योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸
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हुआ। अब तुम्हारे शरणागत होकर तरूँगा। इसलिए कृपा करके उपदेश करो, जिससे मेरे हृदय का तम दूर हो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे मङ्गिवैराग्ययोगो नाम शताधिकपञ्चचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ १४५ ॥
वशिष्ठजी ने कहा, हे तात ! संवेदन, भावना, वासना और कलना, ये अनर्थ के कारण हैं। जब इनका अभाव हो, तब कल्याण हो। शुद्ध चिन्मात्रपद प्रत्यक्ष चैतन्य अपने स्वरूप में स्थित है। जो अहंकार का उत्थान है, वही संवेदन है। भाव यह है कि पहले आप कुछ बना, फिर चेता, और अपना रूप चित्त में स्मरण हुआ, तब भ्रम मिट जाता है। और यदि जो कुछ बना उसकी भावना होती है कि मैं यह हूँ तो इससे संसार दृढ़ होता है। फिर वैसे ही वासना दृढ़ होती है और अपने शरीर के अनुसार नाना प्रकार की कलना होती है। फिर संसार के संकल्प-विकल्प उठते हैं। हे ब्राह्मण ! ये अनर्थ के कारण हैं। जब इनका अभाव हो, तब कल्याण हो। जितने शब्द और अर्थ हैं, उनका अधिष्ठान प्रत्यक्ष चैतन्य है। सब शब्द उसी के आश्रित हैं और सब वही है। जब तू ऐसे जानेगा, तब वासना का क्षय हो जायगा। जब अहंसंवेदन फुरता है, तब आगे संसार भासित होता है। जैसे जब बसन्त ऋतु आती है, तब बेलें प्रफुल्लित होती हैं, वैसे ही जब संवेदन फुरता है, तब आगे संसार सिद्ध होता है। और जब संसार हुआ, तब नाना प्रकार की वासना फुरती है और संसार नहीं मिटता। हे अङ्ग ! संसार जन्म-मरण का ही नाम है। जब यह संसरण मिटेगा, तब आत्मपद ही शेष रहेगा। वह तेरा अपना रूप है, इससे इस वासना को त्यागकर अपने आपमें स्थित हो रह—सब तेरा ही रूप है। जबतक वासना फुरती है, तबतक संसार दृढ़ रहता है। जैसे वृक्ष को जल दीजिए तो बढ़ता जाता है, वैसे ही वासनारूपी जल देने से संसाररूपी वृक्ष बढ़ता जाता है। इससे वासना का नाश करो कि यह संवेदन न उठे। जब वृक्ष जल से रहित होता है, तब आप ही सूख जाता है। हे पुत्र ! आत्मा में जगत् नहीं हुआ, केवल परमार्थसत्ता है। जैसे रस्सी में सर्प