योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 438, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ४३७
जीव अविद्यमान जगत् को भ्रम से सत्य जानते हैं। हे साधो! जो इस वासनारूप संसार से तर गये हैं, वे धन्य हैं। वे प्रत्यक्ष चन्द्रमा की तरह शान्त हैं। जैसे चन्द्रमा अमृतरूप, शीतल और प्रकाशमान है और सबको प्रसन्न करता है, वैसे ही ज्ञानी पुरुष भी। इससे तू धन्य है जो तुझे आत्मपद पाने की इच्छा हुई है। हे अङ्ग! यह संसार तृष्णा से जलता है। जिनकी चेष्टा तृष्णामंयुक्त है, उनको तू बिलाव जान। जैसे बिलाव तृष्णा से चूहे को पकड़ता है, वैसे ही वे भी तृष्णा से युक्त चेष्टा करते हैं। मनुष्य शरीर में यही विशेषता है कि वह किसी प्रकार आत्मपद को प्राप्त करे। जो नरदेह पाकर भी आत्मपद पाने की इच्छा न करे तो वह पशुसमान है। हे मित्र! मूढ़ जीव ऐसी चेष्टा करते हैं कि प्राणों के अन्त तक भी तृष्णा में फँसे रहते हैं।
हे अङ्ग! ब्रह्मलोक से काष्ठ तक जितने इन्द्रियों के विषय हैं, उनके भोगने से शान्ति नहीं होती; क्योंकि वे आपात रमणीय हैं—इनमें सुख कभी नहीं मिलता। जो ज्ञानवान् पुरुष हैं, उनकी शान्ति ऐसी है, जैसे चन्द्रमा में, और वे सूर्य की नाईं प्रकाशमान होते हैं, विषयों की तृष्णा कभी नहीं करते। जैसे कोई पुरुष अमृतपान करके तृप्त हुआ हो तो वह खली खाने की इच्छा नहीं करता, वैसे ही जिस पुरुष को आत्मानन्द प्राप्त हो जाता है, वह विषयों के भोगने की इच्छा नहीं करता। इससे इसी वासना का त्याग करो। वासना का बीज अहंकार है। उसको यह सोचकर निवृत्ति करो कि मैं नहीं हूँ; क्योंकि मेरा होना ही अनर्थ है। हे साधो; शुद्ध चिन्मात्र निरहंकार पद में जो तू अपने को परिच्छिन्न जानता है कि 'मैं ब्राह्मण हूँ' अथवा किसी प्रकृति से मिलकर अपने को मानता है कि 'मैं यह हूँ', यही अनर्थ है। हे ऋषि! नेत्रों को खोलने से संसार उत्पन्न होता है और नेत्रों को मूँदने से नष्ट हो जाता है। सो नेत्र अहंकार का उत्पन्न होना है; इसी से आगे विश्व सिद्ध होता है। इससे तेरा होना ही अनर्थ है। हे अङ्ग! जैसे रस्सी में सर्प भ्रम से उदय होता है, वैसे ही आत्मा में अहंकार का उदय हुआ है। इसी के अभाव से शान्ति से होती है। जब अहंकार होता