योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 428, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ४२७
में अहंप्रत्यय हो, तब संसार का भ्रम मिट जावे। अहंभाव के शान्त होने पर ज्ञानवान् यन्त्र की पुतली के समान चेष्टा करता है। हे राम! जो पदार्थ सत्य है, उसका कभी अभाव नहीं होता, और जो असत्य है, वह सत्य नहीं होता। यदि होने की भावना कीजिए तो भी नहीं होता। जैसे अग्नि को जानकर स्पर्श कीजिये तो भी जलाती है और बिना जाने स्पर्श करिये तो भी जलाती है, क्योंकि सत्य है, और जैसे जल की भावना से मृग मरुस्थल में दौड़ता है, परन्तु जल नहीं पाता, क्योंकि वह असत्य है, वैसे ही हे राम! अहंकार जो स्फुरता है वह असत्य है; भ्रम से सिद्ध है और विचार से नष्ट हो जावेगा। हे राम! यह अहंकाररूपी कलंक उठा है। यदि निरहंकार होकर देखो तो मुक्तरूप हो और यदि अहंकार-संयुक्त हो तो बन्धन है। इससे निरहंकार होकर परमनिर्वाण को प्राप्त होओ। यही हमारा सिद्धान्त है और परमभूमिका भी यही है। जैसे पूर्णमासी का चन्द्रमा शोभा पाता है, वैसे ही तुम ब्राह्मी लक्ष्मी से शोभा पाओगे। हे राम! ज्ञानवान् का चित्त सत्पद को प्राप्त होता है, इससे अहंकार नहीं रहता और उसके चित्त की चेष्टा फलदायक नहीं होती। जैसे भुना बीज नहीं उगता वैसे ही उसका जन्म नहीं होता। और अज्ञानी का चित्त जन्ममरण का कारण होता है। जैसे कच्चा बीज उगता है, वैसे ही अज्ञानी की चेष्टा जन्म का कारण होती है।
हे राम! जितने पदार्थ हैं, उन सबसे निराश हो रहो; जिससे हृदय में किसी की अभिलाषा न उठे, और न किसी का सद्भाव उठे, पाषाण की तरह तुम्हारा हृदय हो। हे राम! जिसका हृदय कोमल स्नेहसंयुक्त है, वह अज्ञानी है। जिसका हृदय पाषाण-समान स्नेह से रहित है, वह ज्ञानी है। इससे निर्मम और निरहंकार होकर स्थित रहो। ये भोग मिथ्या हैं—इनकी इच्छा में सुख नहीं। हे राम! जब संसार से उपरत और अन्तर्मुख आत्मपरायण होगे, तब अहंकार निवृत्त हो जावेगा और आत्मा ही भासित होगा। जैसे वसन्तऋतु आती है तो वृक्ष प्रफुल्लित होते हैं और पुरातन पत्ते गिरकर नूतन निकल आते हैं, वैसे ही