भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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पृष्ठ 430

⚙️ निर्वाण प्रकरण ४२६

वे दुःखदायक हैं। जैसे मरुस्थल को नदी जानकर मृग जलपान के निमित्त दौड़ता है कि शान्ति पाऊँ और अतिदुःख पाता है, वैसे ही जिस स्थान को तू सुखरूप जानता है, वह दुःखरूप है। हे अङ्ग! ये जो इस गाँव के वासी हैं, उनका संग कदापि न करना। इनका संग दुःखरूप है। जो पुरुष विचारपूर्वक चेष्टा करता है, उसको दुःख नहीं होता और जो बिना विचारे काम करता है, वह दुःख पाता है। ये नगरवासी आप जलते हैं तो तुझको कैसे सुख देंगे ? जैसे कोई पुरुष अग्निकुण्ड में जलता हो और उससे कहिये कि तू मेरी तपन शान्त कर तो कहनेवाला मूढ़ होता है, क्योंकि वह तो आप ही जलता है और की तपन कैसे शान्त करेगा, वैसे ही वे तो आप इन्द्रियों के विषय की तृष्णारूपी अग्नि में जलते हैं, तुझको कैसे शान्त करेंगे ? हे मार्ग के मीत ! पृथ्वी के छिद्र में सर्प होना, मरुस्थल का मृग होना और पाषाण की शिला में कीट होकर रहना अङ्गीकार कीजिये, परन्तु अज्ञानी का सङ्ग न कीजिये, जिनको इन्द्रियों के सुख की तृष्णा रहती है। इन्द्रियों के सुख आपातरमणीय हैं अर्थात् जब तक इन्द्रियों का विषय के साथ संयोग है, तब तक सुख है और जब वियोग होता है, तब दुःख होता है। विषयी जनों की प्रीति भी विषयतुल्य है। वह विचारवती बुद्धिरूपी कमलिनी का नाश करनेवाली वरफ है। इनकी संगति में वचनरूपी पवन से राख उड़ती है और पास बैठनेवाले को अन्धकार में डालती है। इससे इन ग्रामवासी अज्ञानियों का संग न करना। ये अज्ञानी विचारवती बुद्धिरूपी सूर्य को ढकनेवाले बादल हैं। जैसे वेलि पर अग्नि डालिये तो जलाती है, वैसे ही इनकी संगति वैराग्य को ग्रहण करनेवाली बुद्धि का नाश करनेवाली है—इससे इनका संग न करना। हे साधो! संग उसका कर, जिसके संग से तेरा ताप मिटे। इनके संग से शान्ति न पावेगा।

हे राम! इस प्रकार जब मैंने कहा, तब वह मेरे निकट आकर बोला, हे भगवन्! तुम कौन हो और तुम्हारा नाम क्या है ? तुम्हारे वचन सुनकर मुझे शान्ति मिली है। तुम शून्य दिखते हो; पर सब