योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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ऐसे आत्मज्ञान को पाकर विचरते हैं। उन्हें जगत् का किंचित् भी भान नहीं होता। जैसे सुवर्ण के भूषण या जल के तरङ्ग होते हैं, वैसे ही सब विश्व उसको आत्मस्वरूप भासित होता है। ऐसे जानकर वे सब चेष्टा करते हैं। जैसे काठ की पुतली में संवेदना नहीं उठती, वैसे ही उनको जगत् में सत्यता नहीं प्रतीत होती, क्योंकि वे निरहंकार हो जाते हैं। हे मङ्की ऋषि! जैसे सुवर्ण में भूषण बन जाते हैं, वैसे ही आत्मा में विश्व उपजा है। सो अहंकार से उपजा है। इससे इसके अभाव की भावना करो और निरहंकार होकर चेष्टा करो। जैसे पालने में बालक के अङ्ग स्वाभाविक हिलते हैं, वैसे ही ज्ञानी की निर्वेद चेष्टा होती है। हे ऋषि! जब तू इस मेरे उपदेश को हृदय में धारण करेगा, तब सुख से सहज में ही आत्मपद की प्राप्ति होगी और यह विश्व भी आत्मरूप ही भासित होगा। जो कुछ विश्व भासित होता है, वह सब आत्मरूप ही है। हे राम! जब मैंने इस प्रकार कहा, तब मङ्की ऋषि परमनिर्वाण-पद को प्राप्त हुआ और परमसमाधि में एक वर्ष स्थित रहा। शिला में जैसे घास-फूस कुछ नहीं उगता, वैसे ही उसके हृदय में कोई भावना या वासना नहीं उपजी। हे राम! जैसे मङ्की ऋषि स्वरूप को प्राप्त हुआ है, वैसे ही तुम भी स्थित होओ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे मङ्किऋषिनिर्वाणप्राप्तिर्नाम शताधिकसप्तचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ १४७ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह विश्व आत्मा का चमत्कार है और सब चिन्मात्रस्वरूप है। हे राम! मेरा आशीर्वाद है कि तुम चिन्मात्र-स्वरूप को प्राप्त होओ। जो तुम्हारा अपना रूप है, उसको अपना रूप जानो, जिससे तुम्हारे सब दुःख नष्ट हो जावें। हे राम! तुम निर्वाणस्थ शान्त आत्मा बनो। यथालाभ में सन्तुष्ट रहो। सत्य होने पर भी असत् की तरह स्थित होओ। रागद्वेष का सङ्ग तुमको स्पर्श न करे। हे राम! यह सब जगत् एक आत्मा में ही स्थित है और वास्तव में उस एक आत्मा में कुछ भी स्थित नहीं। आदि-अन्त से रहित वह एक चिदाकाश अपने आपमें स्थित है। शरीरादिक के नाश में भी