योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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कुछ वस्तु नहीं, रस्सी के अज्ञान से ही सर्प दिखता है, वैसे ही आत्मा के अज्ञान से संसार भासित होता है। जब तू आत्मपद को जानेगा, तब परमार्थसत्ता ही भासित होगी। जैसे बालक अपनी परछाहीं में भूत की कल्पना कर भय पाता है और जब विचारकर देखता है तब भूत कोई नहीं, सब भय दूर हो जाता है, वैसे ही आत्मा के अज्ञान से संसार के रागद्वेष जीव को जलाते हैं। ज्ञानवान् को वासनासंयुक्त संसार का अभाव हो जाता है और केवल अद्वैत आत्मसत्ता ही भासित होती है। जैसे स्वप्न से जागकर स्वप्न के प्रपञ्च का वासनासंयुक्त अभाव हो जाता है, वैसे ही जब आत्मा का साक्षात्कार होता है, तब वासनासंयुक्त संसार का अभाव हो जाता है; क्योंकि वह है ही नहीं। जैसे घटादिक में मृत्तिका से भिन्न कुछ नहीं, वैसे ही सब प्रपञ्च चिन्मात्रस्वरूप है, उससे भिन्न नहीं। जितने शब्द-अर्थ हैं, सब आत्मा ही हैं।
हे मित्र ! जो कुछ आत्मा से इतर भासित होता है, उसको भ्रममात्र जानो। जैसे आकाश में नीलिमा जो दिखती है, वह भ्रममात्र है, वैसे ही विश्व असम्यक्दृष्टि से दिखता है। सम्यक्दृष्टि से सब प्रपञ्च आत्म-स्वरूप हैं। द्रष्टा, दर्शन, दृश्य की त्रिपुटी भी बोधस्वरूप है। बोध ही त्रिपुटीरूप होकर स्थित है। जैसे स्वप्न में एक ही अनुभव त्रिपुटीरूप हो भासित होता है, वैसे ही यह जाग्रत की त्रिपुटी भी आत्मस्वरूप है। हे अङ्ग ! जितने स्थावर-जंगम पदार्थ हैं, सब आत्मस्वरूप हैं, जो परमात्मस्वरूप न हों तो भासित न हों। द्रष्टारूप से जो अनुभव करता है, वह एक अद्वैतरूप है—उसी स्वरूप के प्रमाद से भिन्न-भिन्न त्रिपुटी भासित होती है, तो भी कुछ उससे भिन्न नहीं है। जैसे स्वप्न में त्रिपुटी अपने अनुभव से भासित होती है, जो अनुभव न हो तो क्यों भासित हो, वैसे ही यह त्रिपुटी भी अनुभवरूप आत्मा से भासित होती है। इससे सब परमात्मस्वरूप है, कुछ भिन्न नहीं। और जब भिन्न नहीं तो है ही नहीं; क्योंकि सबकी एकता परमार्थस्वरूप में होती है। हे ऋषीश्वर ! सजातीय वस्तु मिल जाती है। जैसे जल में जल की बूंद डालिए तो मिल जाती है; क्योंकि एक रूप है, वैसे ही बोध से सब