योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 429, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें१२८ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
जब तुम अन्तर्मुख होगे, तब अहंकार निवृत्त हो जावेगा, विभुता को प्राप्त होगे; अहंप्रत्यय जाता रहेगा और परमानिर्वाण पद पाओगे। इससे संवेदन अहंकार का त्याग करो और कोई यत्न न करो। तुमको यही हमारा उपदेश है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे सुखेनयोगोपदेशो नाम शताधिकत्रिचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ १४३ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह जो वासनारूपी संसार है; उससे तुम मङ्की ऋषि के सदृश तर जाओ। रामजी ने पूछा, हे भगवन्! मङ्की ऋषि किस प्रकार तरे हैं सो कृपा करके कहिये? वशिष्ठजी बोले, हे राम! मङ्कीऋषि का वृत्तान्त सुनो। उसने महाउग्र तप किया था। एक समय मैं आकाश में अपने घर में था। तुम्हारे पितामह राजा अज ने मेरा आवाहन किया। तब मैं राजा अज के निमित्त आकाश से उतरा तो मार्ग में एक वन देखा जिसमें अनेक वन के समूह थे, जो भयानक और शून्य थे। वहाँ न कोई मनुष्य देख पड़ता था और न कोई पशु, केवल महाशून्य वन था—मानो एकान्त ब्रह्मस्थान हो—और कई योजन तक मरुस्थल ही देख पड़ता था। मध्याह्न का समय था और अतितीक्ष्ण धूप पड़ती थी, जाँघों तक तपी हुई रेत में मैंने प्रवेश किया और कई वृक्ष जले हुए वहाँ देख पड़े। हे राम! उस शून्य स्थल में एक अतिदुःखित विदेशी आता मुझको देख पड़ा। उसने यह वाक्य मुख से निकाला कि हाय हाय! मैंने महाकष्ट पाया है। जैसे किसी को दुष्टजन दुःख देते हैं और दया नहीं करते, वैसे ही मुझको धूप और यात्रा ने जलाया है और मैं अतिदुःख को प्राप्त हुआ हूँ। हे राम! ऐसे वचन कहता हुआ वह मेरे साथ चला जाता था। जब कुछ आगे गया तो एक धीवरों का गाँव देख पड़ा; जहाँ पाँच अथवा सात घर थे। उसको देखकर वह शीघ्र चलने लगा कि वहाँ मुझको शान्ति होगी और मैं जलपान करके छाया के नीचे बैठूँगा।
हे राम! उसको देखकर मुझे दया आई तो मैंने कहा कि हे मार्ग के मीत! तू कहाँ जाता है? जिनको सुखदायी जानकर तू दौड़ता है