योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 424, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ेंॐ निर्वाण प्रकरण ॐ ४२३
वृक्ष फल से रहित होने पर भी उसका नाम आम है, परन्तु निष्फल है, वैसे ही यह जीव आत्मस्वरूप है, परन्तु चित्त के सम्बन्ध से इसका नाम जीव है। जब चित्त को त्याग करे, तब आत्मा हो। जैसे आम के पेड़ में फल लगने से वह शोभित होता है और सफल कहलाता है। वैसे ही जब जीव आत्मपद को प्राप्त होता है, तब महाशोभा से विराजता है। हे राम ! ज्ञानवान् पुरुष कर्म के फल की स्तुति नहीं करता अर्थात् इन्द्रियों के इष्ट विषय की चाह नहीं करता, जैसे जिस पुरुष ने अमृत-पान किया हो वह मद्यपान करने की इच्छा नहीं करता, वैसे ही जिसको आत्मसुख प्राप्त होता है, वह विषयों के सुख की इच्छा नहीं करता। जो किसी पदार्थ को पाकर सुख मानते हैं, वे मूढ़ हैं। जैसे कोई पुरुष कहे कि बन्ध्या के पुत्र के काँधे पर चढ़कर नदी के पार उतरते हैं तो वह पुरुष महामूढ़ है; क्योंकि जब बन्ध्या के पुत्र है ही नहीं तो उसके काँधे पर कैसे चढ़ेगा, वैसे ही जो कोई कहे कि मैं संसार के किसी पदार्थ को लेकर मुक्त हूँगा तो वह महामूढ़ है। हे राम ! ऐसा पुरुष ज्ञान से शून्य है। उसकी इन्द्रियाँ स्थिर नहीं होतीं। वह शास्त्रों के अर्थ प्रकट भी करता है, पर परमात्मा के ज्ञान से रहित है। उसको इन्द्रियाँ बलपूर्वक विषयों में गिरा देती हैं। जैसे चील पक्षी आकाश में उड़ता-उड़ता मांस को देखकर पृथ्वी पर गिर पड़ता है, वैसे ही अज्ञानी विषय को देखकर गिर पड़ता है। इससे मन सहित इन इन्द्रियों को वश करो और युक्ति से तत्परायण और अन्तर्मुख बनो। यह जो संवेदन उठता है, उसका त्याग करो। जब इसका स्फुरण निवृत्त होगा, तब परमात्मा का साक्षात्कार होगा। जब परमात्मा का साक्षात्कार होगा, तब रूप, अवलोक और मनस्कार की जो त्रिपुटी है, उसके अर्थ की सब भावना जाती रहेगी; केवल आत्मतत्त्व ही प्रत्यक्ष भासित होगा और संसार का अत्यन्त अभाव हो जावेगा।
हे राम ! संसार का आदि परमात्मतत्त्व है और अन्त भी वही है। जैसे स्वर्ण गलाइये तो भी स्वर्ण है और जो न गलाइये तो भी स्वर्ण है, वैसे ही जब सृष्टि का अभाव होता है तब भी आत्मा ही शेष रहता