योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 432, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें- निर्वाण प्रकरण * ४३१
जाते हैं—ये सृष्टि का भ्रम मात्र है, जैसे रात्रि आती है और फिर नहीं जान पड़ती कि कहाँ गई । हे भगवन् ! इस संसार को असार जान-कर मैं उदासीन हुआ हूँ, क्योंकि मैंने अनेक जन्म पाये हैं, जो नष्ट हो गये हैं। मैं इसी प्रकार घूमता फिरता हूँ। अब तुम्हारे शरणागत हूँ और जानता हूँ कि तुमसे मेरा कल्याण होगा । तुम कल्याणरूप देख पड़ते हो, इससे कृपा करके कहो कि कौन हो ?
हे राम ! इतना सुन मैंने कहा-हे मङ्गीऋषि ! मैं वशिष्ठ ब्राह्मण हूँ और मेरा घर आकाश में है । मुझको राजा अज ने स्मरण किया है, इसलिए मैं इस मार्ग से जाता हूँ । अब तुम संशय मत करो, ज्ञानमार्ग को पाओगे । हे राम ! जब मैंने ऐसे कहा, तब वह मेरे चरणों पर गिर पड़ा और उसके नेत्रों से जल बहने लगा । वह महाआनन्द को प्राप्त हुआ । तब मैंने कहा कि हे ऋषि ! तू संशय मत कर । मैं तुझको अकृत्रिम शान्ति देकर जाऊँगा । जो कुछ तू पूछा चाहता है सो पूछ । मैं तुझको उपदेश करूँगा । मैं जानता हूँ कि तू कल्याणकृत है, इसलिए जो कुछ मैं कहूँगा, वह तू धारण करेगा । तू कुछ प्रश्न कर; क्योंकि तेरे कषाय परिपक्व हुए हैं । तू मेरे वचनों का अधिकारी है, तुझको मैं उपदेश करूँगा । अब तू संसार-सागर के तट पर आ गया है । अब तुझे उससे निकालने भर की देर है; अर्थात् तू वैराग्य से पूर्ण है और संसार का तट वैराग्य ही है; इससे संशय मत कर ।
इति श्रीयोग० निर्वाण० शताधिकचतुश्चत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ १४४ ॥
मङ्गी बोले, हे भगवन् ! अब मैं जानता हूँ कि मेरा कार्य सिद्ध हो गया । मुझको अज्ञान से मोह था, उसका नाश करने को तुम समर्थ देख पड़ते हो । मेरे हृदय का तम नष्ट करने को तुम सूर्य उदय हुए हो । हे भगवन् ! यह संसार असार है, पर लोगों की बुद्धि विषयों की ओर ही दौड़ती है, जहाँ दुःख ही होते हैं । जैसे जल नीचे स्थान को चला जाता है, वैसे ही हमारी बुद्धि नीचे स्थानों को दौड़ती है और वही चाहती है । हे भगवन् ! जितने भोग हैं, उनको मैंने भोगा है, परन्तु शान्ति न पाई, बल्कि उल्टी तृष्णा बढ़ती गई । जैसे तृषा लगे