योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४३२ ॐ योगवाशिष्ठ ॐ
और खारा जल पान करिये तो तृषा नहीं मिटती, बल्कि बढ़ती ही जाती है, वैसे ही विषयों को भोगने से शान्ति नहीं प्राप्त होती—तृष्णा बढ़ती जाती है। हे मुनिराज ! देह जर्जर हो जाती है, दाँत गिर पड़ते हैं और अतिक्षोभ होता है, तो भी तृष्णा नहीं मिटती। अब मैं दुःख चाहता हूँ, सुख नहीं चाहता; क्योंकि संसार के जितने सुख हैं उनका परिणाम दुःख है। जो प्रथम दुःख हैं, उनका परिणाम सुख है, इसी से दुःख चाहता हूँ, संसार के सुख नहीं चाहता, हे भगवन् ! अपनी वासना ही दुःखदायक है। जैसे कुम्भारी (कीड़ा) घर बनाकर उसमें आप ही फँस मरती है, वैसे ही अपनी वासना से जीव आप ही बंधन को प्राप्त होता है। हे मुने ! वह कौन काल था; जब अज्ञानरूपी हाथी ने मुझको वश किया था और उसका नाश करनेवाला ज्ञानरूपी सिंह कब प्रकट होगा ? कर्मरूपी तृणों का नाशकर्त्ता विवेकरूपी वसन्त कब प्रकटेगा और वासनारूपी अँधेरी रात्रि का नाशकर्त्ता ज्ञानरूपी सूर्य कब उदय होगा ? हे भगवन् ! वैताल तब तक ही दिखता है, जब तक निशा है, जब सूर्य उदय होता है, तब निशा जाती रहती है और वैताल नहीं दिखता, वैसे ही अहंकाररूपी वैताल तब तक है, जब तक अज्ञानरूपी रात्रि दूर नहीं होती।
हे भगवन् ! जब सन्तजनों के उपदेश से आत्मज्ञानरूपी सूर्य प्रकट होता है, तब अहंकाररूपी वैताल वहाँ नहीं विचरता। सन्तजनों का संग और सत्शास्त्रों को देखना चाँदनी रात्रि के समान है। उनसे जब स्वरूप का साक्षात्कार हो, तब दिन हुआ जानिये। जब तक सन्तजनों का संग नहीं करता और सत्शास्त्रों को नहीं देखता, तबतक अँधेरी रात्रि है। हे भगवन् ! जो सत्शास्त्रों को भी सुने और फिर विषयों की ओर भी गिरे, उसे बड़ा अभागी जानिये। मैं वही हूँ। परन्तु अब मैं तुम्हारी शरण आया हूँ। मेरे हृदयरूपी आकाश में जो अज्ञानरूपी कुहरा है, वह तुम्हारे वचनरूपी शरत्काल से नष्ट हो जावेगा और हृदयाकाश निर्मल होगा। हे भगवन् ! मैंने त्रिदण्ड साधे हैं अर्थात् दीर्घ काल तक मन, शरीर और वाणी में तीन तप किये हैं, परन्तु आत्मप्रकाश नहीं