भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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पृष्ठ 440

✻ निर्वाण प्रकरण ✻ ४३६

शब्द अर्थ आकाश के फूल हैं; इससे शोक मत कर। कारण सब परमार्थसत्ता ही है। जैसे पुरुष निराकार है, पर उसकी अभावना से अङ्गों का संयोग होता है, वैसे ही विश्व भी इसकी भावना से होता है। जैसी संसार की भावना दृढ़ होती है, वैसा ही रूप आगे देख पड़ता है। जो विश्व उपादान से नहीं हुआ तो आरम्भ परिणाम से भी कुछ नहीं बना। हे मित्र! शुद्ध परमात्मा को पाना साध्य है, क्योंकि विश्व निरुपादान केवल शब्दमात्र है। आत्मा अद्वैत है, अतः इसका हेतु नहीं है। वह अचिन्त्य है, इसी से विश्व निरुपादान स्वप्नवत् है। जैसे स्वप्न की सृष्टि निरुपादान होती है, वैसे ही जाग्रत् सृष्टि भी है। जैसे मृत्तिका से घटकार्य बनता है, ऐसे भी आत्मा विश्व का उपादान नहीं है; क्योंकि मृत्तिका परिणाम से घटाकार होती है, पर आत्मा निर्विकार अच्युत है। जैसे भीत बिना चित्र हो सो है ही नहीं—इससे यह विश्व आकाश में चित्र है। जैसे स्वप्न में नाना प्रकार का विश्व आधार भीत बिना चित्र होते हैं, वैसे ही यह विश्व भी आकाश में चित्र सा है। इसी से आत्मा अकर्ता है। और विश्व जो दिखता है सो निरुपादान है। तब इसका शोक और हर्ष क्यों करें? यह सब प्रपञ्च आत्मरूप है, प्रमाद के कारण यह नहीं जाना जाता।

हे साधो! संवेदन से जब अहंकार फुरता है, तब विश्व भासित होता है। जैसे स्वप्न में जो कुछ बनता है वह अपने स्वरूप से भिन्न देख पड़ता है और उसी में रागद्वेष होता है, पर जागने पर और कुछ नहीं, सब कल्पना ही थी, वैसे ही जब संवेदन उठ गया, तब सब विश्व आप अपना रूप हो जाता है। अहंकार होना ही विश्व है। जब अहंकार नष्ट हुआ, तब ये सब शब्द-अर्थ कि मैं दुःखी हूँ, मैं सुखी हूँ, यह नरक है, यह स्वर्ग है, परमार्थसत्ता ही में फुरते हैं। सबका अधिष्ठान आत्मा है, इससे सब आत्मस्वरूप है। आत्मा दृश्य से रहित द्रष्टा है, ज्ञेय से रहित ज्ञाता है, और निर्बोध बोध है, इच्छा से रहित इच्छा है, अद्वैत और नानात्व भी वही है, निराकार और आकार भी वही है, अकिञ्चन और किञ्चन भी वही है। वह अक्रिय है और सब क्रियाएँ भी करता है। आत्मवेत्ता