भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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४३८ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

है, तब आगे स्त्री, कुटुम्ब और धन होते हैं। वे ही बन्धन हैं। इनके चमत्कार ऐसे हैं, जैसे बिजली का प्रकाश क्षण में उदय होकर नष्ट हो जाता है। इससे इनमें न बँधना चाहिए।

हे अङ्ग ! जब तू कुछ बना, तब सब आपदा तुझे प्राप्त होंगी। और यदि तू अपना अभाव जानेगा तो पीछे परमशान्तरूप आत्मपद ही शेष रहेगा, जिसकी अपेक्षा चन्द्रमा भी अग्निसा जान पड़ता है। वह आत्मपद परमशून्य, सब पदार्थों की सत्ता और आकाशरूप है। हे मित्र ! मेरे इन वचनों को हृदय में धारण कर, जिससे तेरा मोह नष्ट हो जाय। यह विश्व हुआ नहीं। जैसे आकाश में दूसरा चन्द्रमा दिखता है, पर है नहीं वैसे ही विश्व है नहीं, आत्मा के प्रमाद से भासित होता है। हे ऋषि ! तू उसी को जान, जिसके अज्ञान से विश्व भासित होता है और जिसके ज्ञान से लय हो जाता है। हे मङ्गी ! जैसे आकाश शून्यमात्र है, पवन स्पन्दनमात्र है, और जल तरङ्गमात्र है, वैसे ही जगत् संवित्मात्र है। उस संवित् आकाश से जो भिन्न भासित होता है, उसे भ्रममात्र जानो। जैसे असम्यकदृष्टि से जल पहाड़रूप भासित होता है, वैसे ही असम्यकदृष्टि से जगत् भासित होता है और सम्यक् अवलोकन से परमार्थसत्ता ही भासित होती है। जिसके अज्ञान से विश्व भासित होता है उसी को ज्ञानवान् लोग ब्रह्म कहते हैं। उस ब्रह्म में अहंकार ही व्यवधान है। वह पर्दा ज्ञानवान् को नष्ट हो जाता है, इससे वह सबके अधिष्ठान एक परमार्थस्वरूप को देखता है। उसी में तू भी रह। जैसे आकाश अनेक घटों के संयोग से भिन्न-भिन्न भासित होता है और घटों को फोड़ डालिये तो सब एक ही हो जाता है; वैसे ही अहंकाररूपी घट फोड़िये तो सब पदार्थ एक हो जाते हैं।

हे अङ्ग ! सबकी परमार्थसत्ता एक ब्रह्मपद है। वह अजन्मा, अच्युत, आनन्द, शान्तरूप, निर्विकल्प, अद्वैत, सबका अधिष्ठान है। उस शिलासदृश आत्मसत्ता से भिन्न कुछ न स्फुरण हो, इसलिए निर्बोध-बोध हो जाओ। हे मङ्गी ऋषि ! ये दुःख के देनेवाले पदार्थ और ऐसे

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