थात् तुममें फुरना देख पड़ता है, परन्तु हृदय से शून्य हो। तुम किसी अमृत का पान करके आये हो और बड़े ऐश्वर्य से सम्पन्न दिखाते हो। इससे हे भगवन्! तुम कौन हो? यदि मुझसे पूछो कि तू कौन है तो मैं माण्डव्य ऋषि के कुल में हूँ और मेरा नाम मङ्गी है। मैं ब्राह्मण हूँ और तीर्थयात्रा के निमित्त निकला था। मैं सब दिशाओं में घूमा और अति भयानक स्थानों में जो तीर्थ हैं वहाँ भी गया। परन्तु मुझको शान्ति न हुई ऐसी शान्ति कहीं न पाई कि इन्द्रियों की जलन से रहित हो जाऊँ—अब मैं अपने घर को जा रहा हूँ। हे भगवन्! अब घर से भी मेरा चित्त विरक्त हुआ है। यह संसार ही मिथ्या है तो घर किसका है? संसार में सुख कहीं नहीं। यह प्राण ऐसे हैं जैसी बिजली की चमक होती है और वैसे ही यह संसार भी नष्ट होता दिखता है। शरीर उपजते भी हैं और मिट भी