योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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और सब दृश्य बोधमात्र है। हे साधो ! जो जड़ है वह चैतन्य नहीं होता और चैतन्य जड़ नहीं होता। इससे न कोई जड़ है न चैतन्य। चैतन्य आत्मा ही भावना से जड़ दृश्य होकर भासित होता है और उसके बोध से एक अद्वैतरूप हो जाता है तो जानता है कि सब वही है, भिन्न कुछ नहीं। हे मित्र ! अज्ञान से नाना प्रकार का विश्व भासित होता है। जैसे मेघ की वर्षा से नाना प्रकार के बीज उग आते हैं, वैसे ही अहंरूपी बीज से संसाररूपी वृक्ष वासना द्वारा उगता है। जब अहंकाररूपी बीज नष्ट हो, तब संसाररूपी वृक्ष नष्ट हो जावेगा। हे अङ्ग! जैसे वानर चपलता करता है, वैसे ही आत्मतत्त्व से विमुख अहंकाररूपी वानर वासना से चपलता करता है। जैसे गेंद हाथ के प्रहार से नीचे और ऊपर उछलता है, वैसे ही जीव वासना से जन्मान्तरों में भटकता फिरता है। कभी स्वर्ग, कभी पाताल और कभी भूलोक में आता है। स्थिर कभी नहीं होता। इससे वासना को त्यागकर आत्मपद में स्थित हो रहो। हे तात ! यह संसार रात्रि की मंजिल है, देखते-देखते नष्ट हो जाती है। इसको देखकर इसमें प्रीति करना और इसे सत्य जानना ही अनर्थ है। इससे संसार को त्यागकर आत्मपद में स्थित हो रहो। चित्त की वृत्ति जो संसरण करती है, इसी का नाम संसार है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे मङ्किऋषिबोधो नाम शताधिकषट्चत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ १४६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे तात ! यह संसार का मार्ग गहन है और इसमें जीव भटकते हैं। यह चैतन्यवृत्ति जो संसरण करती है, यही संसार है। जब यह संसरण मिटे, तब स्वच्छ अपना स्वरूप देख पड़े। चेतनावृत्ति जो बहिर्मुख उठती है, इसी का नाम बन्धन है; और कोई बन्धन नहीं। हे साधो ! यह जगत् वासना से बँधा है। जैसे वसन्तऋतु में रस फैलता है वैसे ही वासना में जगत् फैलता है। बड़ा आश्चर्य है कि मिथ्या वासना से जीव भटकते फिरते हैं, दुःख भोगते हैं और बारम्बार जन्म लेते और मरते हैं। बड़ा आश्चर्य है कि विषयरूप वासना के वश हुए