भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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☸ निर्वाण प्रकरण ☸

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ऐसा पुरुष ज्ञानबन्ध है। इसी कारण वह अर्थशिल्पी भी कहलाता है अर्थात् चितेरा करने को समर्थ है और धारण करने को समर्थ नहीं। हे राम ! एक प्रवृत्तिमार्ग है और दूसरा निवृत्तिमार्ग है। प्रवृत्ति संसारमार्ग है और निवृत्ति आत्मज्ञानमार्ग है। जिस पुरुष ने निवृत्तिमार्ग ग्रहण किया है, पर प्रवृत्तिमार्ग में अर्थात् बहिर्मुख विषयों की ओर प्रवृत्त होता है; इन्द्रियों के विषयों की चाह करता और विषयों से उपरत नहीं होता एवम् उनसे संतुष्ट होकर स्वरूप का अभ्यास नहीं करता, वह ज्ञानबन्ध कहलाता है।

हे राम ! जो पुरुष श्रुति के कहे शुभकर्म फल की कामना हृदय में रखता है, वह पुरुष ज्ञान के निकटवर्ती है, तो भी ज्ञानबन्ध है। जिसको आत्मा में प्रीति भी है, पर जो विषय का चिन्तन करता है और अपने को उत्तम मानता है, वह ज्ञानबन्ध कहलाता है। और जो आत्मतत्त्व का यथार्थ निरूपण करता है और स्थित नहीं है, वह ज्ञान-आभास है और उसको ज्ञान का फल नहीं मिलता। जिस पुरुष ने सिद्धि और ऐश्वर्य पाया है और उससे अपने को बड़ा जानता है, पर आत्मज्ञान से रहित है, वह ज्ञानबन्ध कहलाता है। हे राम ! निदि-ध्यास से ज्ञान की प्राप्ति होती है और उससे शान्ति का प्रकाश होता है। जब तक शान्ति नहीं प्राप्ति होगी, तब तक अपने को बड़ा ज्ञानी न माने। हे राम ! मनुष्य ज्ञान से बड़ा होता है। जब तक ज्ञान न उपजे तब तक आत्मपरायण हो; अभ्यास और यत्न करे; शुभ व्यवहार में प्राणों की रक्षा के निमित्त उपजीविका उत्पन्न करे और ब्रह्मजिज्ञासा के लिए प्राणों की धारणा करे। ब्रह्मजिज्ञासा दुःखरूप संसार-सागर से मुक्त होने के लिए है। फिर संसारी न हो और आत्म-परायण हो। जब आत्मपरायण होगे, तब सब दुःख मिट जावेंगे। जैसे सूर्य के उदय होने पर अन्धकार नष्ट हो जाता है, वैसे ही आत्मपद के प्राप्त होने पर सब दुःख नष्ट हो जाते हैं। उस पद के प्राप्त होने का उपाय यह है कि सत्शास्त्रों में जो विशेषण सुने हों उसको समझकर बारम्बार अभ्यास करे; दृश्य से उपरत हो और उनको