भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 423, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 423

४२२ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

मिथ्या जानकर विरक्त बने। इसी से आत्मपद की प्राप्ति होती है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ज्ञानबन्धयोगो नाम शताधिकद्विचत्वारिंशत्तमःसर्गः ॥ १४२ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जिज्ञासु होकर ज्ञाननिष्ठ होना और जो कुछ गुरुशास्त्रों में आत्मविशेषण सुने हैं उनमें अहं प्रत्यय करके स्थित होना, इसी का नाम ज्ञाननिष्ठा है। जीव इस ज्ञाननिष्ठा से परम उच्च पद को प्राप्त होता है, जो सबका अधिष्ठान है। जब उसमें स्थित हुआ, तब कर्मों के फल का ज्ञान नहीं रहता; क्योंकि शुभकर्मों के फल में राग नहीं रहता और अशुभ कर्मों के फल में द्वेष नहीं होता। ऐसा पुरुष ज्ञानी कहलाता है। वह शान्त-चित्त रहता है, अकृत्रिम शान्ति को प्राप्त होता है, किसी विषय के सम्बन्ध में नहीं फँसता। उसकी वासना की गाँठ टूट जाती है। हे राम ! बोध वही है जिसको पाने से फिर जन्म न हो, और जो जन्ममरण से रहित हो उसी को ज्ञानी कहते हैं। जब संसार से विमुख हो और संसार की सत्यता न भासित हो, तब जानिये कि फिर जन्म न पावेगा; क्योंकि उसकी संसार की वासना नष्ट हो गई है। हे राम ! जिससे ज्ञानी की वासना नष्ट होती है, वह भी सुनो। वह इस संसार का कारण नहीं देखता। जो पदार्थ कारण से उत्पन्न नहीं हुआ, वह सत्य नहीं होता; इससे संसार मिथ्या है। जैसे रस्सी में सर्प भासित होता है तो उसका कारण कोई नहीं, वह भ्रम से सिद्ध हुआ है, वैसे ही यह विश्व कारण के बिना दिखता है, इससे मिथ्या है। जो मिथ्या है तो उसकी वासना कैसे हो ? हे राम ! जो प्रवाहपतित काय प्राप्त हो, उसमें ज्ञानी विचरता है और संकल्प से रहित होकर अपना अभिमान कुछ नहीं करता कि इस प्रकार हो और इस प्रकार न हो। वह हृदय से आकाश की तरह संसार से न्यारा रहता है और वासना से शून्य होता है। ऐसा पुरुष पण्डित कहलाता है।

हे राम ! यह जीव परमात्मारूप है। जब अचेतन अर्थात् संसार की वासना से रहित हो, तब आत्मपद को प्राप्त हो। जैसे आम का